श्रावण मास विशेष: समाजवादी अवधारणा और भारतीय संस्कृति में शिव
अंग्रेजी मासिक "मैनकाइंड" लिखे राम कृष्ण और शिव के एक लेख में समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया शिव ने ऐसा कोई काम नहीं किया, जिसका औचित्य उस काम से ही न ठहराया जा सके। देवता और मनुष्य दूर तक जा कर खोजना होता है। अनुचित कामों को ठीक ठहराने के लिए चतुराई से भरे, खीझ पैदा करने वाले तर्क पेश किए जाते हैं।
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समुद्र मंथन का वक्त
लिंगपुराण में समुद्र मंथन की कथा का वर्णन है कि देवता और असुर समुद्र मंथन कर रहे थे। इस मंथन में अनेक रत्नों के साथ-साथ हलाहल विष भी निकला। दसों दिशाओं में अग्नि की लपटें निकलने लगी। किसी देवता को साहस नहीं हुआ कि आगे बढ़कर इस विष का पान करे। सब देवताओं ने मिलकर भगवान शिव से प्रार्थना किया कि इस विष को शांत करे।भगवान शिव समुद्र मंथन में शामिल नहीं थे। पर लोकहित में 'विषपान' किया। भगवान शिव के इस लोककल्याणकारी भूमिका के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए गोस्वामी तुलसीदास जी कहते है कि-
जरत सकल सुर वृंद, विषम गरल जेहि पान किय।
तेहि भजसि मन मंद, को कृपालु शंकर सरिस।।
विषपान के कारण ही शिवजी की संज्ञा 'मृतुन्जय' हुई। इस विष को कंठ के नीचे नहीं उतरने दिया, अतः उनका दूसरा नाम 'नीलकंठ' भी है। भगवान शिव के विषपान के पराक्रम से अभिभूत देवतागण उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करना चाहते थे। भगवान शिव तब हिमालय की गुफाओं में ध्यानस्थ थे। देवतागण कहने लगे " महाराज आपने जो किया, वह आजतक कोई नहीं किया।"
इतिहासकार वासुदेव शरण अग्रवाल की राय
भगवान शिव ने कहा- इसमें कोई विचित्र बात नहीं है। मेरी दृष्टि में बड़ा वह है, जो संसार में भरे विष को पचा सके। सबके लिए वह प्रकट होता है। स्थूल विष की अपेक्षा कहीं अधिक भयंकर है। उस पर विजय पाना ही असली परुषार्थ है। शिव के विषपान की इस कथा के बारे में मनीषी इतिहासकार वासुदेव शरण अग्रवाल की राय है कि- शिव के विषपान की कथा इतिहास का तथ्य नहीं, जो किसी सुदूर अतीत में घटित हुआ। यह तो नित्य की लीला है, जो मन, प्राण और पंच महाभूतों के धरातल पर नित्य होती रहती है। ईश्वर की दिव्य-रचना का यह सर्वोत्कृष्ट नियम है कि यहां अमृत या विष देवों की विजय या असुरों की की पराजय निश्चित है।अंग्रेजी मासिक "मैनकाइंड" लिखे राम कृष्ण और शिव के एक लेख में समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया शिव ने ऐसा कोई काम नहीं किया, जिसका औचित्य उस काम से ही न ठहराया जा सके। देवता और मनुष्य दूर तक जा कर खोजना होता है। अनुचित कामों को ठीक ठहराने के लिए चतुराई से भरे, खीझ पैदा करने वाले तर्क पेश किए जाते हैं।
ब्रम्हा और विष्णु
झूठ को सच, गुलामी को आजादी और हत्या को जीवन करार दिया जाता है। इन दुष्टतापूर्ण तर्कों का एक मात्र इलाज है शिव का विचार, क्यों कि वह तात्कालिकता के सिद्धांत का प्रतीक है। उनका हर काम तात्कालिक औचित्य से भरा होता है। उसके लिए किसी पहले या बाद के काम को देखने की जरूरत नहीं होती।
ईशान संहिता में बताया गया है कि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि को आदिदेव भगवान शिव करोड़ो शिव के समान प्रभा वाले लिंग रूप में प्रकट हुए। ब्रम्हा और विष्णु दोनों चौकें कि हम दोनों से भिन्न यह तीसरा तत्व कहां से प्रकट हो गया। जो भी इसके आदि -अंत का पता लगा लेगा वही हम दोनों में श्रेष्ठ होगा। ब्रम्हा जी हंस वाहन पर सवार होकर ऊपर की और विष्णु जी वराह रूप धारण कर पाताल लोक की ओर चले।ब्रम्हा जी को रास्ते में केतकी का एक गिरता हुआ फूल मिला। पुष्प से पूछा तुम कहां से आ रहे हो। पुष्प ने कहा कि मैं इस स्तंभ के मध्यदेश से ही गिरा हूं।
ब्रम्हा जी समझ गये कि अभी तो मध्य ही नहीं आया है, तो अंत कहां होगा? ब्रम्हा जी ने पुष्प से कहा कि मैं सृष्टिकर्ता तुम्हारा पितामह हूँ। तुम साक्षी में कह देना कि मैंने अंत का पता लगा लिया है। रास्ते में एक गाय मिली, उसको भी साक्षी देने के लिए मना लिये।नीचे आकर ब्रम्हा जी ने दावा किया कि मैं अंत तक पहुंचकर पता लगा लिया है। साक्षी में यह गाय और केतकी का पुष्प है। ब्रम्हा, पुष्प और गाय झूठ सबने बोला।
आप श्रेष्ठ हैं
इस मामले में विष्णु जी ने सत्य कहा- मैं आदि का पता नहीं लगा सका। आप श्रेष्ठ हैं। विष्णु जी ब्रम्हा जी की पूजा करने के लिए ज्यों ही आगे बढ़े। ज्योतिर्लिंग स्तम्भ से भगवान शिव प्रकट हुए। उन्होंने ने अपने भौंह का एक बाल उखाड़कर पृथ्वी पर मारा। भैरव प्रकट हुए। शिवाजी की आज्ञा से भैरव ने असत्य भाषण करने वाले ब्रम्हा जी का पंचम मुख काट लिया। श्री ब्रम्हा जी उसी समय से चतुर्मुख हो गए।
शिवजी ने ब्रम्हा जी को यह भी शाप दिया कि तुम्हारी लोक में पूजा नहीं होगी। तुम्हारी पूजा केवल यज्ञकर्म में और पुष्कर में होगी। गौरतलब है कि पुष्कर के अलावा पूरे देश में ब्रम्हा जी का कही कोई मंदिर नहीं है। यज्ञ के अलावा सृष्टिकर्ता ब्रम्हा की पूजा आज भी नहीं होती। इस कथा से यह भी निष्कर्ष निकलता है कि- असत्य के प्रतिरोध में भगवान शिव किस हद तक जा सकते है।
राममनोहर लोहिया ने लेख में लिखा
भगवान शिव का एक और पक्ष- जिसका हवाला राममनोहर लोहिया भी अपने "राम कृष्ण और शिव" वाले लेख में देते है। वह है पार्वती की मृत्यु पर शोक प्रकट करना। मृत पार्वती का अंग-अंग गिरता रहा, फिर भी भगवान शिव ने उनका साथ नहीं छोड़ा। राममनोहर लोहिया कहते है कि- शिव की यह कहानी हिंदुस्तान की अटूट और विलक्षण एकता की भी कहानी है।
जहां पार्वती का एक अंग गिरा, वहां एक तीर्थ बना। बनारस में मणिकर्णिका घाट पर मणिकुंतल के साथ कान गिरा, वहां आज तक यह विश्वास किया जाता है कि यहां जलाये जाने पर मुक्ति मिलेगी। पूर्व में कामरूप में एक अंग गिरा, तीर्थ बना और जिसका आकर्षण सैकड़ों पीढ़ियों से चला आ रहा है। आज भी बूढ़ी दादियां अपने बच्चों को पूरब की महिलाओं से बच कर रहने की सलाह देती है, क्यों कि वे पुरुषों को मोह कर भेंड़ बकरी बना देती हैं।
भगवान शिव का दया, करुणा और प्रेम का यह अनोखा चरित्र, नारी के प्रति सम्मान की भावना और असत्य का संहारक विरोध उन्हें अन्य देवताओं से अलग और उत्कृष्ट बनाता है।अतः अपने संहारक रूप में भी भगवान शिव आमजन मानस के दिलों में गहराई से पैठ बनाये हुए है। इस अर्थ में वे सृष्टिकर्ता ब्रम्हा और विष्णु से बीस ही ठहरेंगे, उन्नीस नहीं।
इसलिए राम मनोहर लोहिया का यह कहना सर्वथा उचित प्रतीत होता है कि-राम कृष्ण और शिव भारत में पूर्णता के तीन महान स्वप्न है। वे भारत माँ से मांग करते है कि- हमें शिव का मस्तिष्क दो, कृष्ण का हृदय दो तथा राम का कर्म और बचन दो। हमें असीम मष्तिष्क और उन्मुक्त हृदय के साथ-साथ जीवन की मर्यादा से रचो।
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