मोदी का मास्टर प्लान, चीन के साथ मिलकर भारत देगा अमेरिका को नई चुनौती
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एससीओ यानी शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन में चीन के प्रभुत्व और मध्य एशिया में भारत की भूमिका पर गहन चिंतन करने की जरूरत है। दरअसल, इससे भारत का भविष्य जुड़ा हुआ है। हालांकि मीडिया में इस बात की चर्चा कम हो रही है कि आने वाले 13-14 जून को एससीओ की बैठक किर्गिस्तान के बिश्केक में होने वाली है, लेकिन इससे इस बैठक की महत्ता कम नहीं हो सकती है।
इस शिखर सम्मेलन में शंघाई सहयोग संगठन के तमाम सदस्य देश हिस्सा लेंगे। इस संगठन में अब भारत और पाकिस्तान दोनों शामिल हो चुके हैं, इसलिए भी इस संगठन और आसन्न शिखर सम्मेलन का महत्व बढ़ जाता है।
क्यों महत्वपूर्ण है शंघाई सहयोग संगठन की समिट?
भू-रणनीतिक संतुलन की दृष्टि से भी देखें तो यह सम्मेलन बेहद महत्वपूर्ण है। अभी हाल ही में संयुक्त राज्य अमेरिका ने ईरान पर दबाव बढ़ाने के लिए भारत को उससे कच्चा तेल खरीदने से मना कर दिया है। अमेरिका के दबाव के बाद भारत ईरान से तेल खरीदना बंद कर रहा है।
दूसरी ओर अमेरिका ने व्यापारिक तरजीह वाली देश की अपनी सूची से भारत को बाहर कर दिया है। यह दोनों भारत की अर्थव्यवस्था से जुड़े मामले हैं और इसके प्रत्यक्ष एवं परोक्ष दोनों प्रभाव पड़ेंगे। यही नहीं इन दोनों अमेरिकी निर्णय से भारत का भविष्य बुरी तरह प्रभावित होने वाला है। ऐसे में भारत के पास भविष्य की अर्थव्यवस्था को देखते हुए शंघाई सहयोग संगठन के घटक देशों के साथ तालमेल बिठाने के अलावा और कोई दूसरा चारा नहीं बचता है।
मोदी सरकार-2 और भारत?
अमेरिकी रुख और दुनिया के शक्ति संतुलन को ध्यान में रखते हुए विगत् दो वर्षों से भारत ने इस दिशा में सकारात्मक संदेश देना प्रारंभ कर दिया था। मसलन डोकलाम पर चीन के साथ छिड़े गतिरोध में भारत ने चीनी अड़ियल रुख के बावजूद बेहद सकारात्मक भूमिका निभाई। इसके साथ ही तिब्बत के मामले पर भारत ने चीनी पक्ष का बेहद तत्परता के साथ समर्थन करना प्रारंभ कर दिया है।
इसे वर्तमान परिस्थिति से निपटने के लिए बनाई जा रही पृष्ठभूमि के तौर पर देखा जाना चाहिए। कुछ लोगों को आश्चर्य हो रहा है, लेकिन नरेन्द्र मोदी पार्ट-2 ने तो इस बार परंपराओं से हटकर निर्वासित तिब्बती सरकार को अपने शपथग्रहण समारोह से दूर रखा, जबकि पहले ऐसा कभी भी नहीं हुआ। इसे भारत सरकार की चीनी नीति के प्रति झुकाव के रूप में देखा जा रहा है और यह झुकाव, नरेन्द्र मोदी की दूरगामी सोच की ओर इशारा करता है।
वैसे तो इस एससीओ पर पूरी तरह से चीन का कब्जा है, लेकिन जिस प्रकार विश्व का शक्ति संतुलन बदल रहा है, उसमें इस संगठन में अपनी पहुंच बढ़ाकर भारत कई प्रकार का लाभ उठा सकता है। यही नहीं जिस प्रकार चीन, अमेरिकी प्रभुत्व को विगत् कई वर्षों से सफलता के साथ चुनौती दे रहा है उसी प्रकार इस सम्मेलन में अपनी गहरी उपस्थिति बना भारत भी अमेरिकी प्रभुत्व को चुनौती देने में कामयाब हो सकता है।
इस सम्मेलन के महत्व को इसी बात से समझा जा सकता है कि इस सम्मेलन के लिए चीन के अलावा दुनिया के तीन प्रभावशाली मुल्क, भारत, रूस और पाकिस्तान एक साथ किसी गैर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में हिस्सा ले रहे हैं।
शंघाई की जरूरत और महत्व
जब चर्चा हो रही है तो शंघाई सहयोग संगठन को मुकम्मल तौर पर जानना भी बेहद जरूरी है। अप्रैल 1996 में शंघाई में हुई एक बैठक में चीन, रूस, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान आपस में एक-दूसरे के नस्लीय और धार्मिक तनावों से निपटने के लिए सहयोग करने पर राजी हुए थे। इसे शंघाई फाइव कहा गया था। जून 2001 में चीन, रूस और चार मध्य एशियाई देशों कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और उजबेकिस्तान के नेताओं ने शंघाई सहयोग संगठन शुरू किया और नस्लीय और धार्मिक चरमपंथ से निपटने और व्यापार एवं निवेश को बढ़ाने के लिए समझौता किया।
शंघाई फाइव के साथ उजबेकिस्तान के आने के बाद इस समूह को शंघाई सहयोग संगठन कहा गया। रूस, चीन, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, तजाकिस्तान और उजबेकिस्तान एससीओ के स्थायी सदस्य देश हैं। शंघाई सहयोग संगठन के 6 सदस्य देशों का भू-भाग यूरोशिया का 60 प्रतिशत है। यहां दुनिया के एक चौथाई लोग रहते हैं। आपको बता दें कि भारत 2017 में चीन के प्रभुत्व वाले इस समूह का पूर्ण सदस्य बना था और भारत के इसमें शामिल होने से क्षेत्रीय भू-राजनीति में, समूह का महत्व एकाएक बढ़ गया है।
इधर डाॅलर के मुकाबले के लिए दुनिया के कुछ प्रभावशाली मुल्क पहले से लामबंद हो रहे हैं। उन मुल्कों में भारत, चीन, रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका आदि शामिल हैं। इन देशों की ओर से विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष आदि अमेरिकी प्रभुत्व वाली आर्थिक संस्थाओं को नियंत्रित करने के लिए कुछ योजना बनाई जा रही है।
अमेरिका को क्यों हो रही है चिंता?
दरअसल, जब आर्थिक हितों पर चोट होती है तो कोई भी देश उस चोट का बदला लेना चाहता है। चूंकि अमेरिका कई दशकों से दुनिया में दादागीरी कर रहा है इसलिए चीन-रूस के नेतृत्व में आर्थिक और सामरिक लाबंदी प्रारंभ हो गई है, जिस प्रकार ब्रिक्स केवल आर्थिक और व्यापारिक हितों को ध्यान में रखकर विकसित करने की योजना है, उसी प्रकार शंघाई सहयोग संगठन कई सामरिक मुद्दों पर अमेरिकी प्रभुत्व को समाप्त करने की दिशा में एक पहल है।
चूंकि भारत अब इस संगठन का सदस्य बन गया है इसलिए अब अमेरिका भी इस संगठन के प्रति बेहद संवेदनशील रवैया अपनाने लगा है। अभी तक यह माना जाता था कि पाकिस्तान के बाद एशिया में भारत अमेरिकी लाॅबी के साथ खड़ा हो जाएगा, लेकिन ठीक विपरीत रणनीतिक गतिविधियां प्रारंभ हो गई हैं। अमेरिका को यह पता है कि अगर यह संगठन बनकर तैयार हो जाएगा तो उसकी दादागीरी नहीं चलेगी। दुनिया के शक्ति संतुलन को बनाने के लिए शंघाई सहयोग संगठन के शिल्पकार चीनी राष्ट्रपति शी जिंगपिंग ने शातिराना चाल चली है और यह चाल अब सफल होती जा रही है।
इसमें भारत की भूमिका को उसने सुनिश्चित कर अमेरिका को अलग-थलग करने की कोशिश की है और अब अमेरिका इस मामले में अलग-थलग पड़ने भी लगा है। इधर के दिनों में भारत नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में ताकतवर देश बनकर उभरा है। लंबी रणनीति की योजना से उसने ईरान के साथ अपने संबंध सीमित तो कर दिए हैं लेकिन शंघाई काॅपरेशन में अहम भूमिका निभा अमेरिका को यह भी संदेश दे दिया है कि उसके पास अमेरिका के अलावा अन्य विकल्प भी खुले हैं, इसलिए वह अमेरिकी दादागीरी को कदापि नहीं मानेगा।
शंघाई सहयोग संगठन में जिस प्रकार भारत पूर्ण सदस्य है, उसी प्रकार पाकिस्तान को भी चीन ने इसमें हिस्सेदारी सुनिश्चित की है। चूंकि पाकिस्तान चीन के कई व्यापारिक और रणनीतिक स्वार्थों की पूर्ति कर रहा है इसलिए इस अति संवेदनशील संगठन में पाकिस्तान का रहना वह जरूरी समझता है, साथ ही भारत के ऊपर दबाव के लिए चीन पाकस्तान वाले हथियार का उपयोग भी करता रहा है, जो वह आगे भी चालू रखने का संकेत दे रहा है।
इसी प्रकार के कुछ रणनीतिक संतुलन का उपयोग अमेरिका व रूस जैसे प्रभावशाली देशों ने भी किसी समय किया था। कतिपय आपसी गतिरोधों के कारण अमेरिका ने कई बार पाकिस्तान का उपयोग भारत के खिलाफ किया।
इसके कई उदाहरण हैं। इससे भारत को यह लाभ मिल सकता है कि पाकिस्तान के द्वारा भारत के खिलाफ जो कार्रवाई होती रही है उसे सीमित कर दिया जाए क्योंकि एशिया में बिना भारत के सहयोग के चीन अपनी रणनीति में सफल नहीं हो सकता है। भारत से सहयोग प्राप्त करने के लिए चीन को पाकिस्तान पर दबाव बनाना ही होगा। भारत चीन की इस कमजोरी का फायदा उठा सकता है।
पाकिस्तान के लिए भी फायदा
इधर पाकिस्तान चीन की महत्वाकांक्षा की पूर्ति का मुकम्मल दोहन कर अपनी कमजोर आर्थिक स्थिति को पटरी पर ला सकता है, इसलिए कालांतर में शंधाई सहयोग संगठन भारत, पाकिस्तान और चीन तीनों के लिए बेहद उपयोगी संठन साबित होगा। भारत को बेहद सतर्क रहकर इस संगठन के माध्यम से अपने हितों को साधना चाहिए।
एससीओ में चीन के साथ कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, रूस, ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान, भारत और पाकिस्तान जैसे अतिसंवेदनशील देश शामिल हैं। इस शिखर सम्मेलन के माध्यम से अमेरिका के प्रभुत्व और दादागीरी को चुनौती दी जाएगी, ऐसा आभास होने लगा है। याद रहे कि जब साम्यवादी रूस की लाॅबी की दुनियाभर में तूती बोलती थी उसी समय संयुक्त राज्य अमेरिका ने नाटो का गठन किया था और नाटो देखते-ही-देखते यूनाइटेड सोवियत सोशलिस्ट रिपब्लिक यानी यूएसएसआर की चूलें हिलाकर रख दीं।
भविष्य में क्या होगा इसका आकलन करना कठिन है, लेकिन चीनी योजनाओं के जानकारों की मानें तो चीन जिस प्रकार दुनिया में अपना निवेश बढ़ा रहा है उसके आधार पर यही कहा जाने लगा है कि चीन नाटो की तरह एससीओ का गठन कर रहा है। वह इसका विस्तार करेगा, इसलिए अगर अमेरिकी दादागीरी को चुनौती देनी है तो भारत को अपने आपसी गतिरोध को थोड़ी देर के लिए ताक पर रखकर चीनी अभियान में शामिल हो जाने की जरूरत है।
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