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स्मृति शेष राजकुमार केसवानी: हमें अफ़सोस है कि जीते जी हम आपकी सेवाओं का सम्मान नहीं कर पाए..!

Rajesh Badal राजेश बादल
Updated Sat, 22 May 2021 12:28 PM IST
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मैंने अपना चालीस बरस पुराना दोस्त और साथी खो दिया और मैं अकेला देखता रहा।
मैंने अपना चालीस बरस पुराना दोस्त और साथी खो दिया और मैं अकेला देखता रहा। - फोटो : social media
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राजकुमार केसवानी अब नहीं हैं। अब भी भरोसा नहीं हो रहा। लड़ाकू तो थे ही। इसी वजह से पक्क़ा यक़ीन था कि राजकुमार जी यह जंग भी जीतेंगे। लगातार हमने अनेक लड़ाइयां साथ लड़ीं और जीते। लेकिन यह मोर्चा आपने अकेले खोल लिया। बिना किसी को बताए। अकेले क्यों आप जीतना चाहते थे भाई ? उफ़ ! मैंने अपना चालीस बरस पुराना दोस्त और साथी खो दिया और मैं अकेला देखता रहा।
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एक सप्ताह से बेटे रौनक़ से बात हो रही थी। कल रात दस बजकर बीस मिनट पर भी उसका सन्देश आया - अंकल ! पापा के लिए दुआ कीजिए। मैंने उसे सन्देश भेजा था -बेटे ! जल्द ही वे ठीक होकर घर आएंगे। मैं उनको जानता हूं वे हार मानने वाले नहीं हैं। कौन जानता था कि संसार की सबसे क्रूर और हत्यारी यूनियन कार्बाइड को धूल चटाने वाला यह जांबाज़ योद्धा पत्रकार एक अदृश्य दुश्मन से पराजित हो जाएगा। 


राजकुमार संग यादें 
यादों की फ़िल्म चल रही है। इंदौर में 1983 का दिसंबर महीना था। आप इंदौर आए थे। वसंत पोतदार के घर रात भर हम लोग बतियाते रहे। सुबह कब हुई पता ही नहीं चला। यह भी नहीं लगा कि वह हमारी पहली मुलाक़ात थी। उन दिनों भोपाल के यूनियन कार्बाइड के ज़हरीले तंत्र का पहली बार इतने विस्तार से पता चला था। वसंत दा ने कहा कि सुरेंद्र को रिपोर्ट भेजो। रविवार में ज़रूर छपेगी।

राजकुमार ने मुस्कुराते हुए कहा - चली गई। रविवार को नहीं जनसत्ता को। महीने -दो महीने बाद ही हमने पाया कि जनसत्ता में पूरे आठ कॉलम में क़रीब क़रीब आधे पन्ने पर वह दिल दहलाने वाली रिपोर्ट छपी थी। संभवतया शीर्षक था - भोपाल बारूद के ढेर पर। ख़लबली मच गई। सरकार हिल गई और धीरे-धीरे सब शांत हो गया।

राजकुमार अपने साप्ताहिक के ज़रिए भी कार्बाइड के कुचक्र का पर्दाफ़ाश करते रहे। हर अंक के बाद मैं उन्हें फ़ोन करता। बधाई देता तो कहते -राजेश ! यह मुद्दा बधाई का नहीं है। यह बेशर्म सरकार कुछ नहीं सुन रही। एक खाद कारख़ाना ज़हरीली गैस का ज़खीरा क्यों एकत्रित कर रहा है? किसी के पास इसका उत्तर नहीं था। यह ज़रूर जानते थे कि यूनियन कार्बाइड की ओर से भोपाल के तमाम बड़े पत्रकारों को हर महीने पैकेट पहुंचते थे। कोई कुछ नहीं बोला। अगले साल तीन दिसंबर की रात जब गैस रिसी तो मौत ने अपना तांडव दिखाया। हज़ारों लोग कीड़े मकोड़ों की तरह मरे। भोपाल भुतहा हो गया था और राजकुमार - मेरा दोस्त अकेला हुक़ूमत को ललकार रहा था। उस एक रात के बाद वह संसार भर में एक नायक पत्रकार की तरह प्रतिष्ठित हो गया था। लेकिन उसे ग़म था हज़ारों निर्दोष मौतों का। 
 
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