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भावी पीढ़ियों को बीमारियों से समुद्र ही बचाएगा
सार
वैज्ञानिकों के अनुसार समुद्री पर्यावरण जैव सक्रिय प्राकृतिक उत्पादों का एक असाधारण भंडार है, जिनमें से कई स्थलीय प्राकृतिक उत्पादों में नहीं पाए हैं। समुद्री जीवों अपना अस्तित्व बचाने के लिये प्राकृतिक तौर पर जैव रासायनिक और विशिष्ट शारीरिक तंत्र विकसित किए हैं जिनमें प्रजनन, संचार और शिकार, संक्रमण और प्रतिस्पर्धा से सुरक्षा जैसे उद्देश्यों के लिए जैव सक्रिय यौगिकों का उत्पादन शामिल है।
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वैज्ञानिकों का मानना है कि समुद्री जीवों से भविष्य में अनेक जीवन रक्षक औषधियां बनाई जा सकेंगी।
- फोटो : istock
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विस्तार
हिन्दू पुराणों में समुद्र की उत्पत्ति के सम्बन्ध में अनेक प्रकार की कथाएं दी गई हैं और कहा गया है कि सब प्रकार के रत्न समुद्र से ही निकलते हैं। इसीलिये उसे "रत्नाकर" भी कहा जाता हैं। केवल रत्न ही नहीं बल्कि इस धरती के महासागर बेशुमार और अत्यंत उपयोगी औषधियों के भी खजाने हैं। शास्त्रों के अनुसार देवताओं और दैत्यों द्वारा किये गये समुद्र मंथन से ही अमरत्व प्रदान करने वाला अमृत और जीवन का नाश करने वाला विष प्राप्त हुआ था।
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समुद्र के अन्दर के खजानों की खोज के लिये ही भारत सरकार ने "डीप सी मिशन" याने कि "गहरे समुद्र अभियान" को शुरू किया है जो कि केवल खनिज अन्वेषण तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसमें समुद्री विज्ञान का विकास और वनस्पतियों तथा जीव-जंतुओं की खोज और समुद्री जैव विविधता का संरक्षण आदि भी शामिल है। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में आर्थिक मामलों की मंत्रिमण्डलीय समिति ने पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के इस प्रस्ताव को 16 जून 2021 को 5 साल के लिये 4077 करोड़ के बजट के साथ मंजूरी दे दी थी।
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समुद्र प्राकृतिक उत्पादों का असाधारण भंडार
वैज्ञानिकों के अनुसार समुद्री पर्यावरण जैव सक्रिय प्राकृतिक उत्पादों का एक असाधारण भंडार है, जिनमें से कई स्थलीय प्राकृतिक उत्पादों में नहीं पाए हैं। समुद्री जीवों अपना अस्तित्व बचाने के लिये प्राकृतिक तौर पर जैव रासायनिक और विशिष्ट शारीरिक तंत्र विकसित किए हैं जिनमें प्रजनन, संचार और शिकार, संक्रमण और प्रतिस्पर्धा से सुरक्षा जैसे उद्देश्यों के लिए जैव सक्रिय यौगिकों का उत्पादन शामिल है। समुद्री पर्यावरण में भौतिक और रासायनिक स्थितियों के कारण, समुद्री जीवों का लगभग हर वर्ग अद्वितीय संरचनात्मक विशेषताओं वाले विभिन्न प्रकार के अणुओं को धारण करता है।
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अद्भुत जैविक विविधता है समुद्र में
‘मैरीन ड्रग्ज’ पत्रिका के 25 मई 2004 में प्रकाशित एक शोधपत्र के अनुसार रासायनिक विविधता से अलावा भी समुद्र अद्भुत जैविक विविधता का भंडार है। जीवन के 34 मूल संघों में से भूमि पर केवल 17 संघ पाए जाते हैं जबकि समुद्र में 32 संघ पाए जाते हैं। जैव विविधता के मूल दृष्टिकोण से महासागर कहीं अधिक विविध है और वास्तव में प्राकृतिक फार्मेसी विकसित करने के लिए उनमें असीम संभावनाएं हैं।
शोध पत्र के अनुसार अब तक शोधकर्ताओं ने लगभग 7000 समुद्री प्राकृतिक उत्पादों को चिन्हित किया है, जिनमें से 25 प्रतिशत शैवाल से, 33 प्रतिशत स्पंज से, 18 प्रतिशत कोइलेंटरेट्स (समुद्री चाबुक, समुद्री पंखे और नरम कोरल) से, और 24 प्रतिशत अन्य अकशेरुकी फाइला के प्रतिनिधियों से हैं। जैसे कि एसिडियन (जिसे ट्यूनिकेट्स भी कहा जाता है), ओपिथोब्रांच मोलस्क (न्यूडिब्रांच, समुद्री खरगोश आदि), इचिनोडर्म्स (स्टारफिश, समुद्री खीरे आदि ) और ब्रायोजोअन (मॉस जानवर)।
कैलिफोर्निया के ला जोला में स्क्रिप्स इंस्टीट्यूशन ऑफ ओशनोग्राफी में सेंटर फॉर मरीन बायोटेक्नोलॉजी एंड बायोमेडिसिन के निदेशक और ऑर्गेनिक केमिस्ट विलियम फेनिकल कहते हैं, कि "चूंकि हम इंसान जमीन पर रहते हैं, इसलिए हमने हमेशा वहीं देखा है। लेकिन अगर आप शुरू से पूछें कि हमें कहां खोज करनी चाहिए? तो जवाब हमेशा समुद्र होगा। अब हम वहां हैं।
अब तक 100 से अधिक दवायें बन चुकी समुद्र से
वैज्ञानिकों का मानना है कि समुद्री जीवों से भविष्य में अनेक जीवन रक्षक औषधियां बनाई जा सकेंगी। समुद्री स्रोतों से प्राप्त यौगिकों का परीक्षण अब पुराने दर्द, अस्थमा और स्तन कैंसर सहित विभिन्न घातक बीमारियों के उपचार के रूप में किया जा रहा है। पता चला है कि स्लाइम उपयोगी जैव रसायन बनाने में बिल्कुल शानदार है।
औषधीय वनस्पति विज्ञान में पिछले कई वर्षों में किए गए शोध ने समुद्री जैव-पूर्वेक्षण के लिए एक प्रमुख प्रेरणा दी है। 100 से अधिक महत्वपूर्ण दवाएँ या तो सीधे अर्क के रूप में या पौधों के अणुओं के सिंथेटिक पुनर्रचना के रूप में उत्पन्न होती हैं, जिनमें एस्पिरिन (विलो छाल से), डिजिटलिस (फूलों वाली जड़ी-बूटी फॉक्सग्लोव से), मॉर्फिन (अफीम खसखस से) और मलेरिया-रोधी दवा कुनैन (सिनकोना पेड़ की छाल से) शामिल हैं।
शैवाल से बनी कैंसर के इलाज के लिये दवा
केंद्रीय नमक और समुद्री रसायन अनुसंधान संस्थान (सीएसएमसीआरआई), भावनगर के शोधकर्ताओं ने समुद्री शैवाल से प्राप्त पॉलीसेकेराइड यौगिक से अगर-एल्डिहाइड के संश्लेषण और फिर उस पर आधारित ठोस सिल्वर नैनो कंपोजिट तैयार करने की पद्धति विकसित की है। शोधकर्ताओं का कहना है कि इस पद्धति से किफायती सिल्वर नैनो कंपोजिट प्राप्त किया जा सकता है, जो बैक्टीरिया-रोधी परत चढ़ाने, प्रतिक्रियाशील पदार्थों के निर्माण और कैंसर-रोधी उपचार विकसित करने में सहायक हो सकता है।
नई बीमारियों के इलाज की दवायें समुद्र से मिलेंगी
नेशनल लाइब्ररी ऑफ साइंस जर्नल के अप्रैल-जून 2016 के अंक में प्रकाशित हर्षद माल्वे के शोध पत्र "एक्सप्लोरिंग द ओसन फॉर न्यू ड्रग डेवेलपमेंट्स: मैरीन फार्माकॉलॉजी" के अनुसार बीमारियों के पैटर्न बदल रहे हैं और बदलते पर्यावरण के कारण नई बीमारियाँ उभर रही हैं। दुनिया की आबादी में भारी वृद्धि ने दवाओं के लिए मौजूदा संसाधनों पर बोझ बढ़ा दिया है।
इसलिए दवा निर्माता दुनिया की आबादी की बढ़ती मांगों के लिए प्रभावी और सुरक्षित दवाएं विकसित करने के लिए हमेशा नए संसाधनों की तलाश में रहते हैं। पृथ्वी की सतह का पचहत्तर प्रतिशत हिस्सा पानी से ढका हुआ है, लेकिन समुद्री जीवों के औषधि विज्ञान में शोध सीमित है और इसका अधिकांश हिस्सा अभी भी अनदेखे पड़ा हुआ है। समुद्री पर्यावरण कैंसर या
मलेरिया जैसी बड़ी बीमारियों से निपटने के लिए नई दवाओं के लिए अनगिनत और विविध संसाधनों की संभावनाओं के द्वार खोलता है। यह विभिन्न जलीय पौधों और जानवरों से युक्त एक पारिस्थितिक संसाधन भी प्रदान करता है। इन जलीय जीवों की जीवाणुरोधी, इम्यूनोमॉड्यूलेटर, एंटी-फंगल, एंटी-इंफ्लेमेटरी, एंटीकैंसर, एंटीमाइक्रोबियल, न्यूरोप्रोटेक्टिव, एनाल्जेसिक और एंटीमलेरियल गुणों के लिए जांच की जाती है। इनका उपयोग दुनिया भर में नई दवा के विकास के लिए बड़े पैमाने पर किया जाता है। समुद्री औषध विज्ञान में समुद्री मूल की इन दवाओं पर शोध की असीम संभावनाएं हैं। भारत में कुछ संस्थान हैं जो कि नई दवाओं की खोज में महत्वपूर्ण योगदान कर सकते हैं।
एक्टिनोबैक्टीरिया औषधीय सोने की खान
वैज्ञानिक पत्रिका "रिसर्च गेट" के मार्च 2017 के अंक में सैयद सम्सुल हसन और अब्दुल लतीफ के शोध पत्र "मैरीन एक्टिनोबैक्टीरिया ऐज अ ड्रग ट्रेजर हाउस" के अनुसार समुद्री एक्टिनोबैक्टीरिया को उनके द्वितीयक मेटाबोलाइट्स की असीम क्षमता के कारण सोने की खान माना जाता है। अब अधिकांश शोध एक्टिनोबैक्टीरिया के व्युत्पन्न द्वितीयक मेटाबोलाइट्स पर इसके औषधीय गुणों की जांच करने के लिए किए गए हैं।
एक्टिनोबैक्टीरिया में भविष्य की महत्वपूर्ण बीमारियों, जैसे कि दवा-प्रतिरोधी बैक्टीरिया, कैंसर, वायरल बीमारियों की एक श्रृंखला, मलेरिया, कई संक्रमण और सूजन का इलाज करने की क्षमता है। हालाँकि, कई जैव अणुओं की क्रिया का तरीका अभी भी अप्रयुक्त है, क्योंकि उन यौगिकों की एक ठोस संख्या है जिसके द्वारा वे मानव रोगजनन में हस्तक्षेप करते हैं, यहाँ विस्तृत आरेखित चित्रण के साथ रिपोर्ट किए गए हैं।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।