जातिवादी दलितों पर भी लागू हो अनुसूचित जाति-जनजाति अधिनियम
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सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति और जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 के दुरुपयोग पर चिंता जताते हुए इससे जुड़े मामलों के अभियुक्तों की तुरंत गिरफ्तारी के स्थान पर शुरुआती जांच की बात कही। दलित संगठनों ने इसको लेकर 2 अप्रैल को ‘भारत बंद’ भी किया था। सरकार द्वारा अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनयम 1989 के मूल प्रावधानों को पुन: बहाल करने के फैसले के बाद, राजनीतिक आरक्षण के लाभार्थी और स्वयंभू दलित नेता कुछ ऐसी विजयी मुद्राओं में दिखे, मानो दलितों की तमाम समस्याओं का समाधान, शोषण और अत्याचार से सदा-सदा के लिए निजात मिल गई हो। लेकिन ऐसा नही है, बतौर डॉ. आंबेडकर जब तक आप सामाजिक स्वतंत्रता हासिल नहीं कर लेते कानून आपको जो भी स्वतंत्रता देता है वह आपके लिए बेमानी है।
बहरहाल, मैला ढोने की कुप्रथा के विरुद्ध भी विधिवत कानून 1993 में पारित हुआ और 2013 में संशोधित कानून अधिनियमित हुआ। भारत सरकार ने मैला ढोने के काम को समाज में एक अपराध और अमानवीय प्रथा करार देते हुए और अत्याचार और शोषण की श्रेणी में रखा है। बावजूद इसके राजनीतिक आरक्षण के लाभार्थी और स्वयंभू दलित नेता इसे लागू कराने के लिए क्यों खामोश हैं? अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनयम को लेकर जो हो हल्ला और तत्परता, आरक्षण के लाभार्थी और स्वयंभू दलित नेताओं ने दिखाई वैसी तत्परता मैला ढोने संबंधी अधिनियम को लागू कराने के लिए क्यों नही दिखाई देती? मानवता को शर्मसार करने वाली मैला ढोने की कुप्रथा का कहीं कोई जिक्र तक नहीं हो रहा है। इसके मायने समझने होंगे।
जातिवाद आज भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप में भारतीय समाज में मौजूद है। अब ये जाति आधारित शोषण दो तरह का हो चला है। पहला सवर्णों द्वारा दलितों का शोषण, जिससे सब वाकिफ हैं और दूसरा दलितों द्वारा दलितों का शोषण जिससे हर कोई वाकिफ नहीं है। लेकिन दलितों द्वारा भी दलितों का जमकर शोषण किया जाता है। इसे वही जानता है जो इसका भुक्तभोगी होता है। अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम पर घमासान करने वाले राजनेताओं को शायद दलित जातियों में व्याप्त भेदभाव और शोषण की जमीनी हकीकत का अंदाजा नही है। दलितों में भी परस्पर ऊंच-नीच का भेदभाव बहुत गहरा है, जाति-क्रम है, ऊंच–नीच है और छुआ-छूत भी जमकर होती है।
दलितों में भी कई जातियां हैं जो अपने आपको अन्य दलित जातियों से श्रेष्ठ और ऊंचा मानती हैं। यह अन्य दलित जातियों विशेषकर सफाई पेशा जातियों के साथ सवर्णों से भी क्रूर सलूक करती हैं। जब कोई व्यक्ति तथाकथित उच्च दलितों तथा आत्ममुग्ध आंबेडकरवादियों से अनुसूचित जाति/जनजाति की विभिन्न जातियों में समानता और जाति उन्मूलन की बात करता है तो ये उसी की जाति को संशय के घेरे में रख कर प्रश्न खड़े करते हैं कि निश्चित रूप से ये हमसे भी नीची जाति का होगा और हमारे समकक्ष आने का प्रयास कर रहा होगा। क्योंकि, आरक्षण के लाभ से संपन्न जातियों में ऊंच-नीच का दंभ साफ दिखाई देता है। इन्हीं तथाकथित आंबेडकरवादियों ने डॉ. आंबेडकर के जाति उन्मूलन के मुद्दे को न केवल छोड़ दिया है बल्कि जाति मुद्दे का ही उन्मूलन कर दिया है।
दलितों द्वारा ही दलितों के तिरस्कार और भेद भाव के मारे सफाई पेशा समुदाय का दर्द कौन महसूस करेगा? दलितों में भेदभाव का आलम ये है कि ग्रामीण क्षेत्रों में दलितों के श्मशान भी एक नहीं हैं। तथाकथित उच्च दलितों तथा आत्ममुग्ध आंबेडकरवादियों द्वारा सफाईपेशा जातियों के मुर्दों तक को अपने श्मशानों में अंतिम क्रिया तक की इजाजत नहीं दी जाती। कई जगह देखा गया है कि आरक्षण के लाभार्थी दलितों द्वारा अन्य दलित जातियों का शोषण बेखौफ किया किया जाता है। क्योंकि ऐसा कोई नियम या कानून नहीं है जिसके तहत इनके खिलाफ कारवाई की जा सके।
अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के वर्तमान बिल में सवर्णो द्वारा अनुसूचित दलितों पर किए जाने वाले शोषण और अत्याचार के विरुद्ध तो तुरंत कारवाई का प्रावधान है, लेकिन एक दलित जाति द्वारा दूसरी दलित जातियों विशेषकर सफाई पेशा समुदाय के साथ किए जाने वाले भेदभाव, शोषण और अत्याचार के विरुद्ध कारवाई का कोई प्रावधान वर्तमान अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम में नहीं है। इस अधिनियम को जातिवादी और ऊंच-नीच का भेदभाव रखने वाले दलितों के विरुद्ध प्रभावी बनाए बगैर यह अधिनियम अधूरा है। जातीय भेदभाव, शोषण और अत्याचार करने वाले दलितों को भी अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत जब तक नहीं लाया जाएगा तब तक सामाजिक न्याय की अवधारणा अधूरी ही रहेगी।
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