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पाकिस्तान में 77 साल बाद रामायण का मंचन, क्या बदल रहा पड़ोसी देश?
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पाकिस्तानी ड्रॉमा ग्रुप ने किया रामायण का मंचन
- फोटो : एक्स (ट्विटर)
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पाकिस्तान की आर्थिक राजधानी कराची में पिछले दिनों महाकाव्य रामायण का मंचन हुआ। वर्ष 1947 के बाद संभवत: ऐसा पहली बार हुआ। अब तक पाकिस्तान से जबरन धर्मांतरण और अल्पसंख्यक हिंदुओं पर अत्याचार के समाचार सुनने में आते हैं, लेकिन रामायण के मंचन ने सभी को हैरान किया है।
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रामायण के मंचन के निर्देशक योगेश्वर करेरा को छोड़कर मंचन से जुड़े सभी कलाकार मुस्लिम समुदाय से हैं। कराची में रामायण के हजार से ज्यादा टिकट बिके। रामायण के मंचन को लेकर अब तक पाकिस्तान में किसी भी धार्मिक समूह या कट्टरवादियों की तरफ से विरोध सुनने में नहीं आया है।
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क्या पाकिस्तान में बदलाव आ रहा है?
हिंदू समुदाय से आने वाले वित्त स्नातक 30 वर्षीय योगेश्वर करेरा, जो मौज कलेक्टिव समूह के सह-संस्थापक भी हैं, के प्रयासों से रामायण का मंचन हुआ। आर्ट्स काउंसिल ऑफ पाकिस्तान में हुए रामायण के मंचन में एआई तकनीक का प्रयोग किया गया।
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योगेश्वर करेरा ने मीडिया से एक इंटरव्यू में कहा कि भारत-पाकिस्तान में युद्ध जैसे हालात का इस मंचन पर कोई असर नहीं पड़ा है। यहां तक कि स्पॉन्सर और वेन्यू को लेकर किसी को कोई आपत्ति नहीं थी। मीडिया ने उनसे सवाल जरूर पूछे, लेकिन वह भी संवेदनशील नहीं थे।
मौज कलेक्टिव की सह-संस्थापक राना काजमी, जिन्होंने सीता का किरदार निभाया, ने मीडिया से बातचीत में कहा कि लोग हर धर्म, वर्ग से आए। बच्चे, छात्र, बुजुर्ग सब आए। यहां तक कि उन्होंने मंचन के दौरान कुछ बुजुर्गों को अपने बच्चों को रामायण के हर दृश्य को समझते हुए भी देखा। आगे रामायण का मंचन पाकिस्तान के अन्य शहरों में भी होगा, के सवाल पर राना काजमी कोई स्पष्ट जवाब तो नहीं देतीं, लेकिन एक शुरुआत कराची में जरूर हुई है।
भारत के विभाजन से पहले वर्ष 1941 की जनगणना में पश्चिमी पाकिस्तान (अब पाकिस्तान) में हिंदुओं की आबादी 10-15 प्रतिशत थी। सिंध प्रांत में हिंदू आबादी 25-30 प्रतिशत तक थी। हैदराबाद, शिकारपुर, थारपारकर जैसे सिंध के शहरों में हिंदू बहुसंख्यक थे।
तब पंजाब प्रांत के भी कुछ जिलों में 10-20 प्रतिशत हिंदू रहा करते थे, लेकिन विभाजन के समय 90 प्रतिशत हिंदू, विशेष कर पंजाब के इलाकों से, भारत चले आए थे। आज पाकिस्तान में हिंदुओं की बड़ी आबादी सिंध प्रांत में ही रहती है।
वर्ष 1998 की जनगणना में पाकिस्तान में हिंदुओं की आबादी मात्र 1.85 प्रतिशत (करीब 24 लाख) थी, लेकिन वर्ष 2017 की जनगणना में यह 2.14 प्रतिशत (करीब 44.45 लाख) हो गई। हालांकि, वर्ष 2023 के नवीनतम जनगणना आंकड़ों के अनुसार हिंदुओं की आबादी 2.17 प्रतिशत (करीब 52 लाख) के करीब हैं।
अलग-अलग स्रोतों से पता चलता है कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की स्थिति बेहद खराब है। हर साल एक हजार के करीब गैर मुस्लिम (हिंदू व ईसाई) महिलाओं व लड़कियों को जबरन धर्मांतरित करके उनका विवाह कराया जाता है। इसी धार्मिक उत्पीड़न के कारण बड़ी संख्या में पाकिस्तान से हिंदू भाग कर भारत आ जाते हैं।
वर्तमान में साढ़े तीन लाख से अधिक पाक विस्थापित हिंदू राजस्थान, गुजरात, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा जैसे राज्यों में रहते हैं। राजस्थान के जोधपुर में 25 हजार हिंदू विस्थापित हैं। इन्हीं हिंदू विस्थापितों को नागरिकता देने के लिए भारत सरकार ने नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) बनाया है, जो देश में एक बड़े आंदोलन का कारण बना था।
पिछले दिनों 7-10 मई के बीच ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत-पाक के बीच युद्ध के हालात पैदा हो गए थे। करीब 87 घंटे चले संघर्ष में पाकिस्तान को भारी नुकसान हुआ था। फिर युद्ध विराम की घोषणा हुई। दोनों देशों के बीच में व्यापार, एयरस्पेस समेत बहुत कुछ बंद है।
इसके बावजूद कराची में रामायण का मंचन दोनों देशों के संबंधों में एक नई उम्मीद की किरण पैदा कर सकता है। केवल कराची नहीं, यदि ऐसे आयोजन पाकिस्तान के सभी शहरों में हों तो अल्पसंख्यकों की स्वीकार्यता बन रही है, ऐसा संदेश दुनिया में जाएगा।
यह पाकिस्तान के निजी हित में भी होगा, क्योंकि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की दुर्दशा को लेकर दुनिया चिंता जताती रहती है। पाकिस्तान को चाहिए कि वह रामायण के जरिए अपनी एक अलग छवि दुनिया में बनाए। ऐसा करके वह भारत के साथ अपने संबंधों को भी सुधार सकता है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।