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रामनवमी विशेष 2024: भगवान श्रीराम का मानवोचित आदर्श चरित्र!

Tue, 09 Apr 2024 02:30 PM IST
अमर शर्मा अजय कुमार मल्लिक
अजय कुमार मल्लिक Published by: अमर शर्मा Updated Tue, 09 Apr 2024 02:30 PM IST
सार

हर मनुष्य का दो स्वरूप होता है, एक भौतिक और दूसरा आध्यात्मिक। मनुष्य के भौतिक स्वरूप की कृतियाँ उसे तदनुकूल कीर्तिवान बनाता है और यश-ख्याति प्रदान करता है। इन्हीं कृतियों ने ही राम को श्रीराम, श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और फिर मर्यादा पुरुषोत्तम को भगवान श्रीराम बनाया है।

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Ram Navami 2024 Ideal human character and qualities of Lord Shri Ram
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

चरितं रघुनाथस्य शतकोटि प्रविस्तरम्।
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एकैकमक्षरं पुंसा महापातक नाशनम्।।


मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम हर युग में, हर काल में, हर घर, हर समाज में, हर देश और हर सरकार में पूरी समरूपता से प्रासंगिक हैं।

धैर्य, विवेक,संयम और शौर्य  श्री राम का मूल चरित्र है।

हर मनुष्य का दो स्वरूप होता है, एक भौतिक और दूसरा आध्यात्मिक। मनुष्य के भौतिक स्वरूप की कृतियाँ उसे तदनुकूल कीर्तिवान बनाता है और यश-ख्याति प्रदान करता है। इन्हीं कृतियों ने ही राम को श्रीराम, श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और फिर मर्यादा पुरुषोत्तम को भगवान श्रीराम बनाया है। सारे मानवीय गुणों से भरपूर श्रीराम का जीवन-चरित उनकी क्रमिक-कृतियों के पायदान के सहारे उनके जीवन को मूल्यवान बनाता रहा है।

गुरु वशिष्ठ के आश्रम में मौलिक शिक्षा-दीक्षा प्राप्त करना, गुरु विश्वामित्र के संरक्षण में रण कौशल में प्रशिक्षित और प्रतिष्ठित होना उनके भविष्य का मूल आधार है।
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एक आम राजकुमार की तरह ही श्रीराम का भी जीवन प्रारंभ हुआ। लेकिन कहते हैं कि
“जितने कष्ट कण्टकों में जिनका जीवन सुमन खिला।
गौरव गंध उन्हें उतना ही यत्र तत्र सर्वत्र मिला।।"
"सोना जितना तपता है, उतना ही अधिक चमकता है।
मनुष्य जितना तपता है, उतना ही अधिक निखरता है।।"


यही मानवीय गुण और मानवीय मूल्य श्रीराम के जीवन पर भी स्थापित हुआ। एक राजकुमार के राजा बनने के स्वर्णिम प्रभात से ठीक पहले घनी अंधेरी काली रात में वन गमन के लिए सहजता से प्रस्थान कर जाना श्रीराम को "युग-द्रष्टा" तथा “युग-स्रष्टा” बना देता है।
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निषादराज के राज्य में भी उनके महल में नहीं रहकर एक वृक्ष के नीचे पत्नी और अनुज सहित विश्राम करना, बड़ी विनम्रता से गंगा नदी पार करने के लिए सहायता मांगना, एक राजकुमार से वनवासी हुए श्रीराम के विनम्र आचरण एवं उनकी उदारता को उजागर करता है। एक राजकुमार का ऐश्वर्यपूर्ण वस्त्रों का त्याग कर वल्कल वस्त्र धारण कर महर्षि अगस्त्य मुनि के आश्रम में जाकर उनसे वनवासी जीवन के लिए आशीर्वाद मांगना, श्रीराम की विनम्रता का द्योतक है।

वन में भाई भरत का परिवार, कुटुम्ब, समाज, एवं गुरु सहित आना और श्रीराम को प्रेम पूर्वक एवं सम्मान पूर्वक वापस अयोध्या लौटने के निवेदन पर श्रीराम के द्वारा सबों को समुचित सम्मान के साथ स्वागत करना, माता कैकेयी से पूर्ववत अपनी सगी माँ की तरह मिलना, उनको सादर चरणस्पर्श करना और अपने नीतिपूर्ण तर्कों से सबको संतुष्ट कर अयोध्या लौटने से मना करना ही श्रीराम को साधारण मानव से हटकर मर्यादा पुरुषोत्तम बनाता है।
 

सबसे राम

पंचवटी कुटिया से पत्नी सीता के हरण के बाद सीतापति राम का सीता के लिए विकल विलाप करना, व्याकुल हो चीत्कार करना श्रीराम के सहज मानवीय गुणों से परिचित करवाता है। इसी क्रम में गिद्धराज जटायु से घायल अवस्था में प्रेमपूर्वक मिलना, उनका उचित संस्कार करना, उनके हर जीव के प्रति आदर को दर्शाता है। श्रीराम के आध्यात्मिक स्वरूप भगवान श्रीराम की परम भक्त शबरी के घर पहुँचना, उनका आतिथ्य स्वीकार करना, उनके जूठे बेर खाना – यह बताता है कि श्रीराम के मन में कोई भी छोटा-बड़ा, ऊँचा-नीचा नहीं, सब समान हैं, उनका सम्मान समान है। वानर कुलीन हनुमानजी से मिलना, उन्हें अपना बनाना, वानरराज सुग्रीव से मिलना, उनसे मित्रता करना, रीछराज जामवंत से मिलना, उन्हें सम्मान देना - ये सारे प्रकरण श्रीराम के सभी जीवों से समभाव स्वरूप को स्थापित करता है।

सुग्रीव के बड़े भाई बाली का वध कर सुग्रीव को राज-पाट दिलवाना श्रीराम की न्यायप्रियता के पक्ष को उजागर करता है।

कई आग्रहों के उपरान्त सीता को मुक्त नहीं करने पर लंका पर आक्रमण की तैयारी, लंका जाने के लिए समुद्र से रास्ता मांगना और फिर समुद्र पर सेतु निर्माण श्रीराम के पुरुषार्थ पक्ष को परिलक्षित करता है।

श्रीराम - रावण युद्ध प्रारम्भ होता है। अनुज लक्ष्मण को प्राणघातक शक्ति वाण लगता है। उस विकराल काल में श्रीराम की व्यथा, श्रीराम की व्याकुलता, श्रीराम के मन में अज्ञात अनिष्ट की आशंका - सब मिलाकर श्रीराम को मानवीय रूप से झकझोर देता है। यहाँ श्रीराम का धैर्य और श्रीराम की गंभीरता ही उनका संबल होता है।

रावण का रण में धराशाई होना, लंका युद्ध पर विजय पाना - श्रीराम के शौर्य, वीरत्व, पराक्रम और रणनीतिक पक्ष को उजागर करता है। रावण के धराशाई होने के पश्चात नीतिगत ज्ञान की प्राप्ति के लिए लक्ष्मण को रावण के पास नीति शिक्षा के लिए भेजना, श्रीराम की राजनीतिक दूरदर्शिता को प्रतिष्ठित करता है।

श्रीराम का आदर्श, विवेक, समभाव स्वरूप, समदर्शी स्वरूप, शौर्य पराक्रम, वीरत्व, रणधीरता, और गंभीरता एक आम व्यक्ति और एक राजकुमार को मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और फिर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम से भगवान श्री राम के रूप में प्रतिस्थापित करता है। और भगवान श्रीराम के जीवन का संदेश भी यही है – मानव होकर भी उच्चतम आदर्शों को स्थापित कर ईशत्व को प्राप्त किया जा सकता है।


- अजय कुमार मल्लिक
स्वतंत्र स्तंभकार, कवि
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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