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राज्यसभा में बहुमत से दूर ही रहेगी भाजपा, एक नहीं कई हैं चुनौतियां

Mon, 17 Feb 2020 07:29 PM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Mon, 17 Feb 2020 07:29 PM IST
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rajya sabha election 2020 challenges of BJP for majority
पीएम मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के लिए आसान नहीं होगा राज्य सभा का चुनाव - फोटो : PTI

अगर भारतीय जनता पार्टी के हाथ से राज्य इसी तरह खिसकते रहे और नए राज्य हाथ नहीं आए तो लोकसभा के साथ ही राज्यसभा में भी अकेले दम पर पूर्ण बहुमत जुटाने का उसका सपना निकट आता नजर नहीं आ रहा है। हालांकि फिलहाल भाजपानीत् एनडीए और अन्य मित्रदलों की सदस्य संख्या राज्यसभा में 106 और अकेली भाजपा की 82 है। जबकि 425 सदस्यीय राज्यसभा में बहुमत के लिए 123 सदस्यों की आवश्यकता होती है।

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इस साल राज्यसभा की 73 सीटों पर चुनाव होना है। संघीय ढांचे में राज्यसभा राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है और राज्यों में भाजपा की राजनीतिक ताकत का क्षरण शुरू हो गया है। भले ही मोदी सरकार ने भाजपा के एजेंडे धारा 370 सहित कुछ संकल्पों को तो साकार कर दिया मगर समान नागरिक संहिता जैसे संकल्प अब भी अधूरे हैं, जिन्हें मंजिल तक पहुंचने के लिए राज्यसभा से ही गुजरना होगा। प्रधानमंत्री मोदी की महानायक की छवि को बचाना भी भाजपा के लिए एक चुनौती बन गई है।
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राज्यसभा की 73 सीटों पर होने हैं चुनाव
इस साल के अंत तक राज्य सभा के 69 सदस्यों का कार्यकाल खत्म हो जाएगा और 4 सीटें पहले से ही खाली पड़ी हैं। इस तरह कुल मिलाकर 73 खाली सीटों पर चुनाव होने हैं, जिन सदस्यों का कार्यकाल पूरा हो रहा है उसमें 18 भाजपा और 17 कांग्रेस के सदस्य शामिल हैं।
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अकेले यूपी से इस साल 10 सीटें खाली हो रही हैं। अगामी अप्रैल में रिक्त हो रही 52 सीटों में सर्वाधिक सात महाराष्ट्र से, छह तमिलनाडू, पांच-पांच सीटें पश्चिम बंगाल और बिहार से, चार-चार सीटें गुजरात और आंध्र प्रदेश से तथा तीन-तीन सीटें राजस्थान, ओडिशा और मध्य प्रदेश से शामिल हैं।

राज्यसभा से इस साल जिन प्रमुख नेताओं का कार्यकाल पूरा हो रहा है, उनमें केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी, रामदास आठवले, दिल्ली भाजपा नेता विजय गोयल, कांग्रेस के दिग्विजय सिंह और एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार भी शामिल हैं।
 

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कांग्रेस ने भाजपा से तीन राज्य झटक लिए। - फोटो : SELF

राज्यों की प्रतिनिधि सभा है राज्यसभा
दिसम्बर 2018 तक भाजपा स्वयं या अपने सहयोगियों के साथ देश के 29 में से 22 राज्यों में शासन चला रही थी। लेकिन दिसम्बर 2018 में राजस्थान और मध्य प्रदेश से जब उसके हाथ से राज्यों की बागडोर छूटनी शुरू हुई तो सिलसिला ही चल पड़ा और अब उसके सहयोगियों के साथ साझेदारी में केवल 16 राज्य बच गए हैं।

इनमें उत्तर पूर्व के 9 राज्यों की राजनीति का ऊंट कब करबट बदल दे, कोई नहीं कह सकता। संघीय ढांचे में राज्यसभा देश के राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है, जिसके सदस्यों को राज्यों केे विधायक चुनते हैं। हाल ही में महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्य के साथ ही झारखण्ड भी उसके हाथ से निकल गया और हरियाणा में बड़ी मुश्किल से दुष्यन्त चैटाला के साथ मिल कर सरकार बचानी पड़ी। नए राज्य हासिल करने के लिए दिल्ली में काफी जोर लगाया तो भी दिल्ली हाथ नहीं आई।

बिहार में इसी साल चुनाव होने हैं। असम, केरल, तमिलनाडू और पश्चिम बंगाल में 2021 के शुरू में ही चुनाव होने हैं। इन पांच राज्यों में केरल और तमिलनाडू को भूल भी जाओ तो शेष तीन राज्यों में भी फिलहाल भाजपा के लिए खुशखबरी की जैसी परिस्थ्तिियां नजर नहीं आ रही हैं। उसके लिए चिन्ता का विषय तो यह है कि सबसे बड़ा दल होने के बावजूद उत्तर प्रदेश के बाद सबसे अधिक 19 राज्य सभा सदस्य देने वाला महाराष्ट्र भी उसके हाथ से निकल गया।

अब उसके पास 31 सीटों वाला सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश ही है, जहां इस साल 10 सीटों के लिए चुनाव होने हैं। तीसरे नंबर के सबसे अधिक 18 सीटों वाले तमिलनाडू की फिलहाल 11 सीटें भाजपा के मित्र दल एआइडीएमके के पास जरूर हैं, मगर वहां भी 2021 में चुनाव होने हैं और जयललिता की मृत्यु के बाद नेतृत्व विहीनता के कारण एआइडीएमके के जनाधार का क्षरण ही हुआ है।

भाजपा के हाथ कुछ खास लगनेे की उम्मीद कम
इस साल अकेले अप्रैल में ही राज्यसभा की कुल 54 सीटें खाली हो रही हैं। इनके अलावा अगले साल जून में 5, जुलाई में 1, और नवम्बर में 11 सीटें खाली होंगी। अगले साल फरवरी में के.टी.एस. तुलसी भी रिटायर हो जाएंगे।

इधर, अप्रैल में भी सेवा निवृतियां दो अलग-अलग तिथियों पर हैं। इनमें 2 अप्रैल को तमिलनाडू की 6 सीटें, पश्चिम बंगाल की 5, ओडिशा की 3 सीटें शामिल हैं। तमिलनाडू में 2 सीटें डीएमके तथा 4 सीटें एआइडीएमके को जाने की संभावना है।

इसी प्रकार पश्चिम बंगाल में चुनाव जीतने के लिए 50 मतों की जरूरत होगी। उस हिसाब से 4 सीटें तृणमूल के खाते में जानी तय हैं, जबकि भाजपा, निर्दलीय सदस्य रीताब्रता बनर्जी की सीट वामदलों के पास जाने से रोकने की कोशिश करेगी। वहां एक सीट कांग्रेस के खाते में जा सकती है।

महाराष्ट्र की इस साल रिक्त हो रही सात सीटों में राजग के घटक दल आरपीआई के रामदास अठावले और अब विरोधी खेमे में शामिल शिवसेना की एक सीट (राजकुमार धूत) शामिल है। भाजपा की नजर राकांपा की रिक्त हो रही दो सीट (शरद पवार और माजिद मेमन) तथा कांग्रेस की एक सीट (हुसैन दलवई) पर थी, लेकिन अब इन सीटों को अपने पाले में करने की राजग को उम्मीद नहीं है।

वहां सीट जीतने के लिए 37 मतों की आवश्यकता होगी और इस हिसाब से भाजपा के खाते में केवल 2 और बाकी सीटें शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस में बंटने के आसार हैं।  उड़ीसा में एक सीट जीतने के लिए 37 मतों की आवश्यकता होगी, इसलिए सभी तीन सीटें बीजू जनता दल को जाएंगी और कांग्रेस को एक सीट का नुकसान होगा। 

भाजपा को सबसे अधिक उत्तर प्रदेश से होगा फायदा
9 अप्रैल को आन्ध्र प्रदेश की 4 सीटें रिक्त हो रही हैं जिनमें से एक सीट जीतने के लिए विधानसभा सदस्यों के 36 मतों की जरूरत होगी और इस हिसाब से सभी 4 सीटें वाइएसआर कांग्रेस के खाते में जाना तय है, जबकि कांग्रेस को वहां 2 सीटों का नुकसान होगा। असम में इस तिथि पर केवल एक सीट खाली हो रही है और वोटों के गणित के हिसाब से वह सीटे भाजपा के खाते में जा रही है।

9 अप्रैल को ही खाली हो रही मध्य प्रदेश की तीन राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव में एक सीट के लिए 58 विधायकों के मतों के गणित के हिसाब से कम से कम 2 सीटें तो कांग्रेस के खाते में जाएंगी ही लेकिन अगर वहां क्रास वोटिंग हुई तो तीसरी सीट किसी के पास भी जा सकती है। वहां भाजपा 2 सीटों के नुकसान में रहेगी। बसपा के टूटने के बाद वहां कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिल गया हैै।

हरियाणा में खाली हो रही एक सीट पर भाजपा पुनः काबिज होने जा रही है। इसी तरह राजस्थान में खाली होने जा रही 3 सीटों में से 2 पर कांग्रेस की जीत सुनिश्चित है। एक सीट भाजपा को जा सकती है। इस तरह राजस्थान में भाजपा को 2 सीटों का नुकसान होगा।

हिमाचल प्रदेश से सेवा निवृत्त हो रही कांग्रेस की विप्लव ठाकुर की सीट का भाजपा के खाते में जाना तय है। भाजपा को सबसे ज्यादा फायदा उत्तर प्रदेश से मिलने जा रहा है। वहां राज्यसभा की 10 रिक्त हो रही सीटों में से भाजपा को 9 सीटें मिलने जा रही हैं। भाजपा वहां 6 सीटों के मुनाफे में रहेगी, जबकि सबसे ज्यादा नुकसान यहां समाजवादी पार्टी को होगा।

 

rajya sabha election 2020 challenges of BJP for majority
2018 और 2019 में भाजपा को कुछ राज्यों में हार का सामना करना पड़ा है, जिसका सीधा असर राज्यसभा के द्विवार्षिक चुनाव परिणाम पर पड़ना स्वाभाविक ही है। - फोटो : आनंद पांडेय ट्विटर

नए चुनावी हथियारों के लिए भी राज्यसभा चाहिए भाजपा को
गौरतलब है कि 2018 और 2019 में भाजपा को कुछ राज्यों में हार का सामना करना पड़ा है, जिसका सीधा असर राज्यसभा के द्विवार्षिक चुनाव परिणाम पर पड़ना स्वाभाविक ही है। दूसरी तरफ, कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों की स्थिति 245 सदस्यीय राज्यसभा में सुधरेगी।

इस समय भाजपा के राज्यसभा में 83, और कांग्रेस के 45 सदस्य हैं। समीकरण के हिसाब से राज्यसभा में भाजपा की संख्या 83 के आसपास बनी रहेगी और सदन में बहुमत की उसकी आस फिलहाल पूरी नहीं हो पाएगी। जबकि छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान, झारखंड और महाराष्ट्र की सत्ता में आने के बाद कांग्रेस को राज्यसभा में अपनी कुछ सीटें बढ़ाने का मौका मिलेगा।

दिल्ली चुनाव में भाजपा राम मंदिर, तीन तलाक, सीएए, राष्ट्रवाद, पाकिस्तान से बैर और धारा 370 हटाने जैसे चुनावी दांवों (पैंतरों) के उल्टे पड़ जाने के कारण विपक्ष के हौसले बुलंद हो गए हैं। पिछली निरन्तर पराजयों ने मोदी युग के पराभव के संकेत भी दे दिए हैं, इसलिए उसे समान नागरिक संहिता जैसे नए चुनावी हथियारों की जरूरत होगी और यह राज्यसभा में बहुमत के बगैर संभव नहीं है।

सहयोगी दल भी दिल्ली चुनाव के नतीजों से खौफजदा हैं और अब विवादित मुद्दों पर उनकी हिचकिचाहट भी नजर आने लगी है। जैसे कि एनआरसी पर नितीश कुमार पहले ही किनाराकसी कर चुके हैं।

 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें  blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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