फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   rajasthan political crisis news sachin pilot terminated from chief minister congress party is in big trouble

सचिन पायलट: उपेक्षाओं की कहानी पुरानी है, लेकिन कांग्रेस ने पैर पर कुल्हाड़ी मार ली

Wed, 15 Jul 2020 12:04 PM IST
Ramesh saraf रमेश सर्राफ
Updated Wed, 15 Jul 2020 12:04 PM IST
सार

  • राजस्थान में गहलोत और पायलट की लड़ाई कोई नई नहीं है।
  • विधानसभा चुनाव के दौरान भी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष होने के नाते सचिन पायलट ने पूरे चुनाव को फ्रंट से लीड किया था।
  • सचिन पायलट के कांग्रेस छोड़ने से राजस्थान में प्रभावशाली गुर्जर जाति के मतदाता भी भविष्य में कांग्रेस से दूर होंगे।

विज्ञापन
rajasthan political crisis news sachin pilot terminated from chief minister congress party is in big trouble
कांग्रेस आलाकमान ने राजस्थान कांग्रेस के अध्यक्ष व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट को उनके पद से हटा दिया है- फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कांग्रेस आलाकमान ने राजस्थान कांग्रेस के अध्यक्ष व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट, केबिनेट मंत्री महाराजा विश्वेन्द्र सिंह व रमेश मीणा को उनके पद से हटा दिया है। साथ ही युवक कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष मुकेश भाकर व सेवादल अध्यक्ष राकेश पारीक को भी पद मुक्त कर दिया गया है। राज्य के शिक्षा राज्य मंत्री गोविंद सिंह डोटासरा को प्रदेश कांग्रेस का नया अध्यक्ष बनाया गया है।

विज्ञापन


विधायक गणेश घोधरा को युवक कांग्रेस व हेमसिंह शेखावत को सेवादल का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है। कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई के प्रदेश अध्यक्ष अभिमन्यु पूनिया ने भी पायलट के समर्थन में अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।

विज्ञापन


दिल्ली से आए कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल, अजय माकन, प्रदेश प्रभारी महासचिव अविनाश पाण्डे, रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कांग्रेस विधायक दल की लगातार दो बार बैठक लेकर इस बात का ऐलान किया। इसके बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत राजभवन जाकर राज्यपाल कलराज मिश्र से मिलकर पूरे घटनाक्रम से अवगत करवा दिया है।

विज्ञापन
विज्ञापन



इसके साथ ही राजस्थान में कांग्रेस के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत व पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट की लड़ाई खुलकर सड़कों पर आ गई है। दोनों नेता अपना-अपना शक्ति प्रदर्शन कर रहे हैं। सचिन पायलट गुट के विधायक राजस्थान से बाहर हरियाणा के गुडगांव में ठहरे हुए हैं।


कोरोना जैसी महामारी के संक्रमण के दौर में जहां सरकार को अपनी पूरी ताकत कोरोना पर काबू पाने के प्रयास करने में लगानी चाहिए। वहींं सरकार के मंत्री आपस में ही लड़ रहे हैं। इधर प्रदेश में कोरोना का संक्रमण हर दिन तेजी से बढ़ रहा है।

राजस्थान में कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या 25 हजार की संख्या को पाकर चुकी है। राजस्थान में गहलोत और पायलट की लड़ाई कोई नई नहीं है। विधानसभा चुनाव के बाद जहां सचिन पायलट मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार थे। वहींं अशोक गहलोत दिल्ली में जोड़-तोड़ कर मुख्यमंत्री बन गए थे। तब से ही दोनों नेता एक दूसरे को कमजोर करने का कोई मौका नहीं चूक रहे हैं।

कांग्रेस आलाकमान द्धारा भी राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट की लड़ाई को रोकने की दिशा में कोई सकारात्मक कार्यवाही नहीं की गई थी, जिस कारण इनकी लड़ाई दिन प्रतिदिन बढ़ती ही गई। आज स्थिति सचिन पायलट द्वारा पार्टी से बगावत करने तक पहुंच गई है।

दिसंबर 2018 के विधानसभा चुनाव में जब राजस्थान में कांग्रेस को बहुमत मिला तो प्रदेश के हर कांग्रेसी को यही लग रहा था कि युवा नेता सचिन पायलट का मुख्यमंत्री बनना तय है...

rajasthan political crisis news sachin pilot terminated from chief minister congress party is in big trouble
गहलोत के मुख्यमंत्री बनते ही पायलट समर्थको में जबरदस्त विरोध देखा गया था- फाइल फोटो - फोटो : पीटीआई

राजस्थान में कांग्रेस के प्रभारी राष्ट्रीय महासचिव अविनाश पांडे को चाहिए था कि समय रहते गहलोत और पायलट में सुलह करवाते। मगर अविनाश पांडे सुलह कराने की बजाय खुद गहलोत के पक्ष में खड़े नजर आते रहे। इससे गहलोत विरोधी विधायकों को लगने लगा कि केंद्रीय आलाकमान स्तर पर भी उनकी सुनवाई नहीं हो रही है।

जब जून माह में राज्यसभा के चुनाव थे उस वक्त भी गहलोत और पायलट खेमे में खुलकर टकराव हुआ था। लेकिन पांडे ने उस वक्त भी ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जिससे दोनों पक्ष संतुष्ट हो सके।


दिसंबर 2018 के विधानसभा चुनाव में जब राजस्थान में कांग्रेस को बहुमत मिला तो प्रदेश के हर कांग्रेसी को यही लग रहा था कि युवा नेता सचिन पायलट का मुख्यमंत्री बनना तय है। क्योंकि राजस्थान में कांग्रेस को उबारने में जितनी मेहनत सचिन पायलट ने की थी। उतनी शायद ही अन्य किसी नेता ने नहीं की थी।

फरवरी 2014 में जब सचिन पायलट को राजस्थान कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया उस वक्त राजस्थान में कांग्रेस के मात्र 21 विधायक थे।

दिसंबर 2013 में संपन्न हुए राजस्थान विधानसभा के चुनाव में अशोक गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस बुरी तरह हार चुकी थी तथा हर कांग्रेसी कार्यकर्ता का मनोबल टूट चुका था। ऐसे में सचिन पायलट ने प्रदेश अध्यक्ष बनते ही राजस्थान के हर जिले का धुआंधार दौरा किया व कार्यकर्ताओं से मिलकर उन्हें काम करने के लिए प्रेरित किया था।

विधानसभा चुनाव के दौरान भी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष होने के नाते सचिन पायलट ने पूरे चुनाव को फ्रंट से लीड किया था। पायलट ने भारतीय जनता पार्टी की वसुंधरा राजे सरकार की नाकामियों को आम जन जन तक पहुंचाया था। जिस कारण लोगों को लगा था कि एक युवा नेता के नेतृत्व में सरकार बनने से कांग्रेस पार्टी जनहित के मुद्दों पर काम करेगी।

मगर जैसे ही चुनाव परिणाम कांग्रेस के पक्ष में आए। अशोक गहलोत ने अपने दिल्ली संपर्कों के बल पर मुख्यमंत्री बन गए। गहलोत के मुख्यमंत्री बनते ही पायलट समर्थको में जबरदस्त विरोध देखा गया था। मगर उस वक्त कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी व कांग्रेस के अन्य बड़े नेताओं ने पायलट को मना कर उप मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलवा दी।


लेकिन धीरे-धीरे मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सरकार पर अपनी पकड़ बनानी शुरू कर दी। सरकार में पायलट व उनके समर्थकों की उपेक्षा की जाने लगी। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कई ऐसे लोगों को अपना विशेषाधिकार बनाया जिनकी कांग्रेस कार्यकर्ता के नाम पर कोई उपलब्ध नहीं थी।

इसके बाद मुख्यमंत्री गहलोत ने बिना पायलट की सहमति के प्रदेश के बड़े शिक्षण संस्थाओं, विश्वविद्यालयों में अपनी मनमर्जी के कुलपति, वाइस चांसलर लगा दिए।

2018 में गहलोत के मुख्यमंत्री बनने के बाद प्रदेश में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेसी सभी 25 सीटों पर बुरी तरह हार गई थी...

rajasthan political crisis news sachin pilot terminated from chief minister congress party is in big trouble
सचिन पायलट युवा हैं तथा उनके पास राजनीति करने को बहुत समय है- फाइल फोटो - फोटो : ट्विटर

ऐसा नहीं है कि सचिन पायलट ने पार्टी से यकायक बगावत कर दी हो। उन्होंने अपनी उपेक्षा की शिकायत बार-बार कांग्रेसी आलाकमान से की थी। मगर आलाकमान ने प्रभारी महासचिव अविनाश पांडे की अध्यक्षता में एक समन्वय समिति का गठन कर दिया। जो महज कागजी साबित हुई।

राजस्थान में सरकार बने डेढ़ साल से अधिक का वक्त हो जाने के बावजूद अभी तक कार्यकर्ताओं को राजनीतिक नियुक्तियां नहीं देने से कार्यकर्ताओं में सरकार के प्रति गहरा असंतोष है।

लॅाकडाउन के दौरान लोगों के बिजली के बिल माफ करने के लिए सचिन पायलट व उनके समर्थक मंत्रियों ने कई बार खुलकर मुख्यमंत्री से मांग की मगर मुख्यमंत्री ने उनकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया।


जिस तरह से कर्नाटक व मध्यप्रदेश में कांग्रेस के ही नाराज विधायको ने सरकार गिरा दी थी। वही कहानी राजस्थान में भी दोहराई जा सकती है। मौजूदा घटनाक्रम में भले ही अशोक गहलोत विजेता बन के उभरे हो। मगर कांग्रेस को इसका खामियाजा आने वाले दिनों में उठाना पड़ सकता है।

आज एक एक कर युवा नेता कांग्रेस छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं। इस बात को कांग्रेस आलाकमान को समझना होगा कि ऐसी परिस्थितियां क्यों उत्पन्न हो रही है। जिससे युवा नेतृत्व कांग्रेस से विमुख होता जा रहा।

सचिन पायलट के कांग्रेस छोड़ने से राजस्थान में प्रभावशाली गुर्जर जाति के मतदाता भी भविष्य में कांग्रेस से दूर होंगे। सचिन पायलट युवा हैं तथा उनके पास राजनीति करने को बहुत समय है।

इन सबके चलते भविष्य में पायलट तो फिर भी मजबूत होकर उभर सकते हैं। मगर अपने राजनीतिक जीवन की अंतिम पारी खेल रहे मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का पिछला इतिहास देखे तो पार्टी के लिए ज्यादा अच्छा नहीं रहा है। गहलोत के मुख्यमंत्री रहते कांग्रेस कभी दुबारा चुनाव नहीं जीत पाई है।


2018 में गहलोत के मुख्यमंत्री बनने के बाद प्रदेश में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेसी सभी 25 सीटों पर बुरी तरह हार गई थी। यहां तक कि अशोक गहलोत का खुद का बेटा भी जोधपुर से करीबन तीन लाख से अधिक वोटों से हार गया था। ऐसे में कांग्रेस नेतृत्व को सोचना चाहिए कि आज पार्टी को जहां अधिकाधिक संख्या में नए युवाओं को जोड़ने की आवश्यकता है। वही पुराने क्षत्रपों के चलते नए लोग पार्टी छोड़ कर जा रहे हैं। यह कांग्रेस के लिए अच्छी खबर नहीं है।

कांग्रेस में सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया, अशोक तंवर जैसे नेताओं को पार्टी छोड़ने से नहीं रोका गया तो दिन प्रतिदिन जनाधार खोती जा रही कांग्रेस को बचा पाना मुश्किल ही नहीं असंभव होगा।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed