राजस्थान चुनाव 2023: राजस्थान में पानी का संकट है बड़ा चुनावी मुद्दा, क्या गंभीर हैं राजनीतिक दल और नेता?
राजस्थान में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, लेकिन पानी के मुद्दे पर राजनीतिक पार्टियों में गंभीरता कम नजर आ रही है। नेता केवल बयानबाजी अधिक कर रहे हैं, जबकि ईस्टर्न राजस्थान कैनल प्रोजेक्ट (ईआरसीपी), जवाई बांध, पंजाब से गंगनहर में पानी छोड़ने और बीसलपुर बांध से किसानों को पानी न मिलने को लेकर आंदोलन चल रहे हैं। वहीं, शहरों में पानी का मुद्दा किसी खास चर्चा में नहीं है।
राजस्थान में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, लेकिन पानी के मुद्दे पर राजनीतिक पार्टियों में गंभीरता कम नजर आ रही है। नेता केवल बयानबाजी अधिक कर रहे हैं, जबकि ईस्टर्न राजस्थान कैनल प्रोजेक्ट (ईआरसीपी), जवाई बांध, पंजाब से गंगनहर में पानी छोड़ने और बीसलपुर बांध से किसानों को पानी न मिलने को लेकर आंदोलन चल रहे हैं। वहीं, शहरों में पानी का मुद्दा किसी खास चर्चा में नहीं है।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
राजस्थान की राजधानी जयपुर में एक मल्टी स्टोरी सोसाइटी में ट्यूबवेल सूख चुके हैं। 400 से अधिक परिवार पानी के टैंकरों के भरोसे चल रहे हैं। यह स्थिति केवल एक सोसायटी तक सीमित नहीं है। राज्यभर में कई रेजिडेंशियल इमारतों में यही हालात हैं। यही स्थिति किसानों की भी है। पानी नहीं होने के कारण फसलें सूख जाती हैं।
राज्य में चंद दिनों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, लेकिन पानी के मुद्दे पर राजनीतिक पार्टियों में गंभीरता कम नजर आ रही है। नेता केवल बयानबाजी अधिक कर रहे हैं, जबकि ईस्टर्न राजस्थान कैनल प्रोजेक्ट (ईआरसीपी), जवाई बांध, पंजाब से गंगनहर में पानी छोड़ने और बीसलपुर बांध से किसानों को पानी न मिलने को लेकर आंदोलन चल रहे हैं। वहीं, शहरों में पानी का मुद्दा किसी खास चर्चा में नहीं है।
राज्य में शुरू से रहा है पानी का संकट
राजस्थान का जिक्र आते ही सबसे पहले पानी की कमी का ख्याल आता है। खासकर पश्चिमी राजस्थान के जिले तो देश के सबसे ज्यादा सूखाग्रस्त हैं और यहां बेहद कम बारिश होती है। वर्तमान में कुछ-कुछ यही स्थिति पूर्वी राजस्थान में भी है। केवल हाड़ौती ही ऐसा क्षेत्र है, जहां पानी की समस्या थोड़ी कम है।
सबसे पहले ईआरसीपी की बात करते हैं। इस प्रोजेक्ट को तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की सरकार ने बनाने का वादा किया था। प्रोजेक्ट से पूर्वी राजस्थान के 13 जिलों जयपुर, भरतपुर, धौलपुर, करौली, टोंक, सवाई माधोपुर, दौसा, अजमेर, बूंदी, झालावाड़, कोटा व बारां की पेयजल और सिंचाई की जरूरतें पूरी होंगी।
हालांकि, वर्ष 2018 के दिसंबर में वसुंधरा सरकार सत्ता से बाहर हो गईं। कुछ दिनों तक यह मुद्दा लटका रहा, लेकिन वर्तमान अशोक गहलोत सरकार ने एक बार फिर इस प्रोजेक्ट को राष्ट्रीय परियोजना में शामिल करने की मांग करते हुए हवा दे दी।
मुख्यमंत्री का कहना था-
जयपुर और अजमेर की रैलियों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वादा किया था कि ईआरसीपी को राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा देंगे, लेकिन अब वो अपनी बात से मुकर रहे हैं।
पिछले दो-तीन साल से ईआरसीपी भाजपा और कांग्रेस के बीच में वाद-विवाद का बड़ा कारण बना हुआ है। हालांकि, जोधपुर सांसद और केंद्रीय जलशक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, जो मुख्यमंत्री गहलोत के बड़े प्रतिद्वंद्वी हैं, का स्पष्ट कहना है-
ईआरसीपी की डीपीआर में खामियां हैं और इसे राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा नहीं दिया जा सकता। मुख्यमंत्री समस्या के समाधान के बजाय इस मुद्दे पर राजनीति कर रहे हैं।
शेखावत ने पिछले दिनों इसी मुद्दे को लेकर पूर्वी राजस्थान का दौरा भी किया था। कारण, वर्ष 2018 के विधानसभा चुनावों में पूर्वी राजस्थान के जिलों में भाजपा को भारी नुकसान हुआ था और पार्टी इस बार कोई रिस्क नहीं लेना चाहती।
आखिर क्या है इस मुद्दे पर कांग्रेस की रणनीति?
कांग्रेस ईआरसीपी के बहाने इन 13 जिलों में चुनावी वैतरणी को पार करने के लिए प्रयासरत है। पिछले दिनों ईआरसीपी को लेकर बारां से कांग्रेस ने एक यात्रा भी निकाली, जिसकी शुरुआत के समय राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने सभा को संबोधित किया था। इस मुद्दे पर घिरती देख भाजपा ने पिछले दिनों ईआरसीपी को नदी जोड़ो परियोजना से जोड़ दिया।
केंद्रीय मंत्री शेखावत का तर्क है कि ईआरसीपी और पार्वती-कालीसिंध-चंबल लिंक प्रोजेक्ट से न केवल राजस्थान, बल्कि मध्यप्रदेश में भी सिंचाई और पेयजल की 30 साल तक जरूरतों को पूरा किया जा सकेगा।
पाली जिले के जवाई बांध के पानी को लेकर भी विवाद चल रहा है। क्षेत्र के लोग आंदोलन कर रहे हैं। किसान सड़कों पर हैं। यह मुद्दा भी भाजपा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का बन गया है। पाली के सांसद पीपी चौधरी ने राज्य सरकार पर राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति के लिए पाली जिले की जनता के साथ अन्याय करने का आरोप लगाया है। जवाई बांध से पाली, सिरोही और जालोर जिले सिंचाई से जुड़े हुए हैं।
कई गांवों के किसान लंबे समय से विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। इसी तरह टोंक जिले में बने बीसलपुर बांध के पानी को लेकर किसान आंदोलन कर रहे हैं। बीसलपुर से अजमेर और जयपुर की पेयजल जरूरतें पूरी होती हैं, लेकिन किसानों का कहना है कि बांध का पूरा पानी पेयजल में सुरक्षित रखने से उनके खेत सूख रहे हैं।
अब तो किसान महापंचायत में किसानों ने सरकार को नहरों में पानी छोड़ने के लिए 7 दिन का अल्टीमेटम भी दिया है और 2 नवंबर को महापंचायत बुलाई है।
श्रीगंगानगर क्षेत्र में पंजाब से आ रही गंगनहर के पानी को लेकर भी विवाद गर्मा रहा है। राजस्थान के किसानों का आरोप है कि पंजाब निर्धारित मात्रा में राजस्थान के लिए पानी नहीं छोड़ता। किसान हर साल इस मुद्दे पर आंदोलन करते हैं। इस बार भी 23 अगस्त से किसानों का आंदोलन जारी है। वो नेशनल हाईवे जाम कर चुके हैं। किसानों का यहां तक आरोप है कि पंजाब की आम आदमी पार्टी सरकार इस मामले में मनमाना तरीका अपना रही है।
पंजाब से पानी को पाकिस्तान की तरफ छोड़ा जा रहा है। अगर यही पानी राजस्थान की तरफ छोड़ा जाता है तो यहां किसानों की समस्याओं को दूर किया जा सकता है। पानी की बड़ी समस्या राजस्थान में दिखाई तो देती है, लेकिन फिलहाल यह प्रमुख चुनावी मुद्दों में शामिल नहीं है। कुल मिलाकर पानी का मुद्दा किस पार्टी को कितने वोट दिलाएगा, यह चुनावी नतीजों से ही पता चलेगा।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।