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परीक्षा परिणाम और तनाव: आखिर किस दौड़ और होड़ में शामिल हो रहे हैं हमारे बच्चे?

Tue, 07 May 2024 12:43 PM IST
Dr.Naaz Parveen डॉ. नाज परवीन
Updated Tue, 07 May 2024 12:43 PM IST
सार

मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि पढ़ाई के दौरान बच्चों को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसमें पढ़ाई से संबंधित समस्याएं तो रहती ही हैं लेकिन शारीरिक एवं मानसिक समस्याएं, अकेलापन, एकाग्रता का कम होना, वर्तमान में सोशल मीडिया और मोबाइल का अत्याधिक प्रयोग भी ज्यादातर समय तनाव में रहने के लिए जिम्मेवार हैं।

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Pressure Of Exam Marks And Rising Number Of Depression In Children
हम समझ ही नहीं पा रहे कि हम अपने बच्चों को जीवन की किस दौड़ में शामिल करा रहे हैं। - फोटो : Istock

विस्तार

अभी हाल ही में बच्चों के यूपी बोर्ड के हाईस्कूल और इंटर के नतीजे आए हैं। अब जल्द ही सी.बी.एस.ई.के परिणाम आ जाएंगे। ये परीक्षाएं और इनके परिणाम महत्वपूर्ण होते हैं, खास इसलिए भी क्योंकि ये 10-12 वर्षों की लगातार मेहनत का फल माने जाते हैं।

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इस समय बच्चों सहित पूरे परिवार का ध्यान केवल बच्चों के अंकों के उतार-चढ़ाव पर ही रहता है जिसके 99 प्रतिशत अंक आते हैं उसे 1 प्रतिशत कम आने का गम घेरता है जिसकी तीसरी पोजीशन होती है उसको दूसरी पोजीशन और दूसरे वाले को पहली रैंक ज्यादा आकर्षित करती है इसलिए खुशियों के माहौल में संतुष्टि नदारद रहती है।

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अंकों के फेर में उलझी जिंदगी 

हम सभी इस दौर से होकर गुजरे हैं पहले और आज के रिजल्ट आने की प्रक्रिया और परिणामों में बहुत परिवर्तन हो चुके है। पहले ज्यादातर माता-पिता, जो कम पढ़े लिखे होते थे और उन्हें मनोविज्ञान के विषय में जानकारी नहीं थी लेकिन वे बच्चों का मानसिक दबाव कम करने का काम बखूबी जानते थे।

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वे 10वीं-12वीं की कक्षाएं प्रारंभ होने के साथ ही यह कहना आरंभ कर देते थे कि "पास होने भर के अंक आ जाएं बस, चाहे थर्ड क्लास ही क्यों न आए, बस पास हो जाना "ज्यादातर माता पिता सिलेबस और पढ़ाई के डेली रूटीन से भी अंजान रहते थे। उनकी प्रार्थना और दुआएंं भी बच्चे के पास होने तक ही रहती थी। शायद उनका डर उनकी ख्वाहिश से बड़ा रहता था कि कहीं बच्चों को तनाव न हो जाए। 

हालांकि, पहले 60 प्रतिशत अंक आने में गांव में हफ्तों चर्चाएं हुआ करती थी, जिनके 60% अंक आते थे। उनके माता-पिता का सीना गर्व से महीनों तक फूला रहता था। इसके विपरीत अब तो 80 प्रतिशत अंक भी संतुष्टि के दायरे से बहार कर दिए गए हैं, जिसका परिणाम है की हम बच्चों में अनावश्यक दबाव बढ़ाते जा रहे हैं।

हम समझ ही नहीं पा रहे कि हम अपने बच्चों को जीवन की किस दौड़ में शामिल करा रहे हैं। जहां मंजिल पर पहुंच कर नंबर वन बने रहने की भूख उन्हें खोखला बना रही है और जीवन के आनंद से वो वंचित हो रहे हैं।
   
इधर, पहले भी सबसे संवेदनशील रिजल्ट के तौर पर 10-12 वीं का ही परिणाम था। हफ्तों पहले से परिवार वाले बच्चों पर नजर बनाए रखते थे। इतने पर भी बहुत सारे बच्चे परिणाम आने के पहले और बाद में आत्महत्या करने की कोशिश करते थे। कुछ के तो आत्महत्या के बाद आने वाले परीक्षा परिणाम में बहुत अच्छे नंबर भी होते थे जिन्हें देख उनके माता-पिता जीवन भर का दुःख सहन करने के लिए मजबूर हो जाते थे।

आस-पड़ोस वाले उन बच्चों का उदाहरण देकर दूसरे बच्चों को मोटिवेट किया करते थे ताकि वो कोई गलत कदम न उठाए, जिसका परिणाम होता था कि बच्चे अंकों की दौड़ में जीवन में संतुलन बनाना सीख लेते थे और बड़ी परीक्षाओं में फेल होने पर भी जीवन की परीक्षा में वे पास हो जाते थे। तब कोटा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि विभिन्न स्थानों से इतनी बड़ी संख्या में हृदय विदारक खबरे कम ही आती थी तब सबसे संवेदनशील पड़ाव 10-12वीं ही हुआ करते थे।

ऐसा नहीं है की आज के माता पिता बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान नहीं रखते हैं। बस नंबर और कैरियर की प्रतिस्पर्धा उनमें ठूस-ठूस कर भर रहे हैं जो बच्चों को खुद को समझने, समझाने का मौका नहीं देते। 

Pressure Of Exam Marks And Rising Number Of Depression In Children
आज के दौर में तनाव एक ऐसी समस्या है जो बच्चों में भी तेजी से अपनी पैठ बना रहा है। - फोटो : Istock

उन्हें यह समझाना बेहद जरूरी है कि नंबरों के इतर भी खूबसूरत दुनिया है। कम अंकों वाले भी दुनिया में बड़ी उपलब्धियां हासिल करते हैं। अपने परिवार और देश का नाम रौशन करते हैं। तनाव का हल आत्महत्या नहीं बल्कि मजबूती से खुद को नई चुनौतियों के लिए तैयार करना होता है। खुद को तनाव से बाहर निकालना होता है।

दुनिया के महान मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि बच्चें जैसे-जैसे बड़े होते हैं उनके मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल और भी जरूरी हो जाती है। माता पिता को उन्हें समझना जरूरी हो जाता है। हर बच्चे में कोई ना कोई विशेष गुण होता है, कुछ बच्चे पढ़ने में अच्छा करते हैं तो कुछ का मन पढ़ने में बिल्कुल नहीं लगता उन्हें कुछ और करना होता है इस पर हम नंबरों का दबाव उनपर बनाते हैं जो किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं है। 

मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि बच्चों को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है जैसे- पढ़ाई से संबंधित समस्याएं, शारीरिक एवं मानसिक समस्याएं, अकेलापन, एकाग्रता का कम होना, वर्तमान में सोशल मीडिया और मोबाइल का अत्याधिक प्रयोग भी ज्यादातर समय तनाव में रहने के लिए जिम्मेवार हैं। ऐसे में उनका विशेष ध्यान रखने के बजाए हम उन पर अनावश्यक दबाव बनाये जा रहे हैं, जो किसी भी दृष्टि से सही नहीं है।

 


बच्चों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर है लगातार तनाव में रहना 

आज के दौर में तनाव एक ऐसी समस्या है जो बच्चों में भी तेजी से अपनी पैठ बना रहा है। अब बच्चे घर छोड़ने के बात " मम्मी ने जलेबी बनाई है" सुनकर नहीं लौटते जैसे 90 के दशक के टीवी एड में दिखाया जाता था। बच्चों की जरूरतें पहले से ज्यादा विकसित हो गई हैं।

उनके सलाहकार गूगल बाबा हैं। जो सवाल से जवाब तक और मर्ज से इलाज तक मिनटों में ढूंढ लेते हैं। परिवार सीमित हो गए हैं। रिश्तों के नाम पर औपचारिकता का बोल बाला है जिसके कारण बच्चों को समझने समझाने वाले कांधे कम होते जा रहे और लगातार मनोचिकित्सकों की डिमांड बढ़ती जा रही है जो की भारत जैसे विकासशील देश में, देश के हर कोने में पहुंच से बाहर हैं। अभी मनोचिकित्सकों की कमी को पूरा करने में समय लगेगा।

ऐसे में किशोर अवस्था से गुजरते हुए दौर में बच्चों के बढ़ते तनाव पर खासी नजर रखने की आवश्यकता है। घर और स्कूल, कॉलेजों में बच्चों की समय-समय पर काउंसलिंग करवाने की जरूरत है। बच्चे ही देश का भविष्य हैं इनके मानसिक स्तर का मजबूत होना देश हित के लिए बेहद जरूरी है। भारत युवाओं का देश है और हर बच्चे में कुछ खास गुण जन्मजात होते हैं जिन्हें पहचान उन्हें आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करने का काम माता पिता और शिक्षकों का है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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