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सिंधु की व्यथा: लुप्त होते ग्लेशियर और अनियंत्रित भीड़

Thu, 02 Jul 2026 10:01 AM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Thu, 02 Jul 2026 10:01 AM IST
सार

सिंधु नदी का जलसंभरण क्षेत्र (Indus River Basin) दुनिया के सबसे संवेदनशील और विशाल भौगोलिक तंत्रों में से एक है। लगभग 11 लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में फैले इस बेसिन का एक बड़ा हिस्सा चीन (तिब्बत), भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान तक फैला है।

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Plight of the Indus: Vanishing Glaciers and Uncontrolled Crowds
सिंधु नदी केवल दो देशों के बीच पानी के बंटवारे (सिंधु जल समझौता) का भू-राजनीतिक मुद्दा नहीं है; यह एक साझा प्राकृतिक धरोहर है जिसके बिना इस उपद्वीप के वजूद की कल्पना भी नहीं की जा सकती। - फोटो : जयसिंह रावत

विस्तार

जिस नदी के नाम से इस उपमहाद्वीप को 'इंडिया' और 'हिंदुस्तान' जैसी वैश्विक पहचान मिली, जिसने अपनी कोख में मानव इतिहास की सबसे गौरवशाली 'सिंधु घाटी सभ्यता' को पाला-पोसा, आज वही सिंधु नदी आधुनिक विकास, मानवीय लालच और पर्यावरणीय उदासीनता के दोहरे पाटों के बीच सिसक रही है।

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एशिया की यह सबसे विशाल और ऐतिहासिक जलधारा केवल पानी का बहाव नहीं, बल्कि सदियों की सांस्कृतिक विरासत, आध्यात्मिक चेतना और करोड़ों लोगों की जीवनरेखा है। लेकिन आज तिब्बत के मानसरोवर से लेकर लद्दाख और पाक-अधिकृत कश्मीर के गिलगित-बाल्टिस्तान से गुजरते हुए अरब सागर तक जाने वाली यह जीवनदायिनी खुद अपने अस्तित्व के सबसे गंभीर संकट से जूझ रही है।
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विशाल जलसंभरण क्षेत्र और उसकी नाजुक बनावट

सिंधु नदी का जलसंभरण क्षेत्र (Indus River Basin) दुनिया के सबसे संवेदनशील और विशाल भौगोलिक तंत्रों में से एक है। लगभग 11 लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में फैले इस बेसिन का एक बड़ा हिस्सा चीन (तिब्बत), भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान तक फैला है।
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इस तंत्र की सबसे बड़ी विशेषता इसका 'क्रायोस्फीयर' (जमे हुए पानी का क्षेत्र) है। ध्रुवों के बाहर, यह क्षेत्र दुनिया के सबसे बड़े गैर-ध्रुवीय बर्फ भंडार 'थर्ड पोल' (तीसरा ध्रुव) का हिस्सा है।

सिंधु नदी के कुल सालाना प्रवाह का लगभग 40 से 50 प्रतिशत हिस्सा ग्लेशियरों और मौसमी बर्फ के पिघलने से आता है। यही कारण है कि यह नदी शुष्क और पहाड़ी इलाकों में भी करोड़ों लोगों के लिए मीठे पानी, कृषि और ऊर्जा का एकमात्र सहारा बनी हुई है।

ग्लेशियरों का सिकुड़ना: 'आईसीआईएमओडी' की चेतावनी

जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापमान (ग्लोबल वार्मिंग) ने सिंधु के इस 'वॉटर टॉवर' की बुनियाद को हिलाकर रख दिया है। 'इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट' (ICIMOD) द्वारा जारी 'एचकेएच ग्लेशियर आउटलुक' की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियरों के पिघलने की गति वर्ष 2000 के बाद से दोगुनी हो चुकी है।

रिपोर्ट के चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि सन 1990 से 2020 के बीच इस क्षेत्र ने अपने कुल ग्लेशियर क्षेत्र का लगभग 12 प्रतिशत और बर्फ के भंडार का 9 प्रतिशत हिस्सा हमेशा के लिए खो दिया है। सिंधु बेसिन के रुलोंग और हुंजा जैसे ग्लेशियर हर साल कई मीटर पीछे खिसक रहे हैं।

वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी (WIHG) के वैज्ञानिकों का भी मानना है कि सर्दियों में होने वाली भारी बर्फबारी अब खिसककर मार्च और मई के महीनों में हो रही है, जिससे ग्लेशियरों को खुद को दोबारा रीचार्ज करने का समय नहीं मिल पा रहा है।

पर्यटन का अनियंत्रित दबाव और भारी भीड़ के आंकड़े

सिंधु बेसिन के ऊपरी इलाकों, विशेषकर लद्दाख, सोनमर्ग और हिमाचल के पर्वतीय क्षेत्रों में 'पर्यटन' और 'यात्रा' के नाम पर जो कुछ हो रहा है, उसे विशेषज्ञ 'पारिस्थितिकीय आत्महत्या' (Ecological Suicide) कह रहे हैं। लद्दाख जैसे ठंडे रेगिस्तान में, जहां की वहन क्षमता (Carrying Capacity) बेहद सीमित है, हर साल पर्यटकों की संख्या स्थानीय आबादी से कई गुना अधिक हो जाती है।

पिछले कुछ वर्षों के आंकड़ों पर नज़र डालें, तो अकेले लद्दाख में सालाना 5 से 6 लाख से अधिक पर्यटक पहुँच रहे हैं, जबकि वहाँ की स्थायी आबादी बमुश्किल 3 लाख के आसपास है। संवेदनशील ऊंचाइयों पर स्थित इन क्षेत्रों में इतनी भारी भीड़ के कारण पहाड़ों पर कचरे, विशेषकर सिंगल-यूज़ प्लास्टिक का अंबार लग गया है।

वाहनों का धुआं, धूल और 'ब्लैक कार्बन' का जानलेवा हमला

इस विनाश लीला में सबसे खतरनाक भूमिका निभा रहा है वाहनों का प्रदूषण और 'ब्लैक कार्बन'। वाडिया इंस्टीट्यूट और 'क्लाइमेट ट्रेंड्स' के शोध बताते हैं कि पर्यटन सीज़न (अप्रैल से जून) के दौरान पहाड़ों में डीजल और पेट्रोल वाहनों की अंतहीन कतारें लगती हैं।

इन वाहनों के धुएं, जंगलों की आग और निर्माण कार्यों से निकलने वाले बारीक कण हवा में तैरकर ग्लेशियरों की सफेद चादर पर जमा हो जाते हैं। इसे वैज्ञानिक भाषा में 'ब्लैक कार्बन' (Black Carbon) कहा जाता है।

सफेद बर्फ सूरज की किरणों को परावर्तित (Reflect) कर देती है, जिससे वह पिघलती नहीं है। लेकिन जब ब्लैक कार्बन की काली परत इस बर्फ पर जमती है, तो वह सूरज की गर्मी को सोखने लगती है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, इस प्रक्रिया ने पिछले दो दशकों में हिमालय की बर्फ की सतह के तापमान को लगभग 4 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा दिया है, जिससे ग्लेशियर समय से पहले और बहुत तेजी से पिघल रहे हैं।

इसके अलावा, पर्यटन के लिए चौड़ी की जा रही सड़कों और अनियोजित निर्माण कार्यों से उड़ने वाली धूल भी ग्लेशियरों की सतह को गंदा कर रही है, जिससे उनका 'अल्बीडो' (प्रकाश परावर्तन क्षमता) लगातार कम हो रहा है।

बदलती जल-रसायन संरचना और तबाही का अंदेशा

ग्लेशियरों के इस अभूतपूर्व क्षरण का असर केवल पानी की मात्रा पर ही नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता पर भी पड़ रहा है। 'मोंगबे' में प्रकाशित हालिया भू-रासायनिक अध्ययनों के अनुसार, तेजी से पिघलते ग्लेशियरों के कारण पानी का चट्टानों से संपर्क असामान्य रूप से बढ़ गया है।

इससे सिंधु नदी तंत्र के पानी में रसायनों और भारी धातुओं (Trace Metals) की मात्रा में बदलाव देखा जा रहा है, जो नीचे रहने वाले समाज के स्वास्थ्य और कृषि के लिए एक नया खतरा है।

इससे भी भयानक खतरा 'ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड' (GLOAF) यानी ग्लेशियर पिघलने से बनने वाली अस्थायी झीलों के फटने का है। सिंधु बेसिन में ऐसी हजारों असुरक्षित झीलें बन चुकी हैं, जो कभी भी केदारनाथ या चमोली जैसी आपदा को दोहरा सकती हैं। शुरुआती दौर में ग्लेशियर पिघलने से नदियों में पानी बढ़ेगा, जिससे विनाशकारी बाढ़ आएगी और फिर उसके बाद का दौर भयावह सूखे का होगा।

समय समाप्त हो रहा है

सिंधु नदी केवल दो देशों के बीच पानी के बंटवारे (सिंधु जल समझौता) का भू-राजनीतिक मुद्दा नहीं है; यह एक साझा प्राकृतिक धरोहर है जिसके बिना इस उपद्वीप के वजूद की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

यदि हमें इस ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को बचाना है, तो 'ग्रीन टूरिज्म' और 'कैरिंग कैपेसिटी' के सिद्धांतों को केवल कागजों पर नहीं, बल्कि जमीन पर सख्ती से लागू करना होगा। संवेदनशील ग्लेशियर क्षेत्रों में वाहनों के प्रवेश को सीमित करना, पर्यावरण-कर लगाना और ब्लैक कार्बन के उत्सर्जन को युद्ध स्तर पर रोकना अब वैकल्पिक नहीं, बल्कि अनिवार्य है।

संयुक्त राष्ट्र ने भी इस संकट को भांपते हुए 'क्रायोस्फेरिक साइंसेज के लिए कार्रवाई का दशक (2025-2034)' घोषित किया है। इतिहास गवाह है कि जिन सभ्यताओं ने अपनी जीवनदायिनी नदियों का सम्मान नहीं किया, वे इतिहास के पन्नों में दफन हो गईं।

सिंधु नदी आज हमसे चीख-चीखकर अपने संरक्षण की भीख मांग रही है। यदि हम अब भी नहीं जागे, तो आने वाली पीढ़ियों को यह बताने के लिए हम जीवित नहीं बचेंगे कि कभी इसी नदी के किनारे बैठकर हमारे ऋषियों ने वेदों की ऋचाएं रची थीं।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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