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दार्शनिकों से सीखें: वृद्धावस्था अवसान नहीं, आत्मिक उन्नति का समय

Fri, 17 Apr 2026 07:39 AM IST
Nitin Gautam सिसरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
सिसरो, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Nitin Gautam Updated Fri, 17 Apr 2026 07:39 AM IST
सार

यदि कोई व्यक्ति लगातार नई चीजें सीखता रहता है और खुद को सक्रिय रखता है, तो उसका दिमाग कभी वृद्ध नहीं हो सकता। इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण वे महान दार्शनिक हैं, जिन्होंने ढलती उम्र में अपनी सर्वश्रेष्ठ रचनाएं लिखीं।

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philosophy Old Age Is Not an End but a Time for Spiritual Growth
blog - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

वृद्धावस्था जीवन का वह संध्या काल है, जिसे अक्सर ‘अवसान’ मान लिया जाता है, लेकिन यही परिपक्वता और आध्यात्मिक विजय का स्वर्ण युग है। जो लोग जीवन भर अच्छे गुण और ज्ञान जुटाते हैं, उनके लिए जीवन का आखिरी पड़ाव सबसे खुशहाल समय बन जाता है।
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लोग अक्सर वृद्धावस्था से इसलिए डरते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि यह उन्हें सक्रिय जीवन से दूर कर देती है, शरीर को कमजोर करती है, इंद्रिय सुखों को छीन लेती है और मृत्यु के निकट ले जाती है। वृद्धावस्था व्यक्ति को शारीरिक श्रम से भले ही दूर कर दे, पर यह उसे मानसिक और बौद्धिक कार्यों के उच्चतम शिखर पर भी पहुंचा देती है। जैसे, एक बड़े जहाज को चलाने में केवल वे युवा महत्वपूर्ण नहीं होते, जो मस्तूल पर चढ़ते हैं या डेक पर भाग-दौड़ करते हैं, बल्कि वह वृद्ध और अनुभवी कप्तान सबसे महत्वपूर्ण होता है, जो शांत भाव से जहाज की कमान थामे रहता है। महान कार्य शारीरिक शक्ति या फुर्ती से नहीं, बल्कि अनुभव, चरित्र और निर्णय की शक्ति से सिद्ध होते हैं, जो समय के साथ ही परिपक्व होते हैं।
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यदि कोई वृद्ध व्यक्ति नई चीजें सीखना जारी रखता है और अपने मस्तिष्क को सक्रिय रखता है, तो उसकी बौद्धिक धार कभी कम हो ही नहीं सकती। इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण वे महान दार्शनिक हैं, जिन्होंने ढलती उम्र में अपनी सर्वश्रेष्ठ रचनाएं लिखीं। वृद्धावस्था हमें उन शारीरिक इच्छाओं और आवेगों के कोलाहल से मुक्त कर देती है, जो युवावस्था में अक्सर विवेक को बाधित करते हैं। यह ‘इंद्रिय सुखों का अंत’ वास्तव में आत्मा की स्वतंत्रता की शुरुआत है, जहां व्यक्ति आत्म-चिंतन और सार्थक संवाद में वास्तविक आनंद पा सकता है। वृद्धावस्था तो एक फल के समान है। जैसे कच्चे फल को पेड़ से तोड़ने के लिए बल की आवश्यकता होती है, पर पका हुआ फल स्वयं ही सहजता से गिर जाता है, वैसे ही एक पूर्ण और सद्गुणी जीवन जीने वाले बुजुर्ग के लिए अंत भी सहज और शांतिपूर्ण होता है। इसलिए, ढलती उम्र ‘अवसान’ नहीं, बल्कि जीवन के अनुभवों का मधुर ‘फलन’ है।
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