फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   people are praising the kashmir files movie country is sorry for the kashmiri pandits situation

फिल्म कश्मीर फाइल्स: आखिर क्यों उमड़ रहा है जनसैलाब? क्यों दिल को छू रही है फिल्म?

Wed, 16 Mar 2022 07:10 PM IST
Ashish koul आशीष कौल
Updated Wed, 16 Mar 2022 07:10 PM IST
सार

पूरे देश में पहले कश्मीरी पंडित और फिर दूसरे दर्शक तरह तरह से टिकट का जुगाड़ करके फिल्म देखने पहुंच रहे हैं। तो क्या बहुत लम्बे समय बाद कोई अच्छी फिल्म आई है? या कि इस से शानदार फिल्म बनी ही नहीं? क्या कश्मीर इस फिल्म के पहले फिल्मों में नहीं था? कश्मीर और आतंकवाद तो पहले भी कई फिल्मों का विषय रहे हैं न? फिर? 

विज्ञापन
people are praising the kashmir files movie country is sorry for the kashmiri pandits situation
पूरे देश में पहले कश्मीरी पंडित और फिर दूसरे दर्शक तरह-तरह से टिकट का जुगाड़ करके फिल्म देखने पहुंच रहे हैं। - फोटो : ANI

विस्तार

इंस्टाग्राम और यू-ट्यूब पर सोने जागने वाली एक पूरी पीढ़ी एक झटके में नींद से जागी है। फिल्म हॉल भारत माता की जय के नारों से गूंज रहे हैं। एक कुत्ते और गाय पर हिंसा होने पर उसकी रक्षा के लिए आवाज उठाने वाला हमारा तथाकथित संवेदनशील समाजजो 32 साल से चुप्पी साधे बैठा रहा, आज इस फिल्म से वो खुद को परेशान पा रहा है। कहा जा रहा है कि ये फिल्म हिंदुत्व और राष्ट्रवादी एजेंडे को पोषित कर रही है, मुसलामानों को विलेन बना रही है। इस एक फिल्म को सवालों के घेरे में डालने वाले उन कई फिल्मों को भूल जाते हैं जहां मुसलमान ही हीरो था, मुसलमान ही कश्मीर में पीड़ित था और जो आतंकवाद था और है, उसकी जिम्मेदारी पड़ोसी मुल्क की ही रही है। 

विज्ञापन


कमोबेश ये बिल्कुल वो ही लाइन थी जो सरकारों ने पिछले 32 साल से पकड़ी हुई थी। अगर हैदर जैसी फिल्में, मिशन कश्मीर जैसी फिल्में, दिल से जैसी फिल्में सेक्युलर थीं, तो ये फिल्म अलग कैसे हो गई ? अगर वो मुसलामानों की पीड़ा दिखा रही थी तो ये कश्मीरी पंडितों के साथ जो हुआ वो ही तो दिखा रही है। ये बात अलग है कि दशकों से प्रचारित तथाकथित छद्म सत्य के चेहरे पर ये फिल्म एक तमाचा है। अब तक पाक प्रायोजित आतंकवाद के दावे और कहानियां गढ़ने और बेचनेवालों को शायद हजम ही नहीं हो रहा कि 32 साल पहले और उसके बाद कुछ साल तक भी अगर स्थानीय मुसलमान के मन में नफरत न आती, अगर वो न चाहते या वो अलगाव वादी ताकतों का साथ न देते तो कश्मीरी पंडितों को घाटी कभी न छोड़नी पड़ती। 
विज्ञापन


वो कोई बाहरी ताकत नहीं कश्मीर के अंदर पड़ोसियों और दोस्तों के तौर पर रह रहे कुछ मुसलमान परिवार थे, जिनकी असुरक्षा और जिनके लालच के चलते अलगाव वादी ताकतों को मदद मिली और 1990 कश्मीरी पंडितों की जिंदगियों में आया। कश्मीरी पंडित तो कुछ खुले खयालात वाले अपने मुसलमान भाइयों पर विश्वास के सहारे 1990 तक घाटी में रह ही रहे थे। छह बार के विस्थापन और 700 साल के दमन के इतिहास के बाद भी कश्मीरियत पर उनका विश्वास जिंदा था। 
विज्ञापन
विज्ञापन


शायद इसलिए ही वो इस खतरे को भांप ही नहीं पाए कि उनकी जिंदगी में 19 जनवरी 1990 भी आ सकता है। एक राष्ट्र के तौर पर हम इसे पिछले तीन दशकों से झुठलाते रहे हैं क्यूंकि वो हमारी 'सेक्युलर' अवधारणा को जंच नहीं रहा था। मैं कई मंचों से ये कहता रहा हूं कि अगर हम वाकई कोई समाधान चाहते हैं तो काले को काला और सफेद को सफेद कहना होगा। अगर स्थानीय मुसलामानों का साथ अलगाववादी ताकतों को नहीं मिलता है तो इतनी बड़ी सुरक्षा सेना के बावूजूद विस्फोट और हत्याएं कैसे हो रही हैं? क्या सब सीमा पार से आ रहे हैं? अगर हां तो ये सीमा पर खड़े सैनिकों के बल और सामर्थ्य पर शक करना है।

पूरे देश में पहले कश्मीरी पंडित और फिर दूसरे दर्शक तरह-तरह से टिकट का जुगाड़ करके फिल्म देखने पहुंच रहे हैं। तो क्या बहुत लम्बे समय बाद कोई अच्छी फिल्म आई है? या कि इस से शानदार फिल्म बनी ही नहीं? क्या कश्मीर इस फिल्म के पहले फिल्मों में नहीं था?

कश्मीर और आतंकवाद तो पहले भी कई फिल्मों का विषय रहे हैं न? फिर? एक कश्मीरी पंडित होने के नाते, ये दावे से कह सकता हूं कि हमारी फिल्मों ने भी कश्मीरी पंडित को कश्मीर से ऐसे निकाल फेंका था कि उनका कोई खास जिक्र या उनके साथ 32  साल पहले जो हुआ वो कभी किसी पटकथा के लिए चुना ही नहीं गया।


एक आम कश्मीरी पंडित बंगलौर, दिल्ली, मुंबई, चंडीगढ़ में बैठा जब अपने कश्मीर को याद करता था तब वो सबसे अकेला होता था क्यूंकि अखंड भारत के कश्मीर में उनके साथ जो हुआ वो सच न तो किसी को पता था और न ही किसी ने पता करने की कोशिश ही की। किसी ने उन्हें डरपोक कह दिया, किसी ने कायर, तो किसी ने उनके वादी छोड़ने के कारणों पर ही प्रश्न चिन्ह लगा मारा। 

इन सबसे ऊपर रही भारतीय मीडिया जो पत्थरबाजों की बात करती रही, वादी में रह रहे मुसलमान युवकों पर अत्याचार की बात की, अर्ध विधवाओं की बात की, कश्मीर के हर उस पहलु की बात की जो तथाकथित 'सेक्युलर' और 'निष्पक्ष' कहलाए जाने की आम अवधारणा के लिए जरूरी था। पर कश्मीरी पंडित, वो कहां थे?

अखबार उठाइए, पिछले कई साल से वो हर 19 जनवरी को याद आए। कभी किसी रिफ्यूजी कैंप से किसी पढ़ लिखकर आगे बढ़ते कश्मीरी पंडित बच्चे की कहानी थी तो कहीं रस्मी तौर पर जंतर-मंतर पर अपने हक के लिए तख्तियों के साथ कश्मीरी पंडितों की फोटो भी दिखी। जो नहीं दिखा वो थी 'संवेदनशीलता'।

people are praising the kashmir files movie country is sorry for the kashmiri pandits situation
सरसरी तौर पर कहें तो फिल्म लाखों कश्मीरी पंडित के दिल को छू गई है। - फोटो : twitter

मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि 'कश्मीर फाइल्स' ने 32  साल से अपनी अपनी जिंदगियां हजारों जद्दोजेहद के बाद दुबारा शुरू करने वाले एक आम कश्मीरी पंडित के दर्द को ज़ुबान दी है। वो आम कश्मीरी पंडित फिल्म हॉल, खुद को मिली पीड़ा याद करने नहीं जा रहा। वो वहां जाकर खुद को विश्वास भी दिला रहा है कि उसका निर्णय उन परिस्थितों में बिल्कुल सही था। 

वो सुकून पा रहा है कि उसको सवालों के घेरे में रखने वाला एक आम पड़ोसी जब उनसे अब ये सवाल कर रहा है कि 'कॉल साब इतना सब कैसे झेला?’उस देश में जहां वो रिफ्यूजी बनकर जी रहे हैं, वो उनका है और देशवासी अब कश्मीरी पंडितों के साथ जो हुआ उसके खिलाफ उनके साथ हो रहे हैं, ये देखने पहुंचता है कश्मीरी पंडित। बल्कि मुझे तो ऐसा भी लगता है कि सच से अनजान कश्मीरी पंडितों की अगली पीढ़ी भी कश्मीर फाइल्स को विस्मय देख रही है। फेसबुक और इंटाग्राम पर जिस तरह किशोर और युवा अपने मां बाप दादा दादी की सहनशक्ति, प्रेम और सद्भाव की बात कर रहे हैं वो ऐसा साफ लग रहा है कि उन्होंने उनसे असली परिचय अब किया है।

तो 'कश्मीर फाइल्स' ने क्या किया ? मैं ये खुद से बार बार पूछ रहा हूं। क्यूंकि कश्मीर और कश्मीरी पंडित नरसंहार पर पिछले कुछ साल से कई किताबें और शोध तो मैंने भी देखे। कश्मीर और कश्मीरी पंडितों से जुड़े इतिहास को समझते हुए तीन किताबें मैंने भी लिखी हैं। अथक प्रयासों से हमने युवाओं से संवाद भी स्थापित किया। इसलिए जमीनी हकीकत मैं बखूबी समझता हूं। बहुत अंधेरा है झूठ का, फरेब का। मेहनत और समय दोनों लगता है जब आप कश्मीरी पंडितों के बारे में अपनी बात रखना शुरू करते हैं। क्यूंकि झूठ इस कदर बोला गया कि सच सुनाने के लिए कान खोजने पड़ते हैं। ऐसे में 'कश्मीर फाइल्स' ऑडियो विजुअल माध्यम की शक्ति को सिद्ध कर रही है।

सरसरी तौर पर कहें तो पहले उन करीब 6 लाख कश्मीरी पंडितों की जुबां बनती दिखी और फिर अभी एक हफ्ता नहीं हुआ है पर फिल्म हॉल में देखिए तो एक तरह से ये एक नेशनल गिल्ट में तब्दील जा रही है। एक देश के रूप में हम कहां चूके? अगर हम केरल से कारगिल घाटी तक सारा देश हमारा के नारे लगाते रहे हैं, तो हम और सरकारें कहां थी अब तक? 370 की जंग कहां पहुंची?

क्या कश्मीरी पंडितों के वापिस लौटने का वक्त आ गया है? क्या वो लौट पाएंगे? फिल्म हॉल से निकलकर जब आप और हम अपने घर जा रहे हैं, तब क्या उनकी वापसी वाकई उनके अपने घरों में होगी या किसी पुष्कर नाथ पंडित की तरह इनकी राख ही इनके असल आंगन से मिल पाएगी? ऐसे कई सवाल हैं जिन्हें देश का युवा एक-दूसरे से करता नजर आ रहा है। 
 

मुझे लगता है इस फिल्म ने 'कश्मीरी पंडितों के नरसंहार' को न सिर्फ राष्ट्र की स्मृति में अंकित किया है, बल्कि ये फिल्म सवाल भी करती है कि आखिर क्यों हम आंखें होते हुए भी अंधे बने रहे? हम ये कैसे पचा पाए कि अपने ही देश में कश्मीरी पंडित माइग्रेंट हो गए और हम किसी से सवाल भी न कर पाए? पूछा तो किस से? उसी कश्मीरी पंडित से? क्यों भाग आए? क्यों डर गए? और फिर क्या वाकई उसे सुना? बिल्कुल नहीं।

people are praising the kashmir files movie country is sorry for the kashmiri pandits situation
ये फिल्म खुद कहती है कि अगर कश्मीरी मुसलामानों ने ज़ुल्मों के खिलाफ बन्दूक उठाई तो जो कश्मीरी पंडितों पर बीता वो क्या था? - फोटो : social media

ये फिल्म अगर आपने ध्यान से देखी है तो एक कड़वा सत्य और सामने लाती है। वो सत्य जो 'उम्मीद' का धंधा करता है। एक ओर जहां कश्मीरी पंडितों को घर वापसी की उम्मीद है तो वहीं कुछ खास विश्व विद्यालयों के वो आंगन भी हैं जहां 'अफजल हम शर्मिंदा हैं, तेरे कातिल जिंदा हैं।' के नारे बेखौफ लग रहे हैं। ब्रैनवॉश इस कदर हावी है कि तथाकथित शिक्षाविद एक अलग ही नफरत की खेती कर रहे हैं और ये अब सबके सामने है।

मैं ये मानना चाहता हूं कि ये इंटेलेक्टुअल युवा और बच्चे अगर अफजल गुरु के लिए नारे लगाकर एक खास मानसिकता को पोषित कर सकते हैं तो अब उनकी आंखें कश्मीरी पंडितों के साथ हुए अन्याय के लिए भी खुलेंगी। 

मैं उनकी विद्वता पर विश्वास करना चाहता हूं कि अब इस अन्याय के खिलाफ उन्ही विश्व विद्यालयों के प्रांगण में वो नारे भी गूंजेंगे कि' आशीष कौल हम शर्मिंदा हैं, तुम्हारे अपनों के कातिल जिंदा हैं।' या फिर सिर्फ इतना कि  कश्मीरी पंडितों को कश्मीर में बस्ते, कश्मीर में हंसते हम देखेंगे। 'उस दिन होगी असल समानता, उस दिन में मानूंगा कि दोनों विचारधाराओं को सामान रूप से समझा गया और न्याय की गुहार लगी। जब तक ये नहीं होता तब तक इन आंगनों में सिर्फ नाउम्मीदी की वो खेती है कि जहां से कोई रास्ता आगे नहीं जाता।

दरअसल, एक समाज के तौर पर हम 'हम देखेंगे' और 'हम हैं कि हम नहीं' देखने सुनने के इतने आदी हो चुके हैं कि 'रॉलिव  चालिव और गालिव' का दर्द और पीड़ा हमने कभी समझने की कोशिश ही नहीं की।  परदे पर दिखा तो आंसुओं का सैलाब उमड़ आया और कब ये फिल्म नेशनल इमोशन बन गई, खुद फिल्मकार को भी नहीं पता लगा। वो फिल्म इंडस्ट्री  जो कश्मीरी पंडितों की कहानियों को कहने से गुरेज करती रही है, उन्हें उसमें मुसलमान दर्शक को खफा करने का रिस्क दिखता था, वो भी अचम्भे में है।

मुझे विश्वास है कालांतर में अब कश्मीरी पंडितों और कश्मीर पर कई फिल्मों के लिए फिनांनसर भी मिलेगा और बाजार भी। फिल्म हॉल से निकलने  वाला हर दूसरा इंसान किसी कौल, किसी मट्टू या गंजू परिवार से सुने आधे अधूरे संवाद की कड़ियां जोड़ता दिखता है। सोचता दिखता है कि उस परिवार का बुजुर्ग खोया खोया या गुमसुम क्यों दीखता होगा ? क्यों दिल्ली में भी उनके घरों में कश्मीर जिंदा रखने की आधी अधूरी थोड़ी सफल थोड़ी असफल कोशिशें जिंदा हैं?


इस फिल्म ने एक काम तो पुरजोर किया कि अब राष्ट्र ने कम से कम माना कि कश्मीरी पंडितों का नरसंहार हुआ और वो गलत था। विमर्श और विवाद तो तब होगा जब आप मानेंगे कुछ हुआ था। तो पिछले करीब हफ्ते में ‘कश्मीर फाइल्स’ के बाद अब देश उस जगह खड़ा है कि कश्मीरी पंडित नरसंहार और उनकी तकलीफों पर चर्चा के लिए तैयार है। ये फिल्म खुद कहती है कि अगर कश्मीरी मुसलामानों ने ज़ुल्मों के खिलाफ बन्दूक उठाई तो जो कश्मीरी पंडितों पर बीता वो क्या था? पर क्या उन्होंने बन्दूक उठाई/नहीं तो क्यों नहीं ? 

क्यूंकि ये कौम न सिर्फ शांति प्रेमी है बल्कि शांति और सौहार्द्र का महत्त्व भी जानती है। घाटी को लहूलुहान होने से बचाने के लिए वादी छोड़ी। अपनी अगली पीढ़ी को वैमनस्य की भेंट चढ़ने से बचाने के लिए वादी छोड़ी। देश के साथ बने रहने और गद्दारी न करने के लिए वादी छोड़ी। उनके साथ जो हुआ वो अब देश के सामने है। कश्मीरी पंडितों को न्याय दिलाना, उन्हें उनका घर दिलाना देश का नैतिक दायित्व है। 'कश्मीर फाइल' ने 32 साल बाद सच की फाइल खोल दी है। 



डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed