नेहरू जयंती विशेष : पंडित जी को देहरादून से था खास लगाव, राजनीति की लम्बी छलांग भी यहीं से लगाई
देहरादून वासियों के दिलों में नेहरू की यादें दफन होने वाली नहीं हैं। क्योंकि नेहरू का पहाड़ों से प्रेम जगजाहिर था। देहरादून तथा यहां की जेल तो नेहरू के लिये घर जैसे ही थे। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम चार दिन देहरादून में ही बिताये थे। अपनी आत्म कथा में उन्होंने इसका जिक्र भी किया है।
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आधुनिक भारत के शिल्पी पंडित जवाहर लाल नेहरू का कद छोटा दिखाने के लिए कोई चाहे कितना भी गड़े हुए मुर्दे उखाड़े, मगर नेहरू का कद छोटा होने वाला नहीं है। कम से कम पहाड़वासियों और खास कर देहरादून वासियों के दिलों में नेहरू की यादें दफन होने वाली नहीं हैं, क्योंकि नेहरू का पहाड़ों से प्रेम जगजाहिर था। देहरादून तथा यहां की जेल तो नेहरू के लिए घर जैसे ही थे। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम चार दिन देहरादून में ही बिताए थे। अपनी आत्मकथा में उन्होंने इसका जिक्र भी किया है।
उन्होंने सर्वाधिक दिन अल्मोड़ा जेल में बिताए थे। देहरादून में ही नेहरू ने अपने कालजयी ग्रन्थों के अंश लिखे। नेहरू ने इसी देहरादून से राजनीति के क्षेत्र में सबसे पहले बड़ी छलांग भी लगाई थी। नेहरू ही क्यों उनके पिता मोतीलाल नेहरू और मसूरी से जुड़े किस्से पुराकथाएं बनीं। उनकी बेटी और नाती और उनके बच्चों की स्कूलिंग भी इसी देहरादून में हुई।
देहरादून से लगाई राजनीति की छलांग
नेहरू जी ने राजनीति की पहली लम्बी छलांग देहरादून से ही लगाई थी। दरअसल सन् 1920 में जब देहरादून में कांग्रेस ने राजनीतिक सम्मेलन आयोजित किया तो उसकी अध्यक्षता जवाहर लाल नेहरू ने ही की थी। बिलायत से लौटने के बाद उनका यह पहला राजनीतिक कार्यक्रम था। इस सम्मेलन में लाला लाजपत राय और किचलू जैसे बड़े नेता शामिल हुए थे।
सन् 1922 में भी देहरादून में एक राजनीतिक सम्मेलन आयोजित हुआ और उसकी अध्यक्षता भी पंडित नेहरू ने ही की थी। उस सम्मेलन में सरदार बल्लभ भाई पटेल और चितरंजन दास जैसे बड़े नेताओं ने भाग लिया था। देहरादून और यहां की जेल नेहरू के लिये घर जैसे ही थे। एक बार जब अफगान प्रतिनिधि मण्डल देहरादून पहुंचा तो नेहरू को जिला छोड़ने का आदेश हुआ, क्योंकि जिस चार्लविले होटल में नेहरू ठहरे थे, उसी मेंअफगान प्रतिनिधि मण्डल को भी ठहराया गया था।
देसी रियासतों में लोकतांत्रिक आन्दोलनों के लिए कांग्रेस द्वारा गठित ‘‘आल इंडिया स्टेट्स पीपुल्स कान्फ्रेस’’ के पहले अध्यक्ष नेहरू ही थे और उनके बाद पट्ठाभि सीतारमैया अध्यक्ष बने थे। टिहरी सहित हिमाचल के सभी प्रजामण्डल इसी संगठन से सम्बद्ध थे।
उत्तराखण्डियों की सांस्कृतिक पहचान के हिमायती थे नेहरू
नेहरू की उत्तराखण्ड और खास कर देहरादून से कई यादें जुड़ी हुई हैं। सन् 1930 के दशक में उन्होंने श्रीनगर गढ़वाल में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में कहा था कि उत्तराखण्ड की विशेष भौगोलिक परिस्थितियों के साथ ही अलग सांस्कृतिक पहचान है, इसलिए क्षेत्रवासियों को अपनी अलग पहचान बनाए रखने का हक हैं। उत्तराखण्ड के बारे में इस तरह की टिप्पणी करने वाले वह पहले राष्ट्रीय नेता थे।
बाद में 1952 में नेहरू के इस वाक्य की प्रासंगिकता तब सामने आए जब कामरेड पी.सी. जोशी की अध्यक्षता में भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी ने अलग उत्तराखण्ड राज्य की मांग कर डाली। नब्बे के दशक में उत्तराखण्ड आन्दोलन में नेहरू का यह सूक्ति वाक्य भी आन्दोलनकारियों के काम आया। हिमाचल को पंजाब से अलग राज्य बनाने की परमार की मुहिम को भी नेहरू का ही आशीर्वाद प्राप्त था।
देहरादून से लौटते ही हो गया था निधन
नेहरू उत्तराखण्ड से भावनात्मक तौर पर जुड़े रहे। जेल जीवन के अलावा भी उनका यहां निरन्तर आना जाना रहा है। उन्हें पहाड़ों की रानी मसूरी भी काफी पसन्द थी। वह अपने पिता मोतीलाल नेहरू और माता स्वरूप रानी के साथ सबसे पहले 1906 में मसूरी तब आये थे जब वह 16 साल के थे। उसके बाद वह अपने माता पिता के अलावा बहन विजय लक्ष्मी पंडित, बेटी इंदिरा गांधी और नातियों के साथ आते जाते रहे।
अपने जीवन के कुछ अन्तिम पल भई उन्होंने यहां बिताये थे। 27 मई 1964 को मृत्यु से एक दिन पहले नेहरू देहरादून से वापस दिल्ली लौटे थे। दरअसल वह कांग्रेस के भुवनेश्वर अधिवेशन में हल्का दौरा पड़ने के बाद स्वास्थ्य लाभ के लिए 23 मई 1964 को देहरादून पहुंच गये थे। अपने प्रवास के दौरान उन्होंने मसूरी और सहस्रधारा की सैर भी की।
देहरादून का सर्किट हाउस जो आज राजभवन बन गया, नेहरू के आतिथ्य का गवाह है। नेहरू के हाथ से लिखा हुआ प्रशस्ति पत्र आज भी सर्किट हाउस की दीवार पर चिपका हुआ है। हालांकि उस याद पर भी न जाने कब पानी फेर दिया जाए। तत्कालीन विधायक गुलाबसिंह के आमंत्रण पर नेहरू चकराता भी गए थे जहां उन्होंने प्रकृतिपुत्रों की जनजातीय संस्कृति का करीब से आनन्द उठाया।
अद्भुत लेखन क्षमता और विद्वता के मालिक
कहा जाता है कि महात्मा गांधी को सरदार पटेल से अधिक नेहरू इसलिए भी पसन्द थे क्योंकि धारा प्रवाह अंग्रेजी और हिन्दी बोलने के साथ ही उनमें लेखन की अद्भुत क्षमता भी थी और इसके लिए वह बहुत अध्ययन करते थे। इसी वजह से वह भारत से बाहर भी सबसे लोकप्रिय भारतीय नेता थे।
नेहरू जी ने कई ग्रन्थ भी लिखे जिनमें डिस्कवरी ऑफ इंडिया, एन ऑटोबायोग्रफी ( टुवार्ड्स फ्रीडम), ए ग्लिम्पसेज ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री, लेटर फाॅर नेशन, लेटर फ्रॉम अ फादर टु हिज डाॅटर एवं द युनिटी ऑफ इंडिया जैसे कालजयी ग्रन्थ शामिल हैं।
इनमें से एन ऑटोबाइग्राफी की शुरुआत उन्होंने देहरादून जेल से ही की थी। इस ग्रन्थ में उन्होंने पहाड़ के नैसर्गिक सौंदर्य और देहरादून का भी उल्लेख किया है। भारत के लिए नेहरू की जेल की कोठरी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नेहरू को अपनी विख्यात पुस्तक ”डिस्कवरी आफ इण्डिया“ लिखने की यहीं सूझी थी और उस पुस्तक के अधिकांश हिस्से इसी कोठरी में लिखे गए थे। नेहरू को उनकी पुत्री इन्दिरा गांधी इसी वार्ड में मिलने आती थीं।
नेहरू के खिलाफ दुष्प्रचार अभियान चरम पर
नेहरू के बारे में आज जिस तरह दृष्प्रचार हो रहा उससे लगता है जैसे नेहरू ने स्वाधीनता संग्राम के दौरान अपने बाप-दादा के वैभव का लुत्फ उठाने के सिवा कुछ नहीं किया और जो कुछ किया भी वह देशहित में नहीं किया। सच है कि पैतृक वैभव की उनके पास कमी नहीं थी। इलाहाबाद का आनन्द भवन इसका गवाह है, जिसे बाद में कांग्रेस को दे दिया गया। उनके पिता मोती लाल देश के चोटी के वकील थे और दादा गंगाधर नेहरू दिल्ली के अंतिम कोतवाल थे। लेकिन सच्चाई की गवाह लखनऊ, देहरादून, अल्मोड़ा आदि की खामोश जेलें बिन कहे सच्चाई बयां करती हैं।
राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान नेहरू 3,259 दिन तक जेल में रहे। उन्होंने सबसे पहले लखनऊ जेल में 6 दिसम्बर 1921 से लेकर 3 मार्च 1922 तक कुल 88 दिन काटे। उनको जब नवीं बार गिरफ्तार किया गया तो कुल 1041 दिन अल्मोड़ा जेल में रखा गया। देहरादून की पुरानी जेल के एक वार्ड में स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान पण्डित नेहरू को 4 बार कैद कर रखा गया था।
राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान नेहरू को सबसे पहले 1932 में देहरादून जेल के इस वार्ड में रखा गया था। उसके बाद 1933,1934 और फिर 1941 में उन्हें यहां रखा गया था।
‘‘इण्डिपेंडेंट पार्टी’’ की नींव भी देहरादून में ही रखी
नेहरू ही नहीं पूरे नेहरू परिवार को देहरादून-मसूरी से विशेष लगाव रहा। देखा जाए तो कांग्रेस में होते हुए भी मोतीलाल नेहरू ने अपनी ‘‘इण्डिपेंडेंट पार्टी’’ की नींव भी देहरादून में ही रखी थी। गया कांग्रेस में जाने से पहले इस पार्टी के सभी नेता देहरादून में एकत्र हुए थे और मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में हुई बैठक में नई पार्टी के गठन का प्रस्ताव पारित हुआ था।
मसूरी के लोग मोतीलाल को शायद ही कभी भूलें। सर्वविदित है कि मसूरी के माॅल रोड पर हिन्दुस्तानियों का प्रवेश वर्जित था। सड़क के प्रवेश द्वारा पर ही बोर्ड लटका हुआ होता था जिसमें लिखा होता था कि ‘‘इंडियन्स एण्ड डाॅग्स आर नाॅट अलाउड’’।
मोतीलाल नेहरू मसूरी प्रवास के दौरान सदैव जुर्माना भर कर माॅल रोड की प्रातः कालीन सैर कर अंग्रेजों के गुरूर पर प्रहार करते थे। नेहरू के नाती राजीव और संजय गांधी दून स्कूल के छात्र रहे। राहुल गांधी और प्रियंका का भी काफी वक्त दून स्कूल में गुजरा। प्रियंका बाड्रा ने भी अपने बच्चे इसी इसी स्कूल में पढ़ाए। नेहरू के दोनों नाती राजीव और संजय गांधी देहरादून के ही दून स्कूल में पढ़े थे। नेहरू की बहन श्रीमती विजय लक्ष्मी पण्डित और करीबी रिश्तेदार बी.के.नेहरू ने देहरादून के राजपुर रोड स्थित आवासों पर जीवन की अंतिम सांसें ली थी।
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