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पंडित जसराज स्मृति शेष: भारत से उभरा संगीत के आकाश का नक्षत्र अनंत में विलीन

Tue, 18 Aug 2020 09:57 AM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Tue, 18 Aug 2020 09:57 AM IST
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pandit jasraj legendary indian classical vocalist death news biography achievements music bhajans krishna stuti
पंडित जसराज का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जिसे चार पीढ़ियों तक हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत को एक से बढ़ कर एक गायन शिल्पी देने का गौरव हासिल है- फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला

धरती के एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक और भूमध्य रेखा से लेकर अंटार्कटिका तक अपनी सुर लहरियां प्रवाहित कर मानव समाज की अंतरात्मा को झंकृत करने वाले पद्मविभाूषण पंडित जसराज के मधुर स्वर मौन हो गए। भारतीय संगीत की दुनिया को वृहद करने का श्रेय पंडित जसराज जैसे महान संगीतज्ञों को जाता है। पंडितजी संगीत के ऐसे नक्षत्र थे जिनके नाम का डंका धरती से लेकर अंतरिक्ष में तक बजता था। उनके नाम पर नक्षत्र का नामकरण भारत के लिए गर्व की बात है।

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  • धरती के एक कोने से दूसरे कोने तक बहायी सुर लहरियां

हरियाणा में हिसार से लगभग 70 किलोमीटर दूर गांव पीली मन्दौरी में 28 जनवरी 1930 को जन्मे पंडित जसराज पहले भारतीय थे, जिन्होंने 82 साल की उम्र में 8 जनवरी 2012 को अंटार्कटिका तट पर ‘‘सी स्प्रिट’’ नाम के क्रूज पर गायन कार्यक्रम प्रस्तुत किया और पांचों महाद्वीपों में कार्यक्रम पेश करने वाले पहले भारतीय बने। उन्होंने इससे पहले 2010 में पत्नी मधुरा के साथ उत्तरी धु्रव का दौरा किया था। 

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  • पिता ने पिलाई थी संगीत की घुट्टी

पंडित जसराज का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जिसे चार पीढ़ियों तक हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत को एक से बढ़ कर एक गायन शिल्पी देने का गौरव हासिल है। उनके पिताश्री पंडित मोतीराम स्वयंं मेवाती घराने के लब्ध प्रतिष्ठित संगीतज्ञ थे। पंडित जसराज का जीवन उनके संगीत गायन की तरह सुरीला नहीं रहा। इसमें उनके सुर की तरह ही काफी उतार-चढ़ाव भी रहे।

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पंडित जी अपने माता-पिता की नौवीं संतान थे। जसराज इनके बाद एक बच्चे का जन्म और हुआ जिसका देहांत हो गया। जसराज की माताजी जिनका निधन 1957 में हुआ, कहा करती थी कि जसराज अपने पिता की एकमात्र ऐसी संतान थी जिन्हें पिता ने शहद से घुट्टी पिलाई थी। देखा जाए तो पिता ने घुट्टी में ही उन्हें संगीत का रस पिला दिया था।


जसराज जब मात्र 3 साल के थे तो उनके सिर से उनके पिता का साया उठ गया था। उसके बाद उन्हें उनके अग्रज और गुरु पंडित मनिराम का संरक्षण मिला। बाद में वह अपने आध्यात्मिक गुरु महाराज जयवंत सिंह बघेला की छत्रछाया में चले गए।

  • तबले से शुरू की संगीत की साधना

पंडितजी मूलतः तबला वादक थे और 14 साल की उम्र तक वह तबला ही सीखते थे। बाद में उन्होंने गायिकी की तालीम शुरू की। उन्होंने साढ़े तीन सप्तक तक शुद्ध उच्चारण और स्पष्टता रखने की मेवाती घराने की विशेषता को आगे बढ़ाया। उनकी शादी जाने-माने फिल्म डायरेक्टर वी. शांताराम की बेटी मधुरा शांताराम से हुई थी। भारतीय शास्त्रीय संगीत को पंडित जी का योगदान पिछले कई दशकों से मिलता रहा। 

  • नईं ऊंचाइयां दीं भारतीय संगीत को

उन्होंने हिंदुस्तानी संगीत को नई ऊंचाइयां प्रदान की हैं। वह गायन को साधना मानते थे और उसी साधना ने उन्हें संगीत की दुनियां में इतनी ऊंचाइयों तक पहुंचाया। वह कहा करते थे कि दिल तक उसी की आवाज पहुंचती है, जो अपनी कला और साधना ईश्वर को समर्पित कर आत्मा से दिल की गहराई और सच्ची श्रद्धा से गाता है।

पंडित जी का मानना था कि गायक को स्वास्थ्य लाभ के साथ - साथ अपनी आंतरिक दिव्य शक्तियों को जाग्रत करने में भी सहायता मिलती है। अतः तन- मन को सहजतापूर्वक शक्ति प्रदान करने की जैसी क्षमता गायन में है, वैसी किसी और में नहीं है क्योंकि भावनात्मक उल्लास के प्रभाव में उससे विविध मनोविकारों एवं रोगों का निवारण होता है।

  • जुगलबंदी का नया प्रयोग

उन्होंने गायन में जुगलबंदी का नया प्रयोग किया। पंडित जसराज ने एक अनोखी जुगलबंदी की रचना की। इसमें महिला और पुरुष गायक अलग-अलग रागों में एक साथ गाते हैं। इस जुगलबंदी को ‘‘जसरंगी’’ नाम दिया गया। वल्लभाचार्य द्वारा रचित भगवान कृष्ण की बहुत ही मधुर स्तुति है। पंडित जसराज ने इस स्तुति को अपने स्वर से घर-घर तक पहुंचा दिया। पंडित जी अपने हर एक कार्यक्रम में मधुराष्टकम् जरूर गाते थे।

नामकरण के समय नासा ने कहा था- पंडित जसराज छुद्रग्रह हमारे सौरमंडल में गुरु और मंगल के बीच रहते हुए सूर्य की परिक्रमा कर रहा है।

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14 साल पहले नासा ने एक क्षुद्र गृह का नाम ही पंडित जसराज के नाम पर रखा था- फाइल फोटो - फोटो : social media
  • वल्लभाचार्य द्वारा रचित पंडित जसराज की सबसे प्रिय मधुराष्टकम् रचना:-

अधरं मधुरं वदनं मधुरं नयनं मधुरं हसितं मधुरं ।
हृदयं मधुरं गमनं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं ।।
वचनं मधुरं चरितं मधुरं वसनं मधुरं वलितं मधुरं ।
चलितं मधुरं भ्रमितं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं ।।
वेणुर्मधुरो रेणुर्मधुरः पाणिर्मधुरः पादौ मधुरौ ।
नृत्यं मधुरं सख्यं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं ।।
गीतं मधुरं पीतं मधुरं भुक्तं मधुरं सुप्तं मधुरं ।
रूपं मधुरं तिलकं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं ।।
करणं मधुरं तरणं मधुरं हरणं मधुरं रमणं मधुरं ।
वमितं मधुरं शमितं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं ।।
गुञ्जा मधुरा माला मधुरा यमुना मधुरा वीची मधुरा ।
सलिलं मधुरं कमलं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं ।।
गोपी मधुरा लीला मधुरा युक्तं मधुरं मुक्तं मधुरं।
दृष्टं मधुरं सृष्टं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं ।।
गोपा मधुरा गावो मधुरा यष्टिर्मधुरा सृष्टिर्मधुरा ।
दलितं मधुरं फलितं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं ।।

  • जसराज के नाम पर ग्रह

14 साल पहले नासा ने एक क्षुद्र गृह का नाम ही पंडित जसराज के नाम पर रखा था। यह सम्मान पाने वाले वह पहले भारतीय संगीतज्ञ थे। उल्लेखनीय है कि नासा द्वारा इस क्षुद्र ग्रह का नंबर पंडित जसराज की जन्मतिथि से उलट रखा गया।

नासा और इंटरनेशनल एस्ट्रोनॉमिकल यूनियन के वैज्ञानिकों ने बृहस्पति और मंगल के बीच 300128 नंबर का क्षुद्र ग्रह 11 नवंबर 2006 को खोजा था और इसका नाम पंडित जसराज के नाम पर रखा। इस क्षुद्र ग्रह की खोज मंगल और बृहस्पति के बीच हुई थी।

इसके पहले मोजार्ट, बीथोवन और टेनर लूसियानो पावारोत्ति के नाम पर थे क्षुद्र ग्रहों के नाम रखे गए थे। पंडित जसराज की जन्मतिथि 28 जनवरी 1930 है जो कि इस क्षुद्र ग्रह के नंबर के उलट है। नामकरण के समय नासा ने कहा था- पंडित जसराज क्षुद्रग्रह हमारे सौरमंडल में गुरु और मंगल के बीच रहते हुए सूर्य की परिक्रमा कर रहा है।

  • अलंकार ही अलंकार

पंडित जसराज को संगीत के क्षेत्र में उनके असाधारण योगदान के लिए पद्म विभूषण, पद्मभूषण, पद्मश्री, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, मास्टर दीनानाथ मंगेशकर अवॉर्ड, लता मंगेशकर पुरस्कार और महाराष्ट्र गौरव पुरस्कार से अलंकृत किया गया। आज हमारे बीच पंडित जसराज सशरीर भले ही मौजूद न रह गए हों, पर उनकी आवाज और उनका अस्तित्व हमेशा रहेगा। 

  • उत्तराखंड से आध्यात्मिक रिश्ता

देवभूमि उत्तराखंड से पंडित जसराज का सदा ही आध्यात्मिक संबंध रहा। मधुरा जसराज ने फिल्म डिविजन के लिए जसराज प्रोडक्शन की ओर से संगीत मार्तण्ड पंडित जसराज पर एक डाॅक्यूमेंट्री भी बनाई जिसकी सूटिंग 1998 में बदरीनाथ, केदारनाथ और रुद्रप्रयाग आदि विभिन्न स्थानों पर हुई। चूंकि शूटिंग उन्हीं पर होनी थी इसलिए वह सभी स्थानों पर उपस्थित रहे।

वर्ष 2013 की महाविनाशकारी केदारनाथ आपदा के बाद जब उत्तराखंड की चारधाम यात्रा पर एक तरह से ग्रहण लग गया था तो अगले साल 4 मई 2014 को केदारनाथ के कपाटोद्घाटन पर पंडित जसराज को भजन गायन के लिए आमंत्रित किया गया। यद्यपि पंडित जी उस कार्यक्रम में नहीं आ सके मगर उन्होंने अपनी शिष्या तृप्ति को भगवाल केदारनाथ की आराधना के लिए भेजा।

मुझे भी कई साल पहले पंडितजी को सुनने और उनके साथ भोजन का सौभाग्य मिला। वह देहरादून के बलबीर रोड पर अपनी एक शिष्या रश्मि नम्बूरी के घर 2008 में पधारे थे।

महानता और सादगी-सहजता का ऐसा विलक्षण संगम के साक्षत् दर्शन मुझे उस दिन हुए। जिस व्यक्ति के नाम का डंका अंतरिक्ष में तक बजता हो वह निवेदन सुनते ही बिना वाद्ययंत्रों के ही मधुराष्टकं वाली श्रीकृष्ण की स्तुति सुनाने लगे। उस दिन उन्होंने दो या तीन भजन सुना कर हम सबको मुंत्रमुग्ध कर दिया था।
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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