खाली पड़े पहाड़ों की पुकार: घर आजा पहाड़ी, तेरा गांव बुलाए रे
गांव में सुविधाओं की कमी, पहाड़ियों को मजबूर कर रही हैं कि वे अपने घरों को छोड़कर शहरों की तरफ जाएं। लेखिका कहती हैं कि उन्होंने खुद उच्च शिक्षा के लिए अपनी मिट्टी छोड़ी। बड़े सपने देखने की ख्वाहिश एक पहाड़ी की नहीं होती, बल्कि कम चीजों में भी गुजारा करना ही एक पहाड़ी की पहचान है। ये बातें वह आज समझती हैं।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
लेखिका अपने पुराने दिनों को याद करते हुए कहती हैं कि एक समय था जब वह और उनका पूरा परिवार हर साल अपने गांव, टिहरी गढ़वाल जाया करती थी। शहर की चकाचौंध से दूर, गांव की सरल जिन्दगी उन्हें बहुत आनंद देती थी। लेकिन अब ऐसा कुछ देखने को नहीं मिलता। गांव में सुविधाओं की कमी, पहाड़ियों को मजबूर कर रही हैं कि वे अपने घरों को छोड़कर शहरों की तरफ जाएं।
लेखिका कहती हैं कि उन्होंने खुद उच्च शिक्षा के लिए अपनी मिट्टी छोड़ी। बड़े सपने देखने की ख्वाहिश एक पहाड़ी की नहीं होती, बल्कि कम चीजों में भी गुजारा करना ही एक पहाड़ी की पहचान है। ये बातें वह आज समझती हैं।
लेखिका आगे कहती हैं कि उनके राज्य में 80% से ज्यादा लोग ग्रामीण पहाड़ी क्षेत्रों के निवासी हैं। उत्तराखंड बनने के बाद से ही बाह्य-प्रवासन देखने को मिला है। सच्चाई यह है कि 2001 से 2011 के बीच, ग्रामीण जनसंख्या में 7% की कमी आई, जबकि शहरी जनसंख्या लगभग 35% बढ़ गई, जो राज्य की औसत वृद्धि दर का दोगुना है। यह बाह्य-प्रवासन निम्नलिखित कारणों से हो रहा है: बुनियादी सुविधाओं, जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य केंद्र और नौकरियों की कमी। और एक और कारण उत्तराखंड में होने वाली प्राकृतिक आपदाएं भी हैं, जैसे भूकंप, भूस्खलन, और बादल फटने की घटनाएं।
लेखिका आगे कहती हैं कि ऐसा नहीं है कि सरकार द्वारा कदम नहीं उठाए गए हैं। सरकार ने कई स्कूल, कॉलेज, अस्पताल खोले और कुछ रोजगार की योजनाएं भी लाई, पर पहाड़ी निवासियों की जनसंख्या के अनुसार वे कम थे। प्राथमिक स्कूल खुलने के बाद माध्यमिक स्कूलों का न होना अक्सर गांव के बच्चों को या तो शहरों की ओर, या फिर अपने राज्य से बाहर प्रवास करने के लिए मजबूर करता है। यही स्थिति कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के मामलों में भी देखने को मिलती है। अस्पताल प्राथमिक स्तर के हैं, पर माध्यमिक नहीं हैं। और रोजगार के साधन पर्याप्त मात्रा में उत्तराखंड में नहीं बनाए जा सके हैं।
लेखिका इस बात पर गर्व भी करती हैं कि पहाड़ में एक इंसान अपने परिवार का पालन-पोषण करने के लिए सुबह से शाम तक सड़कों के किनारे खड़े होकर सामान बेचने से लेकर, ढाबे में चाय तक बनाने का काम करता है। अब हमारे पहाड़ों में अक्सर परिवारों के लोग होटल लाइन में काम करते हुए मिलना एक आम बात है।
लेखिका आगे कहती हैं कि यदि पहाड़ों में पढ़ाई की सुविधा बेहतर हो जाए, तो नौकरियों की दर बढ़ जाएगी, पर दूसरी ही सांस में वह यह भी कहती हैं कि क्या उत्तराखंड पढ़े-लिखे लोगों को उनकी पसंद की नौकरी दे पाएगा? पहाड़ों से पलायन को रोकने के लिए कोशिशें होनी चाहिए कि छोटे से छोटे रोजगार के साधनों को बढ़ावा दिया जाए।
लोगों के विचारों को सुना जाना चाहिए, और यदि सरकार कर सके, तो हर 3 महीने में ऐसे कार्यक्रम टीवी, एफएम रेडियो, फेसबुक और ट्विटर के माध्यम से जारी किए जाएं, जहां आम लोगों की बातें सुनी जाएं। स्कूल-कॉलेजों में एक विषय अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए, जिसमें उन्हें यह सिखाया जाए कि हम अपने पहाड़ में रोजगार कैसे ला सकते हैं?
आज बड़ी संख्या में युवा देहरादून, दिल्ली, चंडीगढ़ जैसे स्थानों पर पलायन कर रहे हैं और अच्छी नौकरी मिलने के बाद वहीं बस जाते हैं। शहरों में होने वाले रोजमर्रा के खर्चे, किराए के कमरे न जाने कितने युवाओं के परिजनों को 10 गुना मेहनत करके पैसे भेजने के लिए मजबूर करते हैं। लेखिका उत्तराखंड सरकार द्वारा फ्री बस और यात्रा पास की सुविधा की सराहना करती हैं। लेखिका यह भी कहती हैं कि चाहे स्कूल हो, कॉलेज या विश्वविद्यालय, निजी या सरकारी, ऑनलाइन साधनों के प्रयोग से आधुनिक और उन्नत शिक्षण तकनीकों और कौशलों को शामिल किया जाना चाहिए।
लेखिका अंत में अपने लेख को पढ़ने वालों से आग्रह करती हैं कि वे आज से ही अपने बच्चों को उत्तराखंड की बेहतर बातें बताना शुरू करें और जिन कमियों को दूर करने की जरूरत है, उन्हें समझाएं। युवाओं से यह भी अपेक्षा है कि वे पहाड़ों की समस्याओं को समझें और ऐसे बदलाव लाएं, जो आने वाली पीढ़ी को पलायन से रोक सकें।
पर्यटन उद्योग, पहाड़ी भोजन उद्योग, टूरिस्ट गाइड सेवाएं, सर्वश्रेष्ठ होटल प्रबंधन और आतिथ्य सेवाओं के पाठ्यक्रम, कृषि को प्रोत्साहित करने वाले ज्ञान आधारित विषय और पारंपरिक हस्तशिल्प का ऑनलाइन व्यापार ऐसे कुछ क्षेत्र हैं जहां रोजगार के अवसर पैदा किए जा सकते हैं। एक प्रगतिशील पहाड़ी के दृष्टिकोण से, किसी भी कार्य में श्रम की गरिमा और कार्य विभाजन को मान्यता देना आवश्यक है।
अगर कोई व्यक्ति पढ़ाई के बाद भी एक हाथ से बुना हुआ स्वेटर या मफलर बेचता है, तो उसकी सराहना इस बात के लिए होनी चाहिए कि वह अपने लिए रोजगार का साधन बना पाया। लेखिका राज्य में रहने वाले हर व्यक्ति से अपील करती हैं कि वे राज्य के विकास में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें।
साथ ही, सरकार और शिक्षा मंत्रालय से आग्रह करती हैं कि स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालयों में रोजगार को बढ़ावा देने वाले विषयों को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए। लेखिका का सुझाव है कि ये विषय पहाड़ी क्षेत्रों के अनुरूप हों, ताकि शहरों से बच्चे प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए गांवों का रुख करें और अपनी मिट्टी को बेहतर ढंग से समझ सकें। अंत में, लेखिका सकारात्मक सोच के साथ लिखती हैं कि वह स्वयं भी प्रयास करेंगी कि अपने पहाड़ के लिए कुछ बेहतर कर सकें।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।