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मनुष्य की लालसावादी मनोवृत्ति से चरमरा रहा प्रकृति और मानव का संबंध

Wed, 05 Feb 2020 11:44 AM IST
Bhawna Masiwal भावना मासीवाल
Updated Wed, 05 Feb 2020 11:44 AM IST
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Our Role and Relationship With Nature
कामायनी में जयशंकर प्रसाद ने प्रकृति और मनुष्य के बीच के संतुलित संबंध का आधार समरसता को माना। यही भाव प्रकृति और व्यक्ति को जोड़ता है। - फोटो : Twitter

मनुष्य विकल्पों में जीता है। विकल्प मनुष्य की मनुष्य होने की पहचान भी है। यही पहचान उसे सम्पूर्ण जीव-जगत में सबसे श्रेष्ठ बनाती है। दूसरी ओर मनुष्य हृदय से अधिक बुद्धि का स्वामी है। बुद्धि और हृदय की जंग में बुद्धि बलवान बनकर उभरती है। प्रकृति और मनुष्य का रिश्ता भी इसी हृदय और बुद्धि के समान है।

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जयशंकर प्रसाद ने भी प्रकृति में ह्रदय और बुद्धि की जंग को कामायनी जैसे महाकाव्य के माध्यम से प्रकट किया और इस जंग में बुद्धि को भौतिकतावादी और उपभोगवादी मनोवृति का परिचायक माना। ‘अपने में सब कुछ भर कैसे व्यक्ति विकास करेगा/ यह एकांत स्वार्थ भीषण है अपना नाश करेगा’। वर्तमान समय में व्यक्ति अतृप्त लालसाओं का बढ़ते जाना उसे अपने ही अस्तित्व की समाप्ति की ओर लेकर जा रहा है। यही कारण है जीवन के संतुलन के लिए प्रकृति और मनुष्य के बीच संबंध चरमरा गया है। यह असंतुलन मनुष्य की लालसावादी मनोवृति से उपजा है।
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कामायनी में जयशंकर प्रसाद ने प्रकृति और मनुष्य के बीच के संतुलित संबंध का आधार समरसता को माना। यही भाव प्रकृति और व्यक्ति को जोड़ता है। परंतु आज समरसता खत्म हो गयी है आधिपत्य की मानसिकता उभर रही है। यही से प्रकृति और मनुष्य का संबंध द्वन्द्वात्मक रूप में उभर रहा है। प्रकृति जिसे शास्त्रों में माता तुल्य माना गया जिसने अपने स्वभाव और मनोवृति के अनुरूप कभी लिया नहीं हमेशा खुले हृदय से दिया ही। जिसने प्रकृति की सभी अनमोल धरोहरों जल, हवा, सूर्य से लेकर अपने भीतर के सभी संसाधनों के द्वार मनुष्य के लिए खोल दिए है।
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परंतु वहीं मनुष्य बुद्धि के बल पर प्रकृति का नियंता और नियामक बन गया है। उसी ने प्रकृति के अति-दोहन में प्रकृति के ही अस्तित्व को संकट में डाल दिया है। उपभोक्तावादी संस्कृति के इस दौर में अत्याधुनिक सुविधाओं से लेस प्रत्येक व्यक्ति प्रकृति का दोहन कर रहा है। प्रकृति से प्राप्त सुविधाओं का अंधाधुंध प्रयोग उसे अधिक खतरे में डाल रहा है। चारों ओर पर्यावरण का संकट गहरा गया है। एक ओर अमेजोन के जंगल जल रहे हैं जो मानव निर्मित आपदा थी तो दूसरी ओर आस्ट्रेलिया के जंगल जल रहे हैं जो कहने को प्राकृतिक आपदा है परंतु यह स्थितियां मानव निर्मित है।
 

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आस्ट्रेलिया में हर साल 52,000 से 54,000 तक आग की घटनाएं घटती हैं जो बढ़कर 62,000 तक बढ़ गयी हैं। जिनमें से 13 प्रतिशत घटनाएं जानबुझकर मनुष्य द्वारा की जाती हैं

इनकी निर्मिती में मनुष्य की उपभोगवादी प्रवृति से निर्मित कार्बन उत्सर्जन है जिसने ग्लोबल वार्मिंग की स्थिति को बढ़ावा दिया है। बी.बी.सी. की रिपोर्ट के अनुसार आस्ट्रेलिया नेशनल सेंटर फॉर रिसर्च इन बुशफायर एंड अरसन के को-डायरेक्टर के अनुसार आस्ट्रेलिया में हर साल 52,000 से 54,000 तक आग की घटनाएं घटती हैं जो बढ़कर 62,000 तक बढ़ गयी हैं। जिनमें से 13 प्रतिशत घटनाएं जानबुझकर मनुष्य द्वारा की जाती हैं और शेष के लिए कुछ कहा नहीं जा सकता है। जिन घटनाओं के लिए कुछ कहा नहीं जा सकता है वह भी मनुष्य की क्रियाओं से ही प्रभावित है।

इनमें कार्बन उत्सर्जन सर्वाधिक बड़ा कारण है। 2019 में आस्ट्रेलिया में जुलाई से अब तक न्यू साउथ वेल्स में 40 लाख हेक्टेयर इलाका जलकर खत्म हो जाता है। इससे पूर्व 2019 में अमेजन के 9 लाख जंगल,  2018 में केलिफोर्नियाँ में 18 लाख हेक्टेयर भूमि आगजनी से प्रभावित होता है। वैश्विक स्तर पर बढ़ती आगजनी की घटनाओं से एक शेत्र विशेष ही प्रभावित नहीं होता है बल्कि पूरा विश्व प्रभावित होता है। आस्ट्रेलिया में जुलाई से अब तक आग की बढ़ती घटनाओं ने लाखों जीव, जंतुओं और पेड़-पौधों को आग में जलाकर नष्ट कर दिया। प्रकृति और मनुष्य का संबंध आश्रय और आश्रित का है। प्रकृति इस चराचर जगत को अपने भीतर संरक्षण देती हैं।

जब प्रकृति का ही अस्तित्व सिमट जाएगा तो जीवन भी समाप्त हो जाएगा। वैश्विक स्तर पर बढ़ता कार्बन उत्सर्जन जलवायु में व्यापक बदलाव तो ला ही रहा है वह उसे खत्म भी कर रहा है। आस्ट्रेलिया में लाखों जीवो का मरना उसके पारिस्थितिक तंत्र (इको सिस्टम) को प्रभावित करना है।

यह प्रभाव एक शेत्र तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि सभी देशों में जलवायु परिवर्तन के दौरान जंगल में आग, सूखा, समुंद्र के जल स्तर का बढ़ना जैसी आपदाओं के रूप में उभरेगा। भारत में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव देखा जा सकता है। भारत में मौसमों के समय चक्र में बड़ा बदलाव आया है। इसका सर्वाधिक  प्रभाव किसानों पर पड़ रहा है क्योंकि भारत में आज भी किसान मौसमी वर्षा पर निर्भर है। और मौसम का बदलना उसकी मेहनत और उसे पस्त कर रहा है। विकास की अत्याधुनिक तकनीकों ने जितना हमें संपन्न बनाया उससे कहीं अधिक रोगी। उदाहरण के लिए अत्याधुनिक सुविधाओं से लेस दिल्ली आज गैस चैम्बर में तब्दील हो गयी है। जहां तमाम तरह की दूषित हवा से उत्पन्न बीमारियों का एकाधिकार हो गया है। अस्थमा, आँख में जलन, देखने की समस्यां, सांस की बिमारी आदि। जानलेवा प्रदूषण में आपात की स्थिति भी घोषित हो गई है। फिर भी दिल्ली का प्रदूषण है कि बढ़ता ही जा रहा है। दिल्ली का प्रदूषण उसका अपना है।


जिसके संदर्भ में  वह लगातार, हरियाणा के किसानों के पराली जलाए जाने व दीवाली पर जलाए गए पटाखों को बता रहा है। इन सबके अतिरिक्त भी दिल्ली का प्रदूषण उसका अपना है। जो धीरे-धीरे इकट्ठा होता गया और आपात की स्थिति में पहुंच गया। यह समय जीवित इंसान के लिए बिना किसी स्मोकिंग हैबिट के स्मोकिंग करने के बराबर है। फिर भी इसके प्रति चिंतन कम ही देखा जाता है। अपात की स्थिति में बेशक यह चिंता का विषय बन जाता है मगर समाधान तक आते-आते विषय ठंडा पड़ जाता है। पेड़ लगाने के लिए हर वर्ष सरकार बजट निकालती है और पेड़ लगाती भी है। परंतु कितने पेड़ जीवित बचते हैं इसका आकड़ा किसी के पास नहीं है। यह सिर्फ एन.सी.आर का ही हाल नहीं है बल्कि पूरे देश का है। हम कहते हैं देखिये हमारी नीतियाँ विफल हो रही है। नीतियां तभी सफल होगी जब उनकी जिम्मेदारी में आम नागरिक को सहभागी और जिम्मेदारी के रूप में उसका हिस्सा बनाया जाएगा।

इन्हीं की वजह से हम आज बिजली, पानी और मेट्रो जैसी सुविधाओं का लाभ ले पा रहे हैं। इतना ही नहीं तकनीक के समय में इंटरनेट सेवाएं यह सभी इन्हीं पारंपरिक संसाधनों से ही संभव है। ऐसे में इन सभी सुविधाओं का अंधाधुंध प्रयोग प्रकृति को नष्ट कर रहा है। जिन पेड़ों पर कभी  पक्षियों का बसेरा था। वहीं आज पक्षी सेलफोन टावर के हाई इलेक्ट्रोमेगनेटिक रेडीएशन के कारण मर रहे हैं या फिर प्रजनन की क्षमता खो चुके है अन्यथा दिशाहीन होकर रास्ते बदल चुके हैं। पक्षियों का घर बिजली की तारें हो गयी है दूसरी ओर जंगल मनुष्य का रिहाशी इलाका बन गया है। इस तरह जानवरों की जंगल से बेदखली हो गयी और वह शहर की ओर आ गए हैं। उनका खेत-खलिहान, घरों में बढ़ना उनकी गलती नहीं बल्कि उनके घरों का छीना जाना है यही कारण है कि शहरों में बंदरों की आबादी बड़ी है तो उतराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों में जंगली सूअरों के कारण खेती तबाह हो गयी है। यह सब मनुष्य के किसी एक दिन का क्रियाकलाप नहीं है बल्कि मनुष्य की अतृप्त लालसाओं का अंजाम है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 

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