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खुशियों का उम्र से कोई वास्ता नहीं: सांझ की रोशनी में जीवन का असली सौंदर्य
Fri, 12 Jun 2026 06:59 AM IST
नितिन गौतम
जोरा नील हर्स्टन
जोरा नील हर्स्टन
Published by: नितिन गौतम
Updated Fri, 12 Jun 2026 06:59 AM IST
सार
जब तक मन में सीखने, समझने, प्रेम करने और जीवन को नए दृष्टिकोण से देखने की जिज्ञासा बनी रहती है, तब तक उम्र केवल कैलेंडर के पन्नों पर बढ़ती है, भीतर नहीं।
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बुजुर्ग व्यक्ति का अनुभव ही उसकी पूंजी
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
वृद्धावस्था जीवन की वह सुंदर सांझ है, जहां मनुष्य दुनिया के अधिकांश दिखावों, प्रतिस्पर्धाओं और अनावश्यक बंधनों से धीरे-धीरे मुक्त होने लगता है। यह वह पड़ाव है, जहां स्वयं को किसी के सामने सिद्ध करने की बेचैनी समाप्त हो जाती है। न तो किसी दौड़ में आगे निकलने की हड़बड़ी रह जाती है और न ही दूसरों की अपेक्षाओं के अनुरूप स्वयं को ढालने का दबाव। हम जो हैं, जैसे हैं, उसी रूप में स्वयं को स्वीकार करना सीख जाते हैं। जीवन भर ओढ़े गए अनेक मुखौटे उतरने लगते हैं और अंततः केवल हमारी वास्तविक पहचान, हमारी शुद्ध प्रामाणिकता शेष रह जाती है।
मेरे जीवन की खुशियों का उम्र से कभी कोई संबंध नहीं रहा। सच्ची खुशियां समय के साथ अपना स्वरूप नहीं बदलतीं। खिले हुए फूलों की कोमल मुस्कान, सुबह और शाम की मखमली रोशनी, किसी मधुर संगीत की धुन, किसी कविता की गहरी अनुभूति, मन का निर्मल सन्नाटा और आंगन में इधर-उधर फुदकती सुनहरी चिड़िया-ये सब आज भी मुझे उतना ही आनंद देते हैं, जितना युवावस्था में देते थे। बल्कि अब इन छोटी-छोटी बातों में छिपे सौंदर्य को पहले से कहीं अधिक गहराई से महसूस कर पाती हूं। सच तो यह है कि वृद्धावस्था तब तक आकर्षक या समझ में आने वाली नहीं लगती, जब तक कोई स्वयं उस पड़ाव तक नहीं पहुंचता।
वृद्धावस्था न तो कोई बीमारी है और न ही लाचारी का दूसरा नाम। वास्तव में यह जीवन का स्वर्णिम चरण है, जहां बाहरी उपलब्धियों का महत्व कम होने लगता है और भीतर की दुनिया अधिक प्रकाशमान हो उठती है। मुझे लगता है कि वास्तविक वृद्धावस्था तब आरंभ नहीं होती, जब बाल सफेद होने लगते हैं या शरीर की गति धीमी पड़ जाती है, बल्कि तब होती है, जब मनुष्य आगे की संभावनाओं को देखने के बजाय केवल पीछे मुड़कर अपने अतीत में जीने लगता है। जब तक मन में सीखने, समझने, प्रेम करने और जीवन को नए दृष्टिकोण से देखने की जिज्ञासा बनी रहती है, तब तक उम्र केवल कैलेंडर के पन्नों पर बढ़ती है, भीतर नहीं।
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मेरे जीवन की खुशियों का उम्र से कभी कोई संबंध नहीं रहा। सच्ची खुशियां समय के साथ अपना स्वरूप नहीं बदलतीं। खिले हुए फूलों की कोमल मुस्कान, सुबह और शाम की मखमली रोशनी, किसी मधुर संगीत की धुन, किसी कविता की गहरी अनुभूति, मन का निर्मल सन्नाटा और आंगन में इधर-उधर फुदकती सुनहरी चिड़िया-ये सब आज भी मुझे उतना ही आनंद देते हैं, जितना युवावस्था में देते थे। बल्कि अब इन छोटी-छोटी बातों में छिपे सौंदर्य को पहले से कहीं अधिक गहराई से महसूस कर पाती हूं। सच तो यह है कि वृद्धावस्था तब तक आकर्षक या समझ में आने वाली नहीं लगती, जब तक कोई स्वयं उस पड़ाव तक नहीं पहुंचता।
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वृद्धावस्था न तो कोई बीमारी है और न ही लाचारी का दूसरा नाम। वास्तव में यह जीवन का स्वर्णिम चरण है, जहां बाहरी उपलब्धियों का महत्व कम होने लगता है और भीतर की दुनिया अधिक प्रकाशमान हो उठती है। मुझे लगता है कि वास्तविक वृद्धावस्था तब आरंभ नहीं होती, जब बाल सफेद होने लगते हैं या शरीर की गति धीमी पड़ जाती है, बल्कि तब होती है, जब मनुष्य आगे की संभावनाओं को देखने के बजाय केवल पीछे मुड़कर अपने अतीत में जीने लगता है। जब तक मन में सीखने, समझने, प्रेम करने और जीवन को नए दृष्टिकोण से देखने की जिज्ञासा बनी रहती है, तब तक उम्र केवल कैलेंडर के पन्नों पर बढ़ती है, भीतर नहीं।
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