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उड़ान भरने का समय: उम्र नहीं, सीमित सोच संभावनाओं की राह रोकती है
Fri, 25 Sep 2026 07:48 AM IST
नितिन गौतम
एश्टन एप्पलविट
एश्टन एप्पलविट
Published by: नितिन गौतम
Updated Fri, 25 Sep 2026 07:48 AM IST
सार
उम्र कोई ऐसी ढलान नहीं है, जहां संभावनाओं के द्वार बंद होने लगें। यह तो अनुभवों की वह पराकाष्ठा है, जहां से नई उड़ान भरी जा सकती है। अफसोस यह है कि हमने समाज के थोपे हुए नियमों को सच मानकर अपनी असीम क्षमताओं पर संदेह करना शुरू कर दिया है।
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ब्लॉग
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
सोचिए, क्या हो, अगर ढलती उम्र कोई सीमा नहीं, बल्कि एक असीम संभावना हो? क्या हो, अगर हमें कमजोर हमारा शरीर नहीं, बल्कि उम्र को लेकर गढ़ी गई हमारी और समाज की संकीर्ण सोच बना रही हो? दरअसल, सच्चाई यही है कि हमारी संस्कृति, काम करने के तरीके, रिश्ते और समाज अक्सर हमारे इर्द-गिर्द ऐसी दीवारें खड़ी कर देते हैं, जिससे उम्र के साथ हमारा जीवन भव्य व जीवंत होने के बजाय दायरों में सिमटने लगता है।
उम्र कोई ऐसी ढलान नहीं है, जहां संभावनाओं के द्वार बंद होने लगें। यह तो अनुभवों की वह पराकाष्ठा है, जहां से नई उड़ान भरी जा सकती है। अफसोस यह है कि हमने समाज के थोपे हुए नियमों को सच मानकर अपनी असीम क्षमताओं पर संदेह करना शुरू कर दिया है। बढ़ती उम्र से जुड़ी नकारात्मक सोच की जड़ उस मानवीय प्रवृत्ति में है, जिसमें हम लोगों को उनकी उम्र, रूप या सामाजिक पहचान के आधार पर कम या अधिक मूल्यवान मानने लगते हैं। इस मानसिकता से पूर्वाग्रह पैदा होता है।
समस्या यह है कि बहुत से दुराग्रह हमें दिखाई ही नहीं देते। ये हमारी भाषा, हमारी आदतों और हमारी दैनिक सोच में इतने रचे-बसे हैं कि हम इनकी जंजीरों को समय रहते पहचान ही नहीं पाते। इसलिए, सच्चे बदलाव की शुरुआत वहीं से होती है, जब हम इन अदृश्य बेड़ियों को चुनौती देने का साहस जुटाते हैं। हमें अपनी उम्र संबंधी धारणाओं को ईमानदारी से देखना होगा। इसलिए, जब भी आपका मन यह कहे कि ‘अब मेरी उम्र नहीं रही’ या ‘इस पड़ाव पर यह काम मुमकिन नहीं’, तो ठहरिए और इस सोच को ललकारिए। खुद से पूछिए कि क्या यह सच में आपकी आत्मा की ही आवाज है, या सदियों से समाज द्वारा थोपा गया महज एक भ्रम है? याद रखिए, उम्र हमारी संभावनाओं को छोटा नहीं करती, हमारी सीमित सोच उन्हें छोटा करती है। इसलिए, उम्र को छिपाने या उससे लड़ने के बजाय उसे स्वीकार कीजिए।
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उम्र कोई ऐसी ढलान नहीं है, जहां संभावनाओं के द्वार बंद होने लगें। यह तो अनुभवों की वह पराकाष्ठा है, जहां से नई उड़ान भरी जा सकती है। अफसोस यह है कि हमने समाज के थोपे हुए नियमों को सच मानकर अपनी असीम क्षमताओं पर संदेह करना शुरू कर दिया है। बढ़ती उम्र से जुड़ी नकारात्मक सोच की जड़ उस मानवीय प्रवृत्ति में है, जिसमें हम लोगों को उनकी उम्र, रूप या सामाजिक पहचान के आधार पर कम या अधिक मूल्यवान मानने लगते हैं। इस मानसिकता से पूर्वाग्रह पैदा होता है।
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समस्या यह है कि बहुत से दुराग्रह हमें दिखाई ही नहीं देते। ये हमारी भाषा, हमारी आदतों और हमारी दैनिक सोच में इतने रचे-बसे हैं कि हम इनकी जंजीरों को समय रहते पहचान ही नहीं पाते। इसलिए, सच्चे बदलाव की शुरुआत वहीं से होती है, जब हम इन अदृश्य बेड़ियों को चुनौती देने का साहस जुटाते हैं। हमें अपनी उम्र संबंधी धारणाओं को ईमानदारी से देखना होगा। इसलिए, जब भी आपका मन यह कहे कि ‘अब मेरी उम्र नहीं रही’ या ‘इस पड़ाव पर यह काम मुमकिन नहीं’, तो ठहरिए और इस सोच को ललकारिए। खुद से पूछिए कि क्या यह सच में आपकी आत्मा की ही आवाज है, या सदियों से समाज द्वारा थोपा गया महज एक भ्रम है? याद रखिए, उम्र हमारी संभावनाओं को छोटा नहीं करती, हमारी सीमित सोच उन्हें छोटा करती है। इसलिए, उम्र को छिपाने या उससे लड़ने के बजाय उसे स्वीकार कीजिए।
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