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सुख नहीं, जीवन का अर्थ खोजिए: क्या सच में खुश रहना ही जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य है?
Thu, 24 Sep 2026 07:10 AM IST
हिमांशु सिंह चंदेल
अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: हिमांशु सिंह चंदेल
Updated Thu, 24 Sep 2026 07:10 AM IST
सार
जीवन में पैसा, सफलता, सम्मान और सुविधाएं मिलने के बाद भी मनुष्य हमेशा संतुष्ट नहीं होता। सुख परिस्थितियों के साथ बदल सकता है, लेकिन जीवन का अर्थ भीतर से मजबूती दे सकता है। मुश्किल समय में यही अर्थ आगे बढ़ने का कारण बनता है। लेकिन क्या जीवन का उद्देश्य केवल खुश रहना है? क्या किसी जिम्मेदारी, रिश्ते या रचनात्मक काम में जीवन का असली अर्थ मिल सकता है? खुद से कौन सा सवाल पूछना चाहिए?
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कठिन समय में जीवन का अर्थ हमें कैसे संभालता है?
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
हम बचपन से सुनते आए हैं कि जीवन में सफल होना है तो सुखी रहना जरूरी है। अच्छी नौकरी, पर्याप्त पैसा, सम्मान, अच्छा घर और रिश्ते मिल जाएं तो हम मान लेते हैं कि जीवन सफल हो गया। लेकिन क्या इन सबके मिलने के बाद मनुष्य सच में संतुष्ट हो जाता है? कई बार ऐसा नहीं होता। सब कुछ होने के बावजूद मन के भीतर एक खालीपन बना रहता है। दूसरी ओर, कुछ लोग कठिन परिस्थितियों में भी शांत और मजबूत दिखाई देते हैं। शायद इसका कारण यह है कि जीवन को केवल सुख नहीं, बल्कि एक अर्थ भी चाहिए।
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क्या सुख ही जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य है?
सुख जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा जरूर है, लेकिन उसे जीवन का अंतिम उद्देश्य मान लेना शायद ठीक नहीं। सुख परिस्थितियों पर बहुत निर्भर करता है। आज हमारे पास कोई ऐसी चीज है, जिससे हमें खुशी मिल रही है, लेकिन समय बदलते ही वही चीज सामान्य लगने लगती है। इसके बाद मन किसी नई चीज की तलाश शुरू कर देता है। यही कारण है कि सुख का पीछा करते रहने पर मनुष्य लगातार अगली उपलब्धि की ओर भागता रहता है। उसे लगता है कि अगली नौकरी, ज्यादा पैसा, नया रिश्ता या कोई बड़ी सफलता उसे पूरी तरह संतुष्ट कर देगी। लेकिन इच्छा पूरी होने के बाद अक्सर एक नई इच्छा सामने आ जाती है।
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एक इच्छा पूरी होने के बाद भी खालीपन क्यों रहता है?
मनुष्य की इच्छाओं का कोई अंत नहीं होता। जब कोई लक्ष्य पूरा होता है तो कुछ समय के लिए खुशी मिलती है, लेकिन फिर मन दूसरी मंजिल तलाशने लगता है। यही सिलसिला चलता रहता है। समस्या इच्छाओं के होने में नहीं है। इच्छाएं मनुष्य को आगे बढ़ने की प्रेरणा भी देती हैं। असली सवाल यह है कि क्या हम अपने जीवन का पूरा अर्थ उन्हीं चीजों में खोज रहे हैं, जो लगातार बदलती रहती हैं। अगर जीवन का उद्देश्य केवल ज्यादा पाना बन जाए तो उपलब्धियां बढ़ने के बावजूद भीतर का खालीपन खत्म नहीं होता। इसलिए जरूरी है कि हम खुद से पूछें कि हम जो कर रहे हैं, उसके पीछे हमारा असली कारण क्या है।
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