परमाणु परीक्षण की जगह अब पोखरण में गूंजेगी चाक की ध्वनि

Priyanka sourabhप्रियंका सौरभ Updated Sun, 28 Jun 2020 06:10 AM IST
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मिट्टी के बर्तन बनाता कुम्हार (प्रतीकात्मक तस्वीर)
मिट्टी के बर्तन बनाता कुम्हार (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Social media

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बदलते दौर में भारत के गांवों में चल रहे परंपरागत व्यवसायों को भी नया रूप देने की जरूरत है। गांवों के परंपरागत व्यवसाय के खत्म होने की बात करना सरासर गलत है। अभी भी हम ग्रामीण व्यवसाय को थोड़ी-सी तब्दीली कर जिंदा रख सकते हैं।
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ग्रामीण भारत अब नई तकनीक और नई सुविधाओं से लैस हो रहा है। भारत के गांव बदल रहे हैं, तो इनको अपने कारोबार में थोड़ा-सा बदलाव करने की जरूरत है।
नई सोच और नए प्रयोग के जरिए ग्रामीण कारोबार को जिन्दा रखकर विशेष हासिल किया जा सकता है और उसे अपनी जीविका का साधन बनाया जा सकता है।
इसी दिशा में खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग ने पोखरण की एक समय सबसे प्रसिद्ध रही बर्तनों की कला की पुनःप्राप्ति तथा कुम्हारों को समाज की मुख्य धारा से फिर से जोड़ने के लिये प्रयास प्रारंभ किए हैं। कोरोना के चलते हुए लॉकडाउन ने मिट्टी बर्तन बनाने वाले कारीगरों के सपनों को भी चकनाचूर कर दिया है।

इन्होंने मिट्टी बर्तन बनाकर रखे लेकिन बिक्री न होने की वजह से खाने के भी लाले पड़ गए। अब न तो चाक चल रहा है और न ही दुकानें खुल रही हैं। घर व चाक पर बिक्री के लिए पड़े मिट्टी के बर्तनों की रखवाली और करनी पड़ रही है।

देश भर में प्रजापति समाज के लोग मिट्टी के बर्तन बनाने का काम करते हैं। ऐसे समय केंद्र एवं राज्य सरकारों के द्वारा ऐसी योजनाओं का लाना बेहद स्वागत योग्य कहा जाएगा।  

कुछ समय पूर्व उत्तर प्रदेश में भी ऐसी ही एक योजना लागू की गई थी। मिट्टी के बर्तनों के जरिए अपनी आजीविका कमाने वाले कुशल श्रमिकों के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पहल से देश भर के प्रजापति समाज के लोगों के लिए एक आस जगी, जिसके अनुसार राज्य के प्रत्येक प्रभाग में एक माइक्रो माटी कला कॉमन फैसिलिटी सेंटर (सीएफसी) का गठन की बात आगे बढ़ी।

सीएफसी की लागत 12.5 लाख है, जिसमें सरकार का योगदान 10 लाख रुपये है। शेष राशि समाज या संबंधित संस्था को वहन कर रही है। भूमि, यदि संस्था या समाज के पास उपलब्ध नहीं है, तो ग्राम सभा द्वारा प्रदान की जा रही है। प्रत्येक केंद्र में गैस चालित भट्टियां, पगमिल, बिजली के बर्तनों की चक और पृथ्वी में मिट्टी को संसाधित करने के लिए अन्य उपकरण उपलब्ध करवाए जा रहे हैं।

श्रमिकों को एक छत के नीचे अपने उत्पादों को विकसित करने के लिए सभी सुविधाएं मुहैया हो रही हैं। इन केंद्रों के माध्यम से अधिक से अधिक लोगों को रोजगार उपलब्ध करवाने की कोशिश रंग ला रही है।

अब पोखरण में कुम्हारों के परिवारों को इलेक्ट्रिक पॉटर चाकों का वितरण किया गया है। इलेक्ट्रिक चाकों के अलावा, 10 कुम्हारों के समूह में 8 अनुमिश्रक मशीनों का भी वितरण किया गया है। अनुमिश्रक मशीनों का इस्तेमाल मिट्टी को मिलाने के लिए करते हैं और यह मशीन केवल 8 घंटे में 800 किलो मिट्टी को कीचड़ में बदल सकती है जबकि व्यक्तिगत रूप से मिट्टी के बर्तन बनाने के लिए 800 किलो मिट्टी तैयार करने में लगभग 5 दिन का लंबा समय लगता है।

ऐसी योजनाओं के आने से गांव में अब प्रत्यक्ष रोजगार का सृजन हो रहा है। खादी आयोग के ऐसे प्रयासों का उद्देश्य कुम्हारों को सशक्त बनाना, स्व-रोजगार का सृजन करना और मृतप्राय हो रही मिट्टी के बर्तनों की कला को पुनर्जीवित करना है।
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