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साहित्य के नोबल विजेता लाजलो क्रासनाहोरकाई: प्रलयंकारी भय के बीच कला-शक्ति की पुष्टि ..!

Fri, 10 Oct 2025 08:08 PM IST
Dr. Vijay Sharma डॉ. विजय शर्मा
Updated Fri, 10 Oct 2025 08:08 PM IST
सार

  • लाजलो क्रासनाहोरकाई हंगरी के नोबेल पाने वाले दूसरे साहित्यकार हैं। 2002 में इमरे कर्टीज को यह मिला था। वे द्वितीय विश्वयुद्ध की उपज थे। एक किशोर के रूप में उन्हें यातना शिविर में लेजाया गया और कंकाल के रूप में वे लौटे। 

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Nobel Prize in Literature 2025 László Krasznahorkai has won this year Nobel Prize in Literature
Nobel Prize 2025 - फोटो : Amarujala.com

विस्तार

अक्तूबर आते ही साहित्य में अटकलों का बाजार गर्म हो जाता है। इस साल यही हुआ। विदेशी अटकलबाजों की मानें तो उनके कल्पना में दूर-दूर तक कोई हिन्दी लेखक न था। मगर अटकल का ठेका केवल उनका नहीं है। हिन्दी वाले भी अटकल लगाते लगाते हुए न मालूम किस-किस को नोबेल देना चाहते हैं।

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अटकल मैंने भी लगाई, मेरी हार्दिक इच्छा थी, मुराकामी या रुश्दी को मिले, वे डिजर्व करते हैं। एक मजेदार बात और हुई, एक राजनेता की भांति किसी लेखक ने छाती ठोंक कर नहीं कहा, यह मुझे मिलना चाहिए, यदि मुझे नहीं मिला तो यह मेरे देश का अपमान होगा। लेखक होता, तो आगे जोड़ता, मेरी भाषा का अपमान होगा। हां, हिन्दी वालों को लग रहा है कि नोबेल न दिए जाने से हिन्दी भाषा का अपमान हो रहा है।
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नोबेल समिति ने 9 अक्टूबर 2025 की शाम एक हंगेरियन रचनाकार लाजलो क्रासनाहोरकाई को यह सम्मान दिया।

5 जनवरी 1954 को हंगरी एवं रोमानिया की सीमा पर स्थित गियुला में लाजलो का जन्म हुआ। समिति ने घोषणा में कहा, ‘उनके प्रभावशाली एवं दूरदर्शी साहित्यिक कार्यों केलिए दिया गया है, जो प्रलयंकारी भय के बीच कला-शक्ति की पुष्टि करता है।’ घोषणा के पश्चात जब रस्मी टेलिफोनिक वार्ता में जेनी राइडेन ने उनसे पूछा, कैसा लग रहा है, पुरस्कार पाकर?
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लाजलो ने सैमुअल बेकेट को कोट करते हुए कहा, ‘आपदा’ से बढ़कर है। वे बहुत प्रसन्न एवं गर्वित हैं। गर्वित हैं, क्योंकि अब वे महान लेखकों/ कवियों की पंक्ति में आ गए हैं। पुरस्कार उनके लिए एक सरप्राइज की तरह आया है।

उनकी भाषा हंगेरियन एक नई भाषा है, मात्र 200 साल पुरानी। अत: वे इसमें भरपूर प्रयोग करते हैं। अपनी भाषा बदलने का प्रयास कर रहे हैं। जबकि हिन्दी में भाषा को तोड़ने का प्रयास करने वाले की खूब हुज्जत होती है। वे खूब लम्बे-लम्बे वाक्य लिखते हैं।


70 पन्ने की किताब ‘चेजिंग होमर’ (2021) 

अभी मैंने उनकी नवीनतम किताब ‘चेजिंग होमर’ (2021) समाप्त की है। किताब बहुत छोटी (70 पन्ने) है, कई पन्ने चित्रों (जर्मन कलाकार मैक्स न्युमान) को दिए गए हैं और कई पन्ने सादे छोड़े गए हैं। मगर 19 छोटे-छोटे अध्यायों में बंटी यह किताब उनके लेखन का नमूना है, क्योंकि पूरे-पूरे अध्याय को एक वाक्य में अभिव्यक्त किया गया है। इसीलिए जब पेज नंबर 25 पर तीन शब्दों का एक वाक्य, ‘बट देयर’ज मोर.’ आया तो आश्चर्य हुआ।

ये लो! किताब का अंतिम अध्याय भी मात्र छ: शब्दों का (‘नो, आई वाज नेवेर गिविंग अप’) है और अंत में पूर्ण विराम भी है। किताब एक अंतहीन यात्रा है, अंतिम वाक्य आशा का संचार करता है। किताब में क्यूआर कोड्स की सहायता से हंगेरियन जाज संगीतज्ञ सिल्वेस्टर मिक्लोस (Szilveszter Miklós) को सुना जा सकता है, सुना, झन्नाटेदार संगीत। यह किताब कला, संगीत एवं साहित्य की जुगलबंदी है।

मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है, मैंने इस लेखक/कवि को नहीं पढ़ा है, हालांकि फिल्म के माध्यम से मेरा उनसे परिचय हुआ और कुछ किताबें जुटा ली थीं। ‘विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया’ लिखते समय सिने-निर्देशक बेला टार को जाना। बेला टार ने प्रयोगात्मक फिल्में बनाई हैं, वे धीमी गति की फिल्म बनाने हेतु जाने जाते हैं।

लाजलो ने छ: फिल्मों का स्क्रीनप्ले लिखा है, जिस पर इस निर्देशक ने फिल्म बनाई हैं। एक तो बहुत लंबी करीब साढ़े सात घंटे की है। मगर लाजलो स्वयं को फिल्मी दुनिया का आदमी नहीं मानते हैं। लाजलो ने ऑपेरा भी तैयार किया है।

क्लासिकल, खासकर काफ़्का के प्रशंसक ने आज के अंधकारपूर्ण समय के विषय में लिखा है। उनके अनुसार कड़ुवाहट उनकी गहन प्रेरणा है, अप्रसन्नता एवं शोक के तहत वे लिखते हैं। वे आज की दुनिया की स्थिति से बहुत उदास हैं, इस गहन कड़वाहट को अगली पीढ़ी हेतु प्रेरणा मानते हैं। लिखना उनके लिए बहुत निजी मामला है, वे इसके बारे में बात नहीं करते हैं।

प्रकाशक को पाण्डुलिपि पकड़ा कर पहले से बेहतर लिखने का प्रयास करते हुए अगले लेखन की ओर बढ़ जाते हैं। फंतासी उनके लिए महत्वपूर्ण है। अपने पाठकों को धन्यवाद देते हुए, वे किताबें पढ़ने को पृथ्वी पर इस कठिन समय में बचे रहने की शक्ति देने वाला कहते हैं।

Nobel Prize in Literature 2025 László Krasznahorkai has won this year Nobel Prize in Literature
हंगरी के लेखक लास्जलो क्रास्नाहोरकाई को साहित्य का नोबेल - फोटो : Amar Ujala

लाजलो क्रासनाहोरकाई हंगरी के नोबेल पाने वाले दूसरे साहित्यकार हैं। 2002 में इमरे कर्टीज को यह मिला था। वे द्वितीय विश्वयुद्ध की उपज थे। एक किशोर के रूप में उन्हें यातना शिविर में लेजाया गया और कंकाल के रूप में वे लौटे। बाहर की दुनिया उनके लिए अजनबी थी।

उपन्यास ‘सैटनटैंगो’ में हंगरी की स्थिति

1956 के हंगेरियन आंदोलन के कुछ पहले लाजलो का जन्म हुआ। लेकिन हंगरी अत्याचार से मुक्त न हुआ भले ही स्टालिन की क्रूरता से छुटकारा मिला। हताशा, सर्वनाश, नास्तिवाद, अराजकता आदि इनके मुख्य कथानक हैं। लाजलो के पहले उपन्यास ‘सैटनटैंगो’ में यह देखा जा सकता है।

इसी पर बेला टार ने फिल्म बनाई है। परदे पर उजाड़ स्थान में कागज उड़ते देखना बर्बादी को देखना है। बस यहां कुछ होने का इंतजार है। तकनीक विशेषताओं से लैस फिल्म में क्रूरता है, तनाव है। इस फिल्म को देखना एक चुनौती है।

नोबेल पुरस्कार समिति के कुछ सदस्य बहुभाषी हैं, अत: हंगरी जैसी भाषा बिना अनुवाद के उन तक नहीं पहुंच सकती है। लाजलो के कार्य का कई भाषा में अनुवाद हुआ है। वे अपने अनुवादकों के साथ मिल कर काम करते हैं। उनके कई कार्य का इंग्लिश अनुवाद जॉर्ज सियरटिस (George Szirtes) ने किया है।

जॉर्ज के अनुसार क्रासनाहोरकाई का प्रमुख सार है, कुचक्र, अपराध, बेवफाई, भाग निकलने की आशा और सबसे ऊपर विश्वास एवं निरंतर विश्वासघात। उनके अनुसार ‘सैटनटैंगो’ के केंद्र में शराब पीकर किया गया शैतान का नृत्य है, कभी टैंगो के संदर्भ में, कभी चारडास (हंगेरियन नृत्य) के रूप में है।

यह स्थानीय सराय में चल रहा है, जहां पीकर सब धुत हैं।... ब्रह्मांड के नगण्य, छोटे-से किसी कोने में, कॉमिक तथा ट्रैजिक के बीच खोई हुई, उनकी दुनिया रुखड़ी है। यहां मृत्यु का नृत्य है।’

पूर्व की संस्कृति से प्रभावित लाज्लो बुद्ध एवं लाओत्से को याद करते हैं, वे कई बार जापान गए हैं, भारत आना चाहते थे, सत्ता से इसकी अनुमति नहीं मिली। उनका ‘द मेलनकली ऑफ़ रेजिस्टेंस’, ‘वारएंड वार’, ‘एनिमलइनसाइड’, ‘डिस्ट्रक्शन एंड सोरो बिनीथ द हेवन’, ‘द लास्ट वुल्फ़ एंड हर्मन’, ‘द वर्ल्ड गोज ऑन’, ‘स्पेडवर्क फ़ॉर ए पैलस: एंटरिंग द मैडनेस ऑफ अदर्स’, ‘ए माउंटेन टू द नॉर्थ, ए लेक टू द साउथ, पाथ्स टू द वेस्ट, ए रिवर टू दि ईस्ट’, ‘हर्स्ट 07769’ आदि कार्य इंग्लिश में उपलब्ध है।

‘मेरे काम को अब केवल ईश्वर समझता है’ कहने वाले नोबेल पुरस्कृत लाजलो क्रासनाहोरकाई के जटिल काम को ईश्वर की भांति समझने की कोशिश कर रही हूं।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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