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केन्द्रीय बजट दिलाएगा हाथ से गंदगी साफ करने के कलंक से मुक्ति

Thu, 02 Feb 2023 06:43 PM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Thu, 02 Feb 2023 06:43 PM IST
सार

वित्त मंत्री द्वारा पेश किए गए केन्द्र सरकार के वार्षिक बजट 2023-24 में संकल्प लिया गया है कि सेप्टिक टैंकों और नालों से मानव द्वारा गंदगी निकालने का काम पूरी तरह से मशीनयुक्त बनाने के लिए शहरों को तैयार किया जाएगा।

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Nirmala Sitharaman announces 100 pc mechanical desludging of septic tanks in budget 2023
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 1 फरवरी 2023 को बजट 2023-24 पेश किया - फोटो : istock

विस्तार

मौजूदा सरकार का अंतिम पूर्ण बजट होने के कारण वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने बजट 2023-24 में समाज के लगभग सभी वर्गों को छूने का प्रयास किया है। खासकर आयकर छूट की सीमा 5 लाख से बढ़ाकर 7 लाख और पुरानी कराधान व्यवस्था के तहत टैक्स स्लैब  6 की जगह 5 करने के साथ ही छूट की सीमा 2.50 लाख सालाना से बढ़ाकर 3 लाख करने से न केवल सरकारी कर्मचारियों बल्कि मध्यम वर्ग ने भी राहत की सांस ली है।

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वहीं, इस बजट में सामाजिक तौर पर जो महत्वपूर्ण बात नजर आ रही है वह सफाई कर्मचारियों को मैनुअल स्कैवेंजिंग से मुक्ति दिलाने के लिए सेप्टिक टैंकों और गन्दी नालियों की सफाई के लिए मशीनीकरण शुरू करने की है।
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वास्तव में कानूनी प्रावधानों के बावजूद व्यवहारिक कठिनाइयों और दृढ़ इच्छाशक्ति के अभाव में सिर पर मैला ढोने या दूसरों की गन्दगी को हाथ से साफ करने का कलंक समाज के माथे से साफ नहीं हो रहा है। अब भी हर साल सेकड़ों की संख्या में सफाईकर्मी सीवरलाइनों के अन्दर दम घुटने से जान गंवा रहे हैं। आज भी स्केवेंजिंग का काम अनुसूचित जाति के एक वर्ग के भरोसे चल रहा है।

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मशीनें दिलाएंगी मैला साफ करने के कलंक से मुक्ति

वित्त मंत्री द्वारा पेश किए गए केन्द्र सरकार के वार्षिक बजट 2023-24 में संकल्प लिया गया है कि सेप्टिक टैंकों और नालों से मानव द्वारा गंदगी निकालने का काम पूरी तरह से मशीनयुक्त बनाने के लिए शहरों को तैयार किया जाएगा। जाहिर है कि केन्द्र सरकार इस प्रथा की मुक्ति के लिए नगर निकायों को मशीनें उपलब्ध कराएगी या उसके लिए अलग से बजट देगी। स्वच्छता अभियान के तहत केन्द्र सरकार ग्रामीण क्षेत्रों में खुले में शौच मुक्ति का अभियान 2014 से चला चुकी है।


हालांकि, खुले में मुक्ति के लिए अक्टूबर 2019 तक का लक्ष्य रखा गया था जो कि व्यवहार में अभी तक अधूरा है। फिर भी उस मिशन के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में करोड़ों घरों में शौचालय बने हैं। अब इस अभियान को अगर दिलोजान से चलाया गया तो इंसानों की एक बिरादरी को सचमुच दूसरों की गन्दगी साफ करने से कलंक से मुक्ति मिल जाएगी।

महात्मा गांधी और डॉ. अम्बेडकर दोनों ने ही हाथ से मैला ढोने की प्रथा का पुरजोर विरोध किया था। यह प्रथा संविधान के अनुच्छेद 15, 21, 38 और 42 के प्रावधानों के भी खिलाफ है। आजादी के 7 दशकों बाद भी इस प्रथा का जारी रहना देश के लिए शर्मनाक है और शीघ्रातिशीघ्र इसका अंत होना चाहिए।

सीवर लाइनों में सेकड़ों सफाईकर्मी तोड़ते हैं दम

लोक सभा में 2 फरवरी 2021 को लातूर महाराष्ट्र के सांसद सुधाकर तुकाराम के एक प्रश्न के उत्तर में तत्कालीन सामाजिक अधिकारिता मंत्री थावर चन्द गहलोत का जवाब था कि 31 दिसम्बर 2020 तक उससे पिछले 5 सालों में देशभर में सीवर लाइनें साफ करते हुए 340 सफाइकर्मियों की मौतें हुईं।

इनमें सर्वाधिक 52 सफाईकर्मी उत्तर प्रदेश में मारे गए उसके बाद तमिलनाडु की गंदी नालियां जाति विशेष के कर्मियों के लिए मरघट बनीं जहां 43 लोगों ने जानें गंवाई। देश की राजधानी दिल्ली जहां से इस समाजवादी-धर्म निरपेक्ष-लोकतांत्रिक गणराज्य का संचालन होता है, में 36 सफाईकर्मियों ने नारकीय परिस्थितियों में दम तोड़ा।

समाजिक अधिकारिता मंत्री का यह भी जवाब था कि देश में अब तक 13 राज्यों  में 13,657 मैला ढोने वालों की पहचान की गई है, लेकिन 2011 की जनगणना में परिवारों के आंकड़ों से बड़ी संख्या में गंदे शौचालयों को हटाने को ध्यान में रखते हुए राज्यों  से कहा गया है कि वे अपने सर्वेक्षण की दोबारा समीक्षा करें।

उसी दौरान 4.97 लाख घरों में मानव मल की सफाई पशुओं द्वारा किए जाने की भी पहचान हुई। इससे पहले 1992 से लेकर 2005 तक देश में 7.7 लाख सिर पर मैला ढोने वालों की पहचान की गई थी। उसके बाद 2010 में 1.18 लाख मैनुअल स्कैवेंजरों की पहचान की गई।

Nirmala Sitharaman announces 100 pc mechanical desludging of septic tanks in budget 2023
सितम्बर 2013 में संसद द्वारा ‘‘हाथ से मैला साफ करने वाले कर्मियों के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम 2013’’ पास किया गया। - फोटो : istock

स्केवेंजिंग से कानून नहीं दिला पाया मुक्ति

दरअसल, कानून अकेले किसी समस्या का समाधान नहीं कर सकता। अगर इस अमानवीय समस्या का समाधान कानून के पास होता तो नब्बे के दशक में समस्या तब समाप्त हो जाती जब पहली बार 1993 में सफाई कर्मचारी नियोजन और शुष्क शौचालय सन्निर्माण (प्रतिषेध) अधिनियम, 1993 आ गया था। जिसका उद्धेश्य मानव मल-मूत्र को हटाने के लिए सफाई कर्मचारियों के नियोजन को अपराध घोषित कर सफाई कार्य के हाथ से किए जाने का अन्त करने और देश में शुष्क शौचालयों की और वृद्धि पर पाबंदी लगाने के लिए संपूर्ण भारत के लिए एक समान विधान अधिनियमित करना था। 

जब इस कानून से काम नहीं चला तो उसके बाद सितम्बर 2013 में संसद द्वारा "हाथ से मैला साफ करने वाले कर्मियों के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम 2013" पास किया गया। वह अधिनियम 6 दिसम्बर 2013 से प्रभावी हुआ। इस अधिनियम में अस्वच्छ शौचालयों और मैनुअल स्केवेंजिंग संबंधी उपबंधों का पहली बार उल्लंघन करने पर 1 वर्ष की सजा या 50 हजार का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।

दूसरी बार उल्लंघन करने पर 2 वर्ष की सजा और 1 लाख का जुर्माना हो सकता है। तीसरी बार उल्लंघन करने पर 5 पांच साल की सजा या 5 लाख के जुर्माने या दोनों का प्रावधान है। इस अधिनियम की धारा 22 के अन्तर्गत पाए गए अपराध संज्ञेय एवं गैर जमानती हैं, लेकिन फिर भी समाज के एक खास वर्ग को इससे पूरी तरह मुक्ति नहीं मिल सकी। 

नगर निकायों ने भी कानून का पालन नहीं किया

अब तक कानून तो बनते रहे मगर वे कानून अपने उद्धेश्य की पूर्ति न कर सके। करते भी कैसे? क्योंकि बिना सफाई के नगर नर्क बन जाएंगे। इसलिए 2011 के कानून का उल्लंघन स्वयं नगर निगम और नगरपालिका जैसे नगर निकाय भी नहीं कर रहे थे। इस समस्या का निदान के लिए पहले भी सुझाव आए थे कि सफाई का काम हाथ से या मजदूरों से कराने के बजाय नगर निकाय मशीनों से कराएं।

उन मशीनों पर कोई भी और और किसी भी जाति का सामान्य कर्मचारी काम कर सकता है, लेकिन नगर निकायों को ऐसी मशीनें नहीं दी गई। अब उम्मीद की जा सकती है कि भारत सरकार की मदद से सारे देश के शहरों में मशीनों से ही नालियों, सीवरलाइनों और सेप्टिक टैंकों की सफाई हो सकेगी। मैनुअल स्कैवेंजिंग से एक जाति विशेष का उद्धार नहीं हो पा रहा है। संसद में 2021 में स्वयं सरकार ने स्वीकार किया था कि इस पेशे में लगे लोगों में 97.25 प्रतिशत लोग अनुसूचित जाति के थे।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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