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नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जयंती: महात्मा गांधी और सुभाष बाबू, देश की आजादी के दो बड़े स्तंभ

Mon, 23 Jan 2023 02:59 PM IST
Mohan singh मोहन सिंह
Updated Mon, 23 Jan 2023 02:59 PM IST
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netaji subhash chandra bose birth anniversary, Parakram Diwas
सुभाष चंद्र बोस जयंती की शुभकामनाएं - फोटो : amar ujala

आज पूरा देश नेताजी सुभाषचन्द्र  बोस की 126 वीं जन्म जयन्ती 'पराक्रम दिवस' के रूप में मना रहा है। 16 जुलाई 1921 को इग्लैंड से भारत लौटने पर बम्बई में सुभाष बाबू की पहली मुलाकात महात्मा गांधी से होती है। इस पहली मुलाकात में ही देश की आजादी के लिए सुभाष बाबू और महात्मा गांधी बीच बातचीत से ही पता चलता है कि देश के दो महान नेताओं के दृष्टिकोण में कितनी भिन्नता और समानता है। उस वक्त 24 वर्षीय सुभाष बाबू देशभक्ति की भावना से प्रेरित होकर  'इंडियन सिविल सेवा' जैसे प्रतिष्ठित नौकरी से त्यागपत्र दे चुके थे।

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इस मुलाकात में वे महात्मा गांधी से देश की आजादी के बाबत उनके मन-मंतव्य जानना-समझना चाहते हैं।

लगभग एक घंटे की बातचीत में सुभाष बाबू का पहला सवाल था कि-देश की आजादी की लड़ाई में अहिंसा... कुछ समझ नहीं पता। आपकी अहिंसा के मायने क्या है?

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जवाब में महात्मा गांधी बताते है कि- अन्याय और बुराई को दूर करने का एकमात्र उपाय है कष्ट सहन करना। यह अहिंसा का सिद्धांत  है। इसके लिए जरूरी है- ईश्वर में जीवंत श्रद्धा। फल की इच्छा बिना निरन्तर सेवा करते रहने से मन में अहिंसा के भाव का उदय होता है। 
यह सेवा मित्रों के  लिए ही नहीं, शत्रुओं के लिए भी होती है। 

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आजादी को लेकर सुभाष बाबू का रुख

महात्मा गांधी से बातचीत में सुभाष बाबू भी स्वीकार करते है कि विवेकानंद की शिक्षाओं में मैंने जीवन के आदर्श की तलाश कर ली है। मेरे जीवन का सिद्धांत है- "आत्मनो मोक्षधर्म: जगतद्विताय' अर्थात् अपनी आत्मा की मुक्ति और मानवता की सेवा ही मानव जीवन का परम लक्ष्य है। सुभाष बाबू महात्मा गांधी से यह भी जानने को उतावले थे कि क्या आपके पास देश की आजादी का कोई "ब्लू प्रिंट" है, जैसा कि आप दावा करते है कि - यदि भारत की जनता  कुछ बातों का एक साल तक पालन करें तो भारत स्वतंत्र  हो जाएगा?


महात्मा गांधी का उत्तर था कि- मेरे पास ऐसा कोई "ब्लूप्रिंट" तो नहीं है...।

सुभाष बाबू का महात्मा गांधी के साथ उस बातचीत  में मुख्यतः तीन सवाल सामने आते हैं- पहला यह कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अब तक कौन सा कार्यक्रम चलाया है, जिससे आजादी के आंदोलन के लक्ष्य को हासिल किया जा सके? सविनय अवज्ञा आंदोलन किस तरह अंग्रेजों को मजबूर कर देगा कि वे देश छोड़कर चले जाएंगे? और क्या-क्या करने की जरूरत हैं, जिससे देश को एक साल में आजादी मिल जाए?


सुभाष बाबू के मन में देश की आजादी की तड़प बार-बार उन्हें बेचैन कर रही थी। यह सोचने के लिए विवश कर रही थी कि जब-जब देश को राजनीतिक संघर्ष की जरूरत पड़ती है, तो महात्मा गांधी बार-बार आध्यात्मिक- सुधारवादी और रचनात्मक कार्यक्रमों की ओर क्यों बढ़ने लगते हैं? और देश भी उनके इशारे पर चलने लगता है?

सुभाष बाबू के लिए ''भले ही आजादी ली नहीं, बल्कि छीनी जाती है'', पर महात्मा गांधी भारतीय स्वाधीनता संग्राम को महज राजनीतिक सत्ता हासिल करने का जरिया नहीं मानते थे, बल्कि वे ब्रिटिश हुकूमत से सभ्यतागत लड़ाई भी लड़ रहे थे,जो भारत के खोए स्वाभिमान को हासिल करने के लिए कम महत्वपूर्ण नहीं था।

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सुभाषचंद्र बोस के विचार - फोटो : amar ujala

रोमां रोलां से मुलाकात

सुभाष बाबू की यथाशीघ्र भारत की आजादी हासिल करने की बेचैनी उन्हें किस कदर परेशान कर रह थी और जाने-अनजाने उन्हें जिस निष्कर्ष पर पहुंचा रही थी, उसकी एक बानगी सुपरिचित मनीषी- विचारक, भारत प्रेमी और नोबेल पुरस्कार विजेता फ्रांसीसी विद्वान रोमां रोलां के साथ उनकी अप्रैल 1935 में हुई मुलाकात में भी सामने आती है।

रोमां रोलां से सुभाष बाबू यह बताने की चेष्टा करते है कि भारत में गांधी के नेतृत्व में चल रहा अहिंसक आंदोलन किस कदर  निर्जीव हो चला है। अगर भारत को स्वतंत्रता हासिल करना है, तो मौजूदा नेतृत्व को हटाना ही पड़ेगा। रोमां रोलां बताते है कि यह बात सुभाष बाबू भी ठीक से जानते है कि सशस्त्र युद्ध में भारत बहुत दिनों तक ब्रिटेन का मुकाबला नहीं कर पाएगा। फिर भी उन्हें आशा थी कि अगर यूरोप में युद्ध छिड़ जाए और इग्लैंड में कोई विदेशी शक्ति अधिकार कर लें, तो उस समय वह भारत की स्वाधीनता के लिए उसकी सहायता कर सकता है।

जब रोमां रोलां ने सुभाष बाबू को बताया कि इस तरह की कोई  इच्छा हम लोगों के मन में नहीं हैं, तो वे थोड़े निराश हुए। महात्मा गांधी और सुभाष बाबू  के विचारों के बीच यह  मौलिक भेद ही भारत की आजादी के दो  दीवाने को अन्य और बातों के अलावा दो भिन्न  रास्ते पर ले गई, जिसका पूरा विवरण महात्मा गांधी और सुभाष बाबू के बीच हुए तमाम पत्र व्यवहारों में भी दृष्टिगोचर होता है।

द्वितीय विश्वयुद्ध और देश की राजनीतिक परिस्थितियों में बदलाव

एक सितंबर 1939 को यूरोप में द्वितीय विश्वयुद्ध शरू होने के बाद भारत में भी राजनीतिक परिस्थितियों में बड़ी तेजी से बदलाव आया। महात्मा गांधी पर कांग्रेस के सभी बड़े नेताओं का दबाव बढ़ रहा था कि वे इस युद्ध में मित्र राष्ट्रों को अपना समर्थन घोषित करें, पर महात्मा गांधी यह भली भांति जानते थे कि भारत के लिए जितना खतरा फासीवाद  से है, उससे कम खतरा ब्रिटिश साम्राज्यवाद से नहीं है।

उधर नेताजी सुभाषचंद्र बोस अंग्रेजों की नजरबंदी से फरार होकर फासीवादी ताकतों की सहायता से  भारत को अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त  कराने के मकसद से जापान के सैन्य सहयोग से रंगून पर फतह करते हुए इम्फाल तक पहुंचने में कामयाब हो गए। पर कई बार इतिहास में ऐसे क्षण आते हैं जब तमाम सैन्य ताकत, रणनीतिक कौशल और दुःसाहस धरी की धरी रह जाती हैं और परिस्थितियां पूरे घटनाक्रम को दूसरा ही मोड़ दे देती है।

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के साथ और कहना चाहिए कि महात्मा गांधी के साथ भी नियति ने कुछ ऐसा ही खेल किया। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस आजाद भारत का सवेरा देखने के पहले ही गुमनाम हो गए और महात्मा गांधी के मौत की कीमत पर भारत को गांधी के सपनों की आजादी हासिल नहीं हुई।

भारत की आजादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर यह सबक लेने का भी अवसर है कि देश की आजादी के संघर्ष में कई बार सफलता की कहानी को अकसर याद किया जाता हैं। पर असफलताएं भी ऐसे कई दृष्टांत छोड़े जाती हैं, जिससे आने वाली पीढ़ियां युग-युगांतर तक प्रेरणा लेती रहेगी।

नेताजी सुभाष चन्द्र  बोस के राजनीतिक जीवन संघर्ष का भी एक पहलू  ऐसा भी है, जहां वे खुद दावा करते हैं कि-सफलता हमेशा असफलता के स्तम्भ पर ही खड़ी होती है।



डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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