एक तीर-कई शिकार: मोदी के परिवारवाद पर हमले का लक्ष्य दूरगामी, निशाने पर दक्षिण के राज्य
महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के ज्यादातर राज्यों में परिवारवाद का ही बोलबाला है। यानी कि अंधा बांटे रेवड़ी वाली स्थिति। मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे बाल ठाकरे के बेटे हैं और वो अपने बेटे को भी अभी से सीएम बनने के लिए तैयार कर रहे हैं।
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केन्द्र सहित देश के 12 राज्यों में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के 42 वें स्थापना दिवस पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने संबोधन में अधिकांश राजनीतिक दलों में व्याप्त परिवारवाद पर जिस तरह चोट की है, उसका लक्ष्य दूरगामी है।
प्रधानमंत्री ने अपने वर्चुअल स्पीच में आजादी के अमृत महोत्सव का जिक्र करते हुए कहा कि आज देश में दो तरह की राजनीति चल रही है। एक परिवार भक्ति की और दूसरी राष्ट्र भक्ति की। उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा में राजनीति और राष्ट्रनीति दोनो पर एक साथ चलती है। लेकिन पीएम मोदी की जिस बात को राजनीतिक हल्को में गंभीरता से लिया गया, वो है उनके द्वारा की गई परिवारवाद पर चोट।
यूं सबसे बड़ा परिवारवाद तो देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस में ही है। लेकिन कांग्रेस की सत्ता अब दो राज्यों में सिमट चुकी है और महाराष्ट्र में वह बराए नाम को सत्ता में है। बीजेपी के लिए मुश्किल गढ़ वो राज्य माने जाते रहे हैं, जहां क्षेत्रीय दल मजबूत हैं। इन क्षेत्रीय दलों ने क्षेत्रीय अस्मिता और परिवारवाद का ऐसा काॅकटेल तैयार किया है, जिससे पार पाना बीजेपी के लिए मुश्किल रहा है।
हालांकि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे क्षेत्रीय दलों के मजबूत प्रभाव वाले राज्यों में बीजेपी ने हिंदुत्व, विकास और कानून व्यवस्था को मुद्दा बनाकर क्षेत्रीय राजनीति करने वाली समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी को विधानसभा चनाव में चित किया। वहीं बिहार में सुशासन और हिंदुत्व को मुद्दा बनाया गया।
दरअसल भाजपा ने हिंदुत्व को किसी भी मुद्दे से जोड़कर आगे बढ़ाने में महारत हासिल कर ली है। इसी अस्त्र से उसने जहां सामाजिक न्याय के मुद्दे को बेअसर किया है या फिर खुद ही मुद्दे को हाई जैक कर लिया है। अलबत्ता पश्चिम बंगाल में ममता बैनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के आगे उसकी ज्यादा नहीं चली। ममता ने बंगाली अस्मिता को मुददा बनाकर हिंदुत्व की लहर को रोक दिया।
इसके विपरीत क्षेत्रीय दलों वाले असम, मणिपुर, गोवा आदि राज्यों में भाजपा ने अपना एजेंडा सफलतापूर्वक वोटो में तब्दील किया है।
परिवारवाद क्षेत्रीय दलों की सबसे बड़ी कमजोरी
क्षेत्रीय दलों की ताकत अगर क्षेत्रीय अस्मिता और सामाजिक न्याय है तो सबसे बड़ी कमजोरी परिवारवाद का पोषण है। सत्ता और शीर्ष पदों के लिए उन्हें अपने नाते-रिश्तेदारों के अलावा और कोई नहीं दिखता। यही कारण है कि एक सीमा तक अपनी सल्तनत के विस्तार के बाद इन दलों को परिवारवाद का घुन खाने लगता है।
उत्तर प्रदेश में किसी समय अकेले सत्ता में आने वाली बहुजन समाज पार्टी अपने सबसे निचले स्तर पर है। इसके बाद भी पार्टी सुप्रीमो मायावती ने पार्टी की कमान किसी और को न देकर भतीजे आनंद प्रकाश को सौंपी। वही हाल पश्चिम बंगाल में टीएमसी का है। पिछले विस चुनाव में बंपर विजय के बाद ममता ने पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को बनाया।
महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के ज्यादातर राज्यों में परिवारवाद का ही बोलबाला है। यानी कि अंधा बांटे रेवड़ी वाली स्थिति। मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे बाल ठाकरे के बेटे हैं और वो अपने बेटे को भी अभी से सीएम बनने के लिए तैयार कर रहे हैं। आंध्र में पूर्व कांग्रेस नेता वायएसआर रेड्डी के बेटे जगन्मोहन रेड्डी सीएम हैं तो तमिलनाडु में द्रमुक नेता करूणानिधि के पुत्र एम.के.स्टालिन मुख्यमंत्री बन गए हैं। करूणानिधि और दूसरे रिश्तेदार भी कई पदों पर हैं।
तेलंगाना में टीआरएस के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव अपने बेटे बेटियों को राजनीति में आगे बढ़ा रहे हैं। कर्नाटक में जनता दल ( सेक्युलर) के नेता देवेगौडा के बेटे कुमारस्वामी देवेगौडा दो बार सीएम रहे। इस पार्टी की राजनीति अब भी उन्हीं के इर्द गिर्द घूम रही है।
केरल में लेफ्ट फ्रंट की सरकार है, इसलिए वहां परिवारवाद नहीं है। लेकिन जम्मू कश्मीर में कश्मीर घाटी की राजनीति अब्दुला और मुफ्ती परिवार के आसपास ही छाई रही है।
भाजपा में भी परिवारवाद
इसका अर्थ यह नहीं कि भाजपा में परिवारवाद नहीं है। भाई-भतीजावाद की विष बेल वहां भी फल फूल रही है। इसे जायज ठहराने भाजपा नेताओ ने अजब तर्क देना शुरू किया था कि उनके जो परिजन बरसों से राजनीति कर रहे हैं तो उसे परिवारवाद नहीं माना जाना चाहिए।
लेकिन लगता है कि पीएम मोदी और भाजपा आलाकमान ने अपनी पार्टी के भीतर भी परिवारवाद को हतोत्साहित करने का साहसिक फैसला कर लिया है। पिछले चुनावों में हमने देखा कि परिवार के किसी एक व्यक्ति को ही चुनाव का टिकट दिया गया।
भाजपा अब इस परिवारवाद विरोध को दक्षिणी राज्यों में अपना राजनीतिक हथियार बनाने की तैयारी में है। इससे तेलंगाना, आंध्र और तमिलनाडु के सत्तारूढ़ दलों में चिंता है। लिहाजा जवाबी अस्त्र के रूप में उन्होंने क्षेत्रीय अस्मिता और सामाजिक न्याय के अपने पुराने औजारों पर धार तेज करनी शुरू कर दी है।
कुछ दिन पहले ही स्टालिन ने ‘सामाजिक न्याय मोर्चा’ बनाने की घोषणा की थी। इस मोर्चे में शामिल होने के लिए उन्होंने बीजेपी को छोड़कर कांग्रेस समेत 65 राजनीतिक दलों को पत्र लिखा था। माना जा रहा है कि जब हिंदी बेल्ट की राजनीति हिंदुत्व विचार की ओर कदम बढ़ा चुकी है तो स्टालिन उसके मुकाबले मंडल राजनीति को धार देना चाहते हैं।
दक्षिणी राज्यों पर मोदी का नजर
वैसे सामाजिक न्याय का मुद्दा इस देश में तीन दशकों से अहम रहा है। लेकिन 2014 में मोदी के पीएम बनने के बाद इसकी चमक फीकी पड़ने लगी है। लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, कांशीराम, मायावती, राम विलास पासवान जैसे नेता इसकी उपज थे। लेकिन अब परिदृश्य बदल रहा है।
दक्षिणी राज्यों में सामाजिक न्याय का मुद्दा भाजपा के आक्रामक हिंदुत्व और विकास के मुद्दों के आगे वो कितने दिन टिक पाएगी, कहना मुश्किल है। वास्तव में उत्तर, पूर्वोत्तर, मध्य भारत के अधिकांश राज्यों में भगवा परचम फहराने के बाद भाजपा का अगला लक्ष्य दक्षिण विजय ही है। लेकिन इसके लिए उसे अपनी ‘हिंदू, हिंदी, हिंदुस्तान’ वाली छवि से बाहर निकलना होगा।
शायद इसीलिए भाजपा इन राज्यो में परिवारवाद पर ज्यादा से ज्यादा चोट करेगी। उसे उम्मीद है कि पहले हल्ले में उसे लोकसभा चुनाव में कुछ फायदा हो सकता है। वैसे भी इन राज्यों में सशक्त विपक्ष का स्पेस अभी खाली है।
तमिलनाडु में जयललिता के निधन के बाद उनकी पार्टी एआईएडीएमके लगभग नेतृत्व विहीन है तो आंध्र प्रदेश में बरसों सत्ता में रही तेलुगू देशम और कांग्रेस भी निस्तेज पड़ी है। तेलंगाना में भी स्थिति बहुत अलग नहीं है और कर्नाटक में तो खुद भाजपा ही सत्ता में है।
परिवारवाद के बहाने भाजपा राजनीतिक नेताओं द्वारा अपने ही लोगों को रेवडि़यां बांटने की नीति को बेनकाब करेगी। दक्षिणी प्रदेशों की जनता इसे कितनी तवज्जो देगी, यह तो चुनाव नतीजे ही बताएंगे। लेकिन जो दांव खेला जा रहा है, वह दूरगामी है, इसमें शक नहीं।
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