नेपाल में मंडरा रहा है ये नया खतरा, भारत को रहना होगा अलर्ट
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
नेपाल में एक बार फिर से माओवादी चरमपंथी संगठित होने लगे हैं। सक्रिय चरमपंथी गुट के नेता नेत्र बिक्रम चंद का दावा है कि उनके पास वे तमाम गुरिल्ले एकत्र हो गए हैं, जो किसी जमाने में सत्ता के खिलाफ संघर्ष में शामिल थे। बिक्रम चंद का यह भी दावा है कि उनके पास लगभग 20 हजार गुरिल्ला लड़ाके हैं और वे लड़ाके संगठित रूप से नेपाल सरकार के खिलाफ संघर्ष के लिए तैयार हैं।
मसलन एक बार फिर से नेपाल में अशांति का खतरा मंडरा रहा है। इस मामले में कई प्रकार की प्रतिक्रिया आ रही है। इस मामले में नेपाली राष्ट्रवादियों का आरोप है कि चूंकि नेपाल में शांति है और नेपाल, चीन व भारत को समान रूप से महत्व दे रहा है इसलिए भारतीय एजेंसियां, नेपाल को अशांत करने के फिराक में है, लेकिन इस तर्क को इसलिए खारिज किया जा रहा है कि वर्तमान नेपाली माओवादी ज्यादातर हमले भारतीय मिशन पर ही कर रहे हैं।
बम ब्लास्ट के कनेक्शन और माओवादी
पिछले कुछ महीनों में नेपाल में बहुत कुछ बदला है। नेपाल की राजधानी काठमांडू में बीती 22 फरवरी को एक बहुराष्ट्रीय टेलीकॉम कंपनी ‘एन्सेल’ के दफ्तर के बाहर धमाका हुआ। इसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई, जबकि दो अन्य घायल हो गए। इसके बाद स्वयंभू माओवादी नेता नेत्र विक्रम चंद ने इसकी जिम्मेदारी ली और कहा-‘‘नेपाली नागरिक के मारे जाने का मुझे खेद है, मैं इसके लिए माफी मांगता हूं।’’
आपको बता दें कि यह माओवादी कार्यशैली का हिस्सा है। वे इसी प्रकार की रणनीति अपनाते हैं। इसलिए आशंका को अब बल मिलने लगा है कि माओवादी चरमपंथी नेपाल में एक बार फिर से जड़ जमा रहे हैं। आपको बता दें कि जिस दिन काठमांडू में टेलीकॉम कंपनी के कार्यालय पर बम से हमला किया गया, उसी दिन पूरे नेपाल में कंपनी के दर्जनभर से ज्यादा मोबाइल टावरों को भी निशाना बनाया गया था।
इसके दो दिन बाद ‘कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल’ के नेता नेत्र बिक्रम चंद ने इन हमलों की जिम्मेदारी ली। इस हमले के लिए नेत्र बिक्रम ने कंपनी पर टैक्स चोरी का आरोप लगाया था और कहा कि जो भी कंपनी ऐसा करेगी, उसे बख्शा नहीं जाएगा। यही नहीं माओवादियों ने उक्त कंपनी के कई प्रतिष्ठानों को देशभर में निशाना बनाया। नेपाल में हुए इन ताबड़तोड़ हमलों से पूरे देश में हलचल मच गई है।
एक बड़े तबके में चिंता इस बात को लेकर भी उठी कि इस हमले की जिम्मेदारी एक ताकतवर माओवादी नेता ने ली है। इन हमलों के अलावा भी पिछले छह से आठ महीनों में नेपाल में बहुत कुछ ऐसा हुआ है जिसके बाद यह सवाल पूछा जाना स्वाभाविक हो गया है कि क्या सचमुच नेपाल फिर से माओवादी हिंसा की चपेट में आने वाला है?
क्या कहता है नेपाल का माओवादी इतिहास
यहां थोड़ी चर्चा नेपाल के माओवादी इतिहास पर भी कर लेनी चाहिए। वैसे नेत्र बिक्रम चंद एक समय माओवादी नेता पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ के सहयोगी हुआ करते थे। इन्हीं लोगों ने 1996 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी) बनाई थी। इस पार्टी ने करीब 10 साल तक सरकार के खिलाफ सशस्त्र लड़ाई लड़ी। साल 2006 में पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ने शांति प्रक्रिया में शामिल होने और राजनीति में आने का फैसला किया।
2012 में प्रचंड की पार्टी में टूट हुई। पार्टी के तीन प्रमुख नेता मोहन वैद्य, राम बहादुर थापा और नेत्र बिक्रम चंद ने अलग पार्टी बना ली। आपको बता दें कि जिस प्रकार भारत के पश्चिम बंगाल प्रांत स्थित नक्सलबाड़ी में माओवादियों ने सशस्त्र संघर्ष प्रारंभ किया उसी प्रकार नेपाल में ही लगभग उसी दौरान मोरंग के झापा में माओवादियों ने योजनाबद्ध तरीके से हथियाबंद मूवमेंट प्रारंभ किया। उस दौरान राजशाही ने माओवादियों को बड़ी बेरहमी से कुचल दिया, लेकिन माओवादी अंदर ही अंदर अपना संगठन मजबूत करते रहे।
चूंकि झापा मैदानी इलाका था और पहाड़ी सैनिकों ने उसके खिलाफ बेरहमी दिखाई और माओवादी टिक नहीं पाए, लेकिन यह तो एक झांकी थी। इसके बाद 80 के दशक में एक बार फिर से नेपाल में माओवादियों ने अपना काम खड़ा करना प्रारंभ किया। वह दौर भारत में गणपति और गोडपल्ली सीतारमैया का कालखंड था।
गोडपल्ली के साथ नेपाली माओवादियों के कितने संपर्क रहे यह तो पड़ताल का विषय है, लेकिन बहुत जल्द नेपाल से लेकर आंध्र प्रदेश तक की योजना माओवादी लिब्रेट राजनीतिक नक्शा का हिस्सा लोगों के सामने आया। इस योजना के सार्वजनिक होते ही भारत और नेपाल दोनों की सरकारों के होश उड़ गए।
इन्हीं दिनों नेपाली माओवादियों ने रोल्पा, डोल्पा, जाजरकोट, रूकुम आदि स्थानों पर सशस्त्र अभियान प्रारंभ कर दिया। टुकड़ों में बंटे माओवादियों को वैचारिक और संगठनिक संवल पुष्प कमल दहल और डॉ बाबूराम भट्टराई ने दिया। राई और दहल दोनों के नेतृत्व में माओवादियों ने काठमांडू कूच किया और देखते ही देखते पूरे नेपाल में छा गए। इस बात को लेकर न केवल भारत अपितु चीन के कान खड़े हुए।
चीन इस बात से परेशान होने लगा कि अगर नेपाल में सचमुच के माओवादी प्रभावशाली हो गए तो चीन में भी उसका असर होगा और चीन फिर से अस्थिर हो सकता है। चीन और भारत के दबाव के बीच नेपाली माओवादी लोकतांत्रिक व्यवस्था में शामिल होने के लिए बाध्य हुए, लेकिन इस संघर्ष से निकल कुछ माओवादी नेता ने बंदूक छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुए। उन्हीं नेताओं में से मोहन वैद्य, राम बहादुर थापा और नेत्र बिक्रम चंद हैं।
हालांकि राम बहादुर थापा फिर से पुष्प कमल के साथ हो गए हैं। वे वर्तमान ओली सरकार के मंत्री भी हैं लेकिन अन्य नेता आज भी माओवादी चिंतन को ओढ़े हुए हैं। इधर डॉ. बाबूराम भी कुछ खास नहीं कर रहे हैं। इसलिए ऐसी आशंका जताई जा रही है कि पुराने तमाम माओवादी एक बार फिर से संगठित हो रहे हैं। यह नेपाल और भारत दोनों के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।
इधर, उन दिनों जब पुष्प कमल लोकतांत्रिक ढांचे को अपनाने पर सहमत हो रहे थे तब माओवादी बागी तीनों नेताओं का कहना था कि ये देश में फिर क्रांति की अलख जगाएंगे। इनके मुताबिक प्रचंड ने माओवादियों के साथ धोखा किया है, उन्होंने हजारों कैडर के उस सपने को तोड़ दिया जो सशस्त्र विद्रोह के जरिये सत्ता पर कब्जा करना चाहते थे। इसके दो साल बाद 2014 में नेत्र बिक्रम चंद अपने दोनों साथियों-मोहन वैद्य और राम बहादुर थापा से भी अलग हो गए और अपनी एक नई पार्टी, ‘कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल’ का गठन किया। चंद का दावा है कि इस समय नेपाल में केवल उनकी पार्टी है, जो माओवादी विचारधारा के तहत काम कर रही है इसलिए वही असली माओवादी पार्टी है।
बढ़ रही है माओवादियों की ताकत
इधर के बीते एक साल में माओवादियों की ताकत में जबर्दस्त इजाफा हुआ है। पिछले कुछ महीनों में चंद माओवादी गुट की ताकत में जिस तरह से इजाफा हुआ है उससे प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और सत्ताधारी पार्टी के दूसरे सबसे बड़े नेता प्रचंड, काफी चिंतित है। प्रचंड ने सार्वजनिक रूप से कहा भी है कि वे चंद गुट की हिट लिस्ट में सबसे ऊपर हैं। नेपाल के कुछ पत्रकार बताते हैं कि चंद गुट को पहले किसी सरकार ने गंभीरता से नहीं लिया क्योंकि इसकी ताकत बहुत कम और सीमित इलाकों तक ही थी, लेकिन पिछले साल नई सरकार के गठन के बाद से यह माओवादी गुट सुरक्षा बलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है।
नेपाल के एक वरिष्ठ पत्रकार ने बताया कि आने वाले समय में माओवादी अपनी ताकत बढ़ाएंगे। मैदानी इलाकों में भी माओवादियों की ताकत बढ़ी है। खासकर उन प्रदेशों में जहां किसान एवं भूमिहीन किसानों की संख्या अधिक है। वे माओवादी संगठनों के साथ खड़े होते दिख रहे हैं। दरअसल, काठमांडू और आसपास के क्षेत्रों को छोड़ दें तो नेपाल में सरकार नाम की कोई चीज नहीं है। जनकल्याणकारी योजनाओं का घोर अभाव है। स्कूल, कॉलेज, स्वास्थ्य केन्द्र के मामले में नेपाल बेहद पिछड़ा हुआ देश है। सड़क और यातायात की असुविधा है। इन तमाम समस्याओं के बीच माओवादी लोगों को प्रभावित करते हैं। इसलिए नेपाल में बार-बार माओवादी संघर्ष की पृष्टभूमि तैयार हो रही है।
बीते कुछ महीनों में बिक्रम गुट की सक्रियता नेपाल के कई हिस्सों में तेजी से बढ़ी है। इसने कई हमलों को भी अंजाम दिया है। बीते महीने एक भारतीय कंपनी द्वारा बनाए जा रहे हाइड्रो पावर प्लांट पर भी इसने बम से हमला किया और धमकी दी कि इस परियोजना को पूरा नहीं होने दिया जाएगा। बीते साल अप्रैल में एक बम विराटनगर में भारतीय दूतावास से संबंधित एक शिविर के कार्यालय में पाया गया, इसके बाद सितम्बर में एक बम विराटनगर के मेट्रोपोलिटन कार्यालय में मिला था।
नेपाली मीडिया के मुताबिक बिक्रम चंद माओवादी गुट बीते एक साल से विदेशी कंपनियों, स्थानीय व्यापारियों और बिल्डरों से जमकर वसूली कर रहा है। कई कंपनियों ने परेशान होकर सरकार से गुहार भी लगाई है। हाल में नेत्र बिक्रम चंद ने अपने एक वीडियो संदेश में यह जानकारी भी दी कि उसके गुट ने अपनी सेना (पीपल्स लिबरेशन आर्मी) भी बना ली है। उस वीडियो में उसने यह भी बताया है कि उसकी क्षमता 19 हजार गुरिल्लों की है।
क्या है माओवादियों की मंशा?
कई जानकार यह भी बताते हैं कि माओवादियों का टेलीकॉम कंपनी, एन्सेल पर हमला करना तो केवल एक बहाना था। इनके मुताबिक चंद गुट काफी पहले से कोई बड़ी वारदात करने की कोशिश में था, जिससे वह सरकार को अपनी ताकत का अहसास करा सके और उसने ऐसा करके बता दिया कि अब वे ताकतवर हो गए हैं।
जानकार सूत्रों की मानें तो प्रचंड से नाराज पुराने कई माओवादी नेता बिक्रम चंद के साथ आ गए हैं। नेपाल में इस बात की भी चर्चा है कि बिक्रम चंद के साथ अधिकांश वे लोग हैं जो कभी प्रचंड के माओवादी संगठन की ओर से लड़ा करते थे। जानकारों के मुताबिक पुष्प कमल दहल ने जब शांति समझौते के बाद राजनीति में प्रवेश किया था तब कहा था कि उनके माओवादी गुट के कैडर नेपाली पुलिस और सेना में भर्ती कर लिए जाएंगे लेकिन आंकड़ों के मुताबिक 19,000 कैडर में से करीब सात हजार को ही सेना या पुलिस में भर्ती किया गया। बताया जाता है, जिन्हें नौकरी नहीं मिली उनमें से ज्यादातर नाराज होकर चंद गुट में शामिल हो गए हैं और वे सरकार के सामने चुनौती खड़ी कर रहे हैं।
नेपाल लम्बे समय से राजनीतिक अस्थिरता का शिकार रहा है। पिछले साल जब यहां पूर्ण बहुमत की सरकार बनी तो उसका पहला उद्देश्य विदेशी निवेशकों को नेपाल में बुलाना था। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने इसके लिए चीन और भारत से कई करार भी किये। उन्होंने इन्वेस्टमेंट समिट का भी आयोजन किया। बीते फरवरी की शुरुआत में उन्होंने एक कार्यक्रम में कहा था, ‘नेपाल में यह समय विदेशी निवेशकों के लिए अब तक का सबसे अच्छा समय है।’ इस दौरान उन्होंने यह भी बताया कि विदेशी निवेशकों को बुलाने के लिए सरकार 29-30 मार्च को एक और बड़ी इन्वेस्टमेंट समिट का आयोजन कर रही है।
जानकारों की मानें तो टेलीकॉम कम्पनी एन्सेल पर बड़ा माओवादी हमला होना नेपाल सरकार के मंसूबों पर पानी फेर सकता है क्योंकि ऐसी परिस्थितयों में कोई भी निवेशक नेपाल में निवेश करने से हिचकेगा। नेपाल के निजी क्षेत्र के संगठन एफएनसीसीआई के वरिष्ठ उपाध्यक्ष शेखर गोलछा का कहना है कि इस तरह की घटनाएं नेपाल में निवेश करने के इच्छुक निवेशकों के विश्वास और मनोबल पर सीधा प्रहार करेगा।
यह घटना ऐसे समय में सामने आई है जब नेपाल सरकार दुनियाभर में जाकर कह रही है कि उनका देश सुरक्षित है और वहां उचित कारोबारी माहौल है लेकिन ऐसी घटनाएं नेपाल की छवि को धूमिल कर सकती हैं। हालांकि इस मामले में जानकारों का कहना है कि माओवादी गुट यदि प्रभावशाली भी हो गए तो कोई खास फर्क नहीं पड़ता है। नेपाल में विकास की गति को आगे बढ़ाने से और लोगों को राजगार देने से इस प्रकार की समस्या खुद व खुद खत्म हो जाएगी।
निवेश के माहौल पर पड़ेगा बुरा असर
नेपाल के पूर्व वित्तमंत्री और नेपाली कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राम शरण महत का कहना है कि इससे निवेश के माहौल पर बुरा असर पड़ेगा, पहले से ही व्यापारियों से जबरन वसूली की खबरें चर्चा में हैं और अब एक विदेशी कम्पनी पर इस तरह का हमला होना कारोबारी माहौल पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा। हालांकि, नेपाल सरकार भी जानती है कि इस हमले से निवेशक चिंता में हैं, इसीलिए सरकार ने नेत्र बिक्रम चंद के संगठन को प्रतिबंधित कर दिया है।
नेपाली सुरक्षा एजेंसियों ने अब तक 400 से ज्यादा संदिग्धों माओवादियों को हिरासत में भी लिया है। बिक्रम चंद के भी ठिकानों पर छापेमारी की गई है, लेकिन इन सबके बीच सवाल वही है कि सरकार की यह कार्रवाई उस संगठन के खिलाफ कितनी कारगर साबित होगी जो बहुत पहले से अपनी तैयारी करके बैठा है और सरकार से आर-पार की लड़ाई का मन भी बना चुका है।
कुल मिलाकर नेपाल एक बार फिर से माओवादी आतंकवाद की चपेट में आता दिख रहा है। हालांकि इस बार सरकार की भी तैयार है लेकिन नेपाल में जिस प्रकार माओवादी पृष्टभूमि के नौजवान तेजी से बढ़ रहे हैं वह चिंता का विषय है। साथ ही पड़ोसी देश भारत के लिए भी यह खतरनाक है। अगर नेपाल माओवादी हिंसा की चपेट में फिर से आ गया तो भारत का उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और बिहार बुरी तरह से प्रभावित हो सकता है। साथ ही इसका असर अशांत गोरखालैंड वाले उत्तर बंगाल पर भी पड़ने की संभावना है। इसलिए भारत को भी नेपाल के इस वर्तमान परिवर्तन को गंभीरता से लेना चाहिए।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।