मोदी सरकार की बड़ी कूटनीति से चीन के मंसूबों पर फिरा पानी, इंडिया का दीवाना हुआ ये देश
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
मालदीव में सितंबर 2018 में हुए चुनाव में भारत समर्थक विपक्षी नेता इब्राहिम मोहम्मद सोलिह ने भारी मतों से जीत दर्ज की थी। वहीं चीन समर्थक अब्दुल्ला यामीन को हार का सामना करना पड़ा था। अभी नवनिर्वाचित राष्ट्रपति सोलिह के भारत यात्रा से मालदीव में चीनी वर्चस्व की स्थिति अतीत की बातें हो चुकी हैं।
पिछले माह उनके शपथ ग्रहण के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने मालदीव की प्रथम यात्रा की थी। अब विपक्षी नेता इब्राहिम मोहम्मद सोलिह ने भी राष्ट्रपति बनने के बाद प्रथम विदेश यात्रा भारत कर स्पष्ट कर दिया कि वे "भारत प्रथम "की नीति पर कायम हैं। यामीन ने फरवरी 2018 में अपनी सत्ता बचाने के लिए मालदीव को राजनीतिक एवं संवैधानिक संकट में डाल दिया था। मालदीव में पिछले कुछ माह से हो रहे संवैधानिक गतिरोध और आपातकाल के पीछे चीन महत्वपूर्ण घटक है। चीन भारत के घेराबंदी के लिए लगातार सक्रिय है। इस संदर्भ में चीन के पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट,श्री लंका के हंबनटोटा बंदरगाह इत्यादि को देखा जा सकता है।
चीन कर रहा है घेराबंदी
बांग्लादेश और म्यांमार में भी चीनी आक्रमता किसी से छिपी नहीं है। अब चीन मालदीव के महत्वपूर्ण रणनीतिक भूमि से भारत की घेराबंदी के लिए प्रयत्नशील है। मालदीव में जिस प्रकार पहले राष्ट्रपति यामीन ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश मानने से इंकार किया था और बाद में सुप्रीम कोर्ट के दरवाजों को तोड़कर चीफ जस्टिस को गिरफ्तार किया था,वह अत्यंत शर्मनाक था।लेकिन अब मालदीव में लोकतंत्र की जीत से भारत पुनः मजबूत स्थिति में आ गया है। लेकिन भारत के लिए यह आवश्यक है कि वह मालदीव में लोकतांत्रिक मूल्यों के पोषण हेतु मालदीव में कूटनीतिक दृष्टि से सक्रिय भूमिका का निर्वहन करें।
इस साल संकट में रहा मालदीव
दरअसल, हिंद महासागर का छोटा सा द्वीपीय देश मालदीव इस वर्ष गहरे सियासी और संवैधानिक संकट से जूझते रहा था। लेकिन सितंबर में मालदीव की जनता ने अपने लोकतांत्रिक शक्तियों का प्रयोग करते हुए चीन समर्थक अब्दुल्ला यामीन को हराकर संयुक्त विपक्षी गठबंधन के नेता इब्राहिम मोहम्मद सोलिह को विजयी बनाया। उन्होंने "भारत प्रथम " की नीति को अपनाते हुए राष्ट्रपति बनने के बाद प्रथम विदेश यात्रा के लिए भारत को चुना। सोलिह के पिछले माह 17 नवंबर के शपथ ग्रहण में प्रधानमंत्री मोदी ने मालदीव की प्रथम यात्रा की थी।
प्रधानमंत्री मोदी मालदीव के अतिरिक्त सार्क के सभी देशों की यात्रा कर चुके थे। इब्राहिम सोलिह भारत के साथ मजबूत संबंधों के हिमायती रहे हैं। वहीं पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन चीन के कट्टर समर्थक रहे हैं। यही कारण है कि इस मालदीव के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति मोहम्मद सोलिह के शपथ ग्रहण समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल हुए थे।
राष्ट्रपति सालेह ने शपथ ग्रहण के बाद अपने भाषण में विश्व के शक्तिशाली देशों के नामों का जिक्र न करते हुए केवल भारत का नाम लिया था। भारत के प्रधानमंत्री मोदी इकलौते राष्ट्राध्यक्ष हैं,जिन्हें इस शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने के लिए बुलाया गया था। प्रधानमंत्री मोदी इससे पूर्व 2015 में मालदीव की यात्रा पर जाने वाले थे,लेकिन वहाँ पर भारत समर्थक पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नाशिद की गिरफ्तारी के बाद बढ़े सरकार विरोधी प्रदर्शनों के कारण उन्होंने अपनी यात्रा रद्द कर दी थी।
सोलिह की प्रथम विदेश यात्रा मोदी सरकार की जीत
एक माह पूर्व सत्ता संभालने के बाद सोलिह ने अपने प्रथम विदेश यात्रा के लिए भारत को चुनकर स्पष्ट कर दिया कि अब मालदीव में चीनी वर्चस्व के दिन अतीत का मामला हो चुका है। उनके तीन दिवसीय यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने ऐलान किया कि भारत मालदीव को आर्थिक विकास के लिए 1.4 बिलियन डॉलर की मदद करेगा।
प्रधानमंत्री ने कहा कि मालदीव के सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए बजट समर्थन, मुद्रा की अदला बदली और क्रेडिट लाइन के रुप में 1.4 अरब डॉलर की मदद भारत करेगा।
भारत-मालदीव द्विपक्षीय वार्ता के दौरान दोनों पक्ष हिंद महासागर में सुरक्षा सहयोग को और भी मजबूत करने के लिए सहमत हुए। इसके अतिरिक्त दोनों देशों के बीच 4 विषयों पर समझौता हुआ है,जिसमें एक वीजा संबंधी मामले को लेकर भी है।इस दौरान सोलिह ने कहा कि भारत हमारा करीबी पड़ोसी है और दोनों देशों के लोग मित्रता और सांस्कृतिक समानता के संबंध से जुड़े हुए हैं।
कैसी रही मालदीव की आंतरिक स्थिति
मालदीव में सितंबर 2018 के चुनाव में यामीन के खिलाफ पूरा विपक्ष एक मंच पर आ गया था। इब्राहिम मोहम्मद सालेह मालदीव डेमोक्रेटिक पार्टी के नेतृत्व वाले संयुक्त विपक्ष के राष्ट्रपति उम्मीदवार थे। इस गठबंधन में जम्हूरी पार्टी, अदालत पार्टी और प्रोग्रेसिव पार्टी ऑफ मालदीव्स(पीपीएम) का एक धड़ा भी शामिल है। सत्ता में आने के बाद से ही यामीन ने कई ऐसे कानून बनाए,जिनसे विपक्षी नेता या तो जेल में डार दिए गए या उन्हें देश छोड़ना पड़ा।
मालदीव में फरवरी 2018 का संवैधानिक संकट और भारत से मदद
इस वर्ष फरवरी में मालदीव के सर्वोच्च अदालत ने पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद पर चल रहे मुकदमे को असंवैधानिक करार दिया था और कैद किए गए विपक्ष के नौ सांसदों को रिहा करने का आदेश भी जारी किया था। यह सियासी तूफान इतना प्रबल था कि इसकी हलचलें भारत और चीन तक सुनाई दे रही थीं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा विपक्षी नेताओं को राजनीतिक मामलों में बरी करने और राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन के इस आदेश को मानने से इंकार करने की पृष्ठभूमि में यह संकट उत्पन्न हुआ था।
नई परिस्थिति में राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन ने पहले 15 दिनों के आपातकाल की घोषणा की और संसद भंग की कर दी थी। आपातकाल की घोषणा के कुछ देर बाद ही सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे तोड़कर चीफ जस्टिस अब्दुल्ला सईद और दूसरे जजों के साथ पूर्व राष्ट्रपति मौमून.अब्दुल गयूम को गिरफ्तार कर लिया गया था।
गिरफ्तारी पूर्व मालदीव के सुप्रीम कोर्ट ने भारत से विधि का शासन एवं संवैधानिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए मदद मांगी थी। भारत समर्थक मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद ने राजनीतिक संकट के समाधान के लिए भारत से मदद मांगी। मोहम्मद नसीद ने भी भारत से त्वरित सैन्य कार्यवाई की माँग की थी।
आखिर मामला क्या था?
मालदीव के फरवरी 2018 के ताजा राजनीतिक संकट की जड़ें 2012 में तत्कालीन और पहले निर्वाचित राष्ट्रपति मुहम्मद नशीद के तख्तापलट से जुड़ी हैं। नशीद के तख्तापलट के बाद अब्दुल्ला यामीन राष्ट्रपति बने। उन्होंने चुन-चुनकर अपने विरोधियों को निशाना बनाया। नशीद को 2015 में आतंकवाद के आरोपों में 13 साल जेल की सजा हुई,लेकिन वह इलाज के लिए ब्रिटेन चले गए और वहीं राजनीतिक शरण भी ली थी। फरवरी 2018 में जब मालदीप के सुप्रीम कोर्ट ने नशीद समेत 9 राजनीतिक बंदियों को को रिहा करने का आदेश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने अब्दुल्ला यामीन की पार्टी से बगावत करने वाले 12 सांसदों को भी बहाल करने का आदेश दिया। इन 12 सांसदों की बहाली होने से राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन सरकार अल्पमत में आ जाती और भारत समर्थक मुहम्मद नशीद की पार्टी नई अगुवाई वाला संयुक्त विपक्ष बहुमत में आ जाता। लेकिन अब्दुल्ला यामीन ने कोर्ट के आदेश को मानने से इंकार कर दिया और सेना को आदेश दिया कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश को नहीं माने।इस बीच गिरफ्तारी से बचे हुए शेष जजों ने दबाव में आकर 9 राजनीतिक कैदियों के रिहाई का फैसला वापस ले लिया है।
अब्दुल्ला यामीन पर चीनी प्रभाव और भारत से बढ़ती दूरी
फरवरी 2018 के मालदीव के इस संवैधानिक संकट के साथ ही भारत-मालदीव संबंधों में और ज्यादा तनाव आ गया था। मालदीव की कंपनियों ने अपने विज्ञापन में कह दिया कि भारतीय नौकरी के लिए आवेदन नहीं करें, क्योंकि उन्हें वर्क वीजा नहीं मिलेगा। इस दौरान मालदीव पर जबरदस्त चीन के प्रभाव का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि भारत के तरफ से मालदीप को उपहारस्वरूप स्वरूप दिए गए दो हेलीकॉप्टरों को भी भारत को लौटा दिया गया। यह भारतीय मालदीव में भारत की सैन्य और कूटनीतिक नीतियों को तगड़ा झटका था।लेकिन अब सोलिह के आने के बाद से स्थितियां बदल गई हैं।
शपथ ग्रहण के साथ ही सोलिह का चीन पर हमला और भारत का साथ
मालदीव के नए राष्ट्रपति ने सोलिह ने शपथ लेने के बाद पिछली सरकार के वक्त हुई सरकारी खजाने की लूट और चीन की बढ़ती दखल पर चिंता जताई। प्रधानमंत्री मोदी ने सोलिह को भरोसा दिलाया कि भारत हर स्थिति में मालदीव के साथ खड़ा है। फिलहाल मालदीव गंभीर आर्थिक परेशानी में फंसा हुआ है।सोलिह ने कहा कि पिछली सरकार के समय में चीन से हुई हर एक डील की समीक्षा करेंगे।
चीन के कर्जे में फंसा मालदीव और भारत के मददगार हाथ
मालदीव पर चीन का 1.3 अरब डॉलर का कर्ज है। यह कर्ज उसके जीडीपी के एक तिहाई से भी ज्यादा है। मालदीव के कुल विदेशी कर्ज में चीन का हिस्सा 80 फीसद है। चीन ने कम से कम यहां 16 छोटे द्वीप लीज पर लिए हैं। अगर भारत हिंद प्रशांत क्षेत्र में खुद को एक महाशक्ति तथा सुरक्षा गारंटर के रुप में स्थापित करने का सपना देखता है,तो इसे हर हाल में अपने पड़ोस के मुल्क के लिए ज्यादा सक्रिय नीति अपनानी होगी।
इस संपूर्ण संकट के पृष्ठभूमि में ड्रेगन की परछाई स्पष्टतः देखी जा सकती है। चीन जिसका वर्ष 2011 तक माले में दूतावास तक नहीं था,भारत के ठीक पड़ोस में स्थित इस छोटे से देश की घरेलू राजनीति में प्रमुख खिलाड़ी बन चुका है।
चीन द्वारा भारत की घेराबंदी लगातार रणनीतिक स्तर पर जारी है। इस संदर्भ में पाकिस्तान का ग्वादर पोर्ट और श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह में चीनी सक्रियता को हम लोग देख सकते हैं। हंबनटोटा को चीन ने श्रीलंका से 99 वर्ष के लीज पर लिया है।ऐसे में मालदीव में चीनी प्रभाव कम करना भारत के लिए आवश्यक है।
भारत हेतु मालदीव का रणनीतिक महत्व
भारतीय मुख्य भू-भाग से मालदीप की दूरी करीब 1200 किमी है। लक्षद्वीप से तो इसकी दूरी केवल 700 किमी की है। जिस तरह हालत अभी मालदीप में हैं, उसके चलते वहां उग्रवाद, धार्मिक कट्टरपंथ,समुद्री डकैती जैसी समस्याएं उभर सकती हैं, जो भारत के लिए चिंता की बात है। ऐसे में भारतीय सक्रियता की वहां कितनी आवश्यक है,उसे बखूबी समझा जा सकता है। मालदीव में करीब 22 हजार भारतीय रहते हैं। वहां करीब 400 डॉक्टर हैं,जिसमें से 125 डॉक्टर भारतीय हैं। इसी तरह 25% अध्यापक भी भारतीय है।
भारत बच रहा है मालदीव में हस्तक्षेप से, लेकिन है ये चीनी खतरा
भारत बीते एक दशक से मालदीव के अंदरूनी मामले में हस्तक्षेप करने से बच रहा है। इसका सीधा फायदा चीन को मिलता दिख रहा था। राष्ट्रपति शी जिनपिंग की खास तैयारियां यहाँ साफ देखी जा सकती है। चीन के लिए 4,0000 की आबादी वाले देश में आर्थिक संभावनाएं बहुत सीमित है।
समझा जा सकता है कि बीजिंग की मालदीव में रुचि पूर्णत:रणनीतिक है। चीन पर्दे के पीछे से ऐसे जाल बुन रहा,जिससे मालदीप और नई दिल्ली में दूरी बढ़ जाए। ऐसे में भारत के लिए अब सक्रिय होना अपरिहार्य हो गया है।
बता दें कि हिंद महासागर ऑस्ट्रेलिया, दक्षिणपूर्वी एशिया,दक्षिण एशिया,पश्चिम एशिया और अफ्रीका के पूर्वी इलाके को छूता है। इस इलाके में 40 से ज्यादा देश आते हैं, जिसमें दुनिया की 40% आबादी रहती है। मालदीव भी इस क्षेत्र का महत्वपूर्ण देश है।
भारत का अधिकतर अंतरराष्ट्रीय व्यापार हिंद महासागर से होता है, इसलिए यहां से गुजरने वाले समुद्री मार्गों का सुरक्षित होना भारत के लिए काफी महत्वपूर्ण है। हिंद महासागर में भारत को घेरने की कवायद कर रहा चीन भी मालदीव पर अपनी पकड़ मजबूत करने में लगा हुआ था।
मालदीप अपने कुछ द्वीप चीन को पट्टे पर भी दे चुका है। आशंका जताई जा रही थी कि चीन इसका इस्तेमाल भारत पर निगरानी संबंधी गतिविधियों में करने के लिए वहाँ सैन्य बेस बनाने के लिए इच्छुक है। पिछले चार वर्षों में चीन लगभग दो तिहाई दक्षिण चीन महासागर में केवल मनौवैज्ञानिक दबाव बनाकर कब्जा कर चुका है।भारत को ऐसे में हिंद महासागर में स्वतंत्र नौवहन की व्यवस्था करने के लिए विश्व समुदाय के साथ मालदीव में सक्रिय होना आवश्यक है।
मोदी सरकार के लिए क्या है जरूरी?
भारत के लिए हिंद महासागर में अपने वर्चस्व को प्रदर्शित करने का यह सबसे महत्वपूर्ण अवसर है,जहां भारत मालदीप में सक्रिय भूमिका का निर्वहन कर लोकतंत्र की जड़ों को और भी मजबूत कर सकता है।
भारत सदैव मालदीव के निकटस्थ मित्र की भूमिका में रहा है। दिसंबर 2014 में जब माले में पानी आपू्र्ति कंपनी के जेनरेटर पैनल में आग लग गई थी,तो भारत ने तत्काल मदद करते हुए आईएनएस सुकन्या एवं आईएनएस दीपक को पेयजल के साथ रवाना किया था।इसके अतिरिक्त भारतीय वायुसेना ने भी एयरक्राफ्ट के माध्यम से मालदीव में पानी पहुँचाया था।इस संपूर्ण ऑपरेशन को ऑपरेशन नीर के नाम से जाना जाता है।
भारत ने इसके पूर्व भी 1988 में तत्कालीन मालदीप के राष्ट्रपति के अनुरोध पर "ऑपरेशन कैक्टस" को संचालित किया था। इसमें इमरजेंसी मैसेज के केवल 9 घंटे बाद ही भारतीय कमांडो मालदीव पहुंचे। भारतीय सेना ने कुछ ही घंटों में सब कुछ अपने नियंत्रण में ले लिया और मालदीव के तख्तापलट को नाकाम कर दिया।
मालदीव के लोकतांत्रिक मूल्यों के भारत को सदैव इसी प्रकार सक्रिय रहने की आवश्यकता है। मालदीव के जनता के आकांक्षाओं पर उतरना भारत के लिए महत्वपूर्ण है। भारत के आक्रामक और सक्रिय कूटनीति से हिंद महासागर को स्वतंत्र नौपरिवहन क्षेत्र बनाने में काफी सहायक होगी।
विदेश नीति में आक्रामक हुआ है भारत
भारत ने पिछले ही वर्ष डोकलाम में अपने हितों की रक्षा के लिए भूटान के जमीन से चीन को चुनौती देने के लिए आक्रामक और सक्रिय कूटनीति को प्रतिबंबित किया था। इससे भारत की न केवल वैश्विक प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई थी अपितु आसियान देशों में भी चीनी वर्चस्व के विरुद्ध संघर्ष में भारत को प्रभावी राष्ट्र के रुप में स्वीकार किया गया।
अगर भारत मालदीव में भी लोकतान्त्रिक मूल्यों के कार्य सक्रिय रहता है,तो इससे सार्क देशों में भारत को लेकर एक सशक्त संदेश जाएगा, जो वर्तमान परिप्रेक्ष्य में काफी महत्वपूर्ण है। नि:संदेह मालदीव के राष्ट्रपति सोलिह के भारत यात्रा से भारत-मालदीव के संबंध अत्यंत घनिष्ठ हुए हैं,जिससे हिंद महासागर में न केवल लोकतांत्रिक मूल्य मजबूत होंगे,अपितु हिंद महासागर में भारतीय सामरिक स्थिति भी मजबूत होगी।
लेखक राहुल लाल कूटनीतिक मामलों के विशेषज्ञ हैं और इस समय भारत-यूरोपीय यूनियन सांस्कृतिक परिषद तथा भारत-अफ्रीकी यूनियन सांस्कृतिक परिषद के सदस्य हैं।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.