भला मिथुन चक्रवर्ती को दादा साहब फ़ालके पुरस्कार क्यों
इस साल के दादा साहब फ़ालके पुरस्कार को मिथुन चक्रवर्ती को दिए जाने की घोषणा के साथ विवाद उठ खड़ा हुआ। इसमें शक नहीं, हर साल की भांति फिल्मी दुनिया में इस साल भी कई उपयुक्त उम्मीदवार थे। माधबी मुखर्जी, धर्मेंद्र, शबाना आजमी, जानु बरुआ, गोविंद निहलाणी... इनमें से कुछ काफी आयु के हो चुके हैं।
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हम विवाद-काल में रह रहे हैं। हर बात पर विवाद हमारा शगल है। किताब लिखिए, विवाद खड़ा होगा, फेसबुक पार पोस्ट डालिए बहस होगी, गाली-गलौज होगी, फिल्म बनाइए किसी की भावनाएं आहत होंगी, पुरस्कार तो वैसे भी माना जाता है कि तोड़-तोड़ से मिलते हैं। आज कोई पुरस्कार-सम्मान विवाद से परे नहीं है। नोबेल पुरस्कार हो अथवा साहित्य अकादमी, ऑस्कर या फ़िर दादा साहब फ़ालके पुरस्कार हो सब विवादास्पद हो गए हैं।
नि:संदेह पुरस्कार की संख्या उम्मीदवारों से काफी कम होती है, मजबूत दावेदारों के रहते हुए भी सम्मान किसी एक अथवा यदि बांटने की परम्परा हो, तो दो या दो से अधिक को भी मिल सकता है। तब भी सब उम्मीदवारों को नहीं मिलेगा। जाहिर सी बात है, लोगों की अपनी पसंद होती है और निर्णायकों की अपनी। जिसे नहीं मिलता है, उनमें से कुछ केलिए अंगूर खट्टी हो जाते हैं। जिनके पसंददीदा लोगों को नहीं मिलता है, उन्हें बहुत बुरा लगता है।
बस विवाद के लिए इतना काफी है। कुछ लोग गुण के अलावा जाति, धर्म, रंग, क्षेत्र के आधार पर पुरस्कार की वकालत प्रच्छन्न रूप से करते हैं। एक अनार सौ बीमार की स्थिति का इलाज क्या हो सकता है, विवाद के अलावा?
इस साल के दादा साहब फ़ालके पुरस्कार को मिथुन चक्रवर्ती को दिए जाने की घोषणा के साथ विवाद उठ खड़ा हुआ। इसमें शक नहीं, हर साल की भांति फिल्मी दुनिया में इस साल भी कई उपयुक्त उम्मीदवार थे। माधबी मुखर्जी, धर्मेंद्र, शबाना आजमी, जानु बरुआ, गोविंद निहलाणी... इनमें से कुछ काफी आयु के हो चुके हैं। तर्क है, उन्हें देना चाहिए था, उनके पास समय कम है। सोच कर देखिए, यह तर्क कितना बेबुनियाद है। कौन कब तक रहेगा और कौन कब जाएगा क्या यह तय है?
क्या इस तर्क का मतलब यह नहीं कि कम उम्र वाले पुरस्कार के हकदार नहीं हो सकते? खैर, मिथुन को दादा साहब फालके पुरस्कार नहीं मिलना चाहिए था, के स्थान पर हम यह देंखे कि उन्हें यह पुरस्कार क्यों मिलना चाहिए था।
लिमका बुक ऑफ़ रिकॉर्ड्स में एक साल (1989) में 19 फिल्मों के रिकॉर्ड के साथ दर्ज मिथुन चक्रवर्ती सैंकड़े के आस-पास फिल्मों में काम किया है। मगर यह पुरस्कार की योग्यता कदापि नहीं हो सकती है। हां, हिन्दी फिल्मों के संमृद्ध परिवार से आए लंबे-चौड़े, खूबसूरत नायकों के मुकाबले कद में बहुत ऊंचे नहीं, पर अच्छी कद-काठी के, सामान्य परिवार से आने वाले सांवले मिथुन ने कुछ अविस्मरणीय भूमिकाएं की हैं। उन्हें तीन बार राष्ट्रीय पुरस्कार (‘मृगया’, ‘तहादेर कथा’, ‘स्वामी विवेकानंद’) प्राप्त हुए हैं। उन्होंने रामकृष्ण परमहंस एवं जल्लाद की भूमिकाएं एक साल में आस-पास की हैं जो उनके अभिनय की रेंज का प्रमाण हैं।
मृणाल सेन की जन्म शताब्दी मनाई जा रही है। मृणाल सेन की पहली रंगीन फिल्म थी ‘मृगया’ और इस फिल्म के नायक के रूप में उन्होंने मिथुन चक्रवर्ती को चुना। सेन ने मिथुन को उनके बेझिझक व्यवहार के लिए चुना। सेन ने मिथुन को पुणे फिल्म संस्थान के ग्रेजुएशन समारोह के अवसर पर देखा था।
उस समय उन्हें मिथुन का बेझिझक व्यवहार जंचा नहीं था मगर जब वे ‘मृगया’ (1976) बनाने चले तो उन्हें वही लंबे बाल वाला 1973 बैच का सांवला लड़का याद आया और उन्होंने अपने काबिल सिनेमाटोग्राफर के. के. महाजन की सहायता से उससे संपर्क किया और उसे फिल्म में मुख्य भूमिका दी। सेन की पारखी नजर और निर्देशन तथा मिथुन के अभिनय का कमाल था, मिथुन को सर्वोत्तम अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ। जबकि यह उनकी पहली फिल्म थी।
जल्द ही मिथुन चक्रवर्ती युवाओं के क्रेज बन गए। 1982 में आई फिल्म ‘डिस्को डॉन्सर’ ने हिन्दी सिनेमा को एक नई दिशा दे दी। सिनेमा का समाज खासकर युवा पर बहुत गहरा प्रभाव होता है। इस फिल्म ने गली-गली में डिस्को डॉन्सर पैदा कर दिए। इसी का गान बज रहा था, इसी पर लोग नाच रहे थे। और इसी साल मिथुन ने ‘कसम पैदा करने वाले की’, ‘डॉन्स डॉन्स’, ‘मुद्दा’, ‘दिलवाला’, ‘प्यार झुकता नहीं’ जैसी सफल फिल्में कीं।
उन्होंने ‘स्वर्ग से सुंदर’ जैसी पारिवारिक फिल्में की साथ ही ‘वतन के रखवाले’ जैसी मल्टीस्टारर फिल्में भी की। उनका कहा संवाद, ‘कोई शक?’ लोगों के सिर चढ़ कर बोला। एक समय था लोग उनकी फिल्म अनदेखी नहीं कर सकते थे। ‘रात के बारह बजे’, ‘बूमूम लाका लाका’ ने लोगों को पागल कर दिया था ऐरा था मिथुन का आकर्षण।
राष्ट्रीय पुरस्कार पाने के बावजूद कुछ समय मिथुन को ढंग का काम नहीं मिला। एक बार फिर रास्ता खुला ‘हम पांच’, ‘गुरु’, ‘मुजरिम’ आदि ने उन्हें फिर से स्थापित किया। और फिर 1992 में आई बुद्धदेब दासगुप्ता की फिल्म ‘तहादेर कथा’ जिसने मिथुन को सर्वोत्तम अभिनय का और बांग्ला फिल्म को सर्वोत्तम फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार दिलाया। और छ: साल बाद वी जी अय्यर की फिल्म ‘विवेकानंद’ में रामकृष्ण की सहायक भूमिका के लिए मिथुन चक्रवर्ती को एक बार फिर राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ। अब तक उन्हें फिल्म के 11 पुरस्कार मिले हैं।
आईएमडीबी की मानें तो मिथुन ने 380 फिल्मों मे अभिनय किया है। ‘शौकीन’, ‘तितली’, ‘पसंद अपनी अपनी’, ‘सितारा’, ‘जाग उठा इंसान’, ‘ताशकंद फाइल्स’, अनाड़ी इज बैक’, काश्मीर फाइल्स’ और पिछले वर्ष आई ‘काबुलीवाला’ आदि फिल्मों में मिथुन चक्रवर्ती ने यादगार भूमिकाएं की हैं।
एक समय था उनकी फिल्म देखने केलिए टिकट खिड़की पर लंबी लाइन लगती थी। वे अब भी सक्रिय हैं। यदि ऐसे अभिनेता, सत्तर साल से ऊपर के मिथुन चक्रवर्ती को दादा साहब फ़ालके पुरस्कार मिलता है तो इतनी हाय-तोबा क्यों? मिथुन चक्रवर्ती को इस सर्वोच्च सम्मान हेतु हार्दिक बधाई!
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