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मिर्जा गालिब जयंती: हुई मुद्दत...पर गालिब याद आता है।

Tue, 27 Dec 2022 11:04 AM IST
Kumar Atul कुमार अतुल
Updated Tue, 27 Dec 2022 11:04 AM IST
सार

27 दिसंबर, 1797 को एक अजीम शायर ने जन्म लिया था जिसे हम गालिब के नाम से जानते हैं । मियां, 225 साल बाद भी हमारे जैसे करोड़ों लोग तुम्हारे फैन हैं और आगे भी रहेंगे।

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mirza ghalib birthday special, his legacy of urdu shayari
मिर्जा गालिब जन्मदिन विशेष - फोटो : Twitter

विस्तार

27 दिसंबर को गालिब की यौम-ए-पैदाइश (जयंती) है । (27 दिसंबर, 1797 को एक अजीम शायर ने जन्म लिया था जिसे हम गालिब के नाम से जानते हैं।) मियां, 225 साल बाद भी हमारे जैसे करोड़ों लोग तुम्हारे फैन हैं और आगे भी रहेंगे। किसी भी अदीब के लिए यह बड़े फख्र की बात है। सच तो यह है कई बातों के लिए मेरे जैसे लोगों पर तुम्हारी उधारी है। यह उधार जिंदगी के हर बढ़ते पाए के साथ दोगुना हुआ जाता है।

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यह सच है कि शायर तो बहुत हुए पर गालिब का अंदाज-ए बयां कुछ और ही था। यह बात इस शायर को भी बखूबी मालूम थी। शायद ही किसी और शायर ने अपने बारे में इतने आत्मविश्वास के साथ ऐसा ऐलान किया हो-

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हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे
पर कहते हैं कि गालिब का है अंदाज-ए-बयां और
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल
जब आंख से ही न टपका तो फिर लहू क्या है? 



हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि जिस ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमां लेकिन फिर भी कम निकले, जैसे शेरों की गुगली फेंकते हुए सुना था। बचपन की नासमझी की वजह से शेरों के मायने तो नहीं समझ पाए मगर इतना जरूर लगा कि मियां गालिब कोई ऐसी चीज जरूर हैं जिनका जिक्र वह हर मौके पर लाजिमी समझते हैं। 

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किशोरावस्था की दहलीज लांघी और एक षोडशी के घर के चक्कर काटे तो गालिब कुछ-कुछ समझ में आने लगे और हम यह शेर खूब गुनगुनाने लगे-
 

मोहब्बत में नहीं है फर्क जीने और मरने का, उसी को देखकर जीते हैं जिस काफिर से दम निकले। 


और, जब मोहब्बत में पिटे तो भी बेसाख्ता मियां गालिब ही याद आए धौल-धप्पा उस शरापा नाज का, हम कर बैठे थे गालिब पेशदस्ती एक दिन। यूनिवर्सिटी में दाखिल हुए तो लंबे बाल वाली सहपाठिनियों को देखकर गालिब ही जुबां पर आते- 


आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक, कौन जीता है तेरी जुल्फ के सर होने तक

माशूकाओं की कातिलाना अदाओं और दिलफरेबी से गालिब ने ही बचाए रखा- तेरे वादे पे जिए हम ये जो जाना झूठ जाना, कि खुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता। 

गालिब ने ही यह समझाया कि लिखे-लिखाए पैगाम और पैगाम लाने वाले की जुबां में पैगाम जुदा होता है। उन्होंने लिखा-
देके खत मुंह देखता है नामवर, कुछ तो पैगाम-ए-जुबानी और है।।

mirza ghalib birthday special, his legacy of urdu shayari
हमेशा याद रखी जाएंगी गालिब की गजलें - फोटो : Twitter

जवानी की दहलीज पर पहुंचे तो दूरदर्शन पर मियां गालिब के किरदार के दर्शन किए। गुलजार के सीरियल में नसीरुद्दीन शाह ने क्या खूब किरदार निभाया था। ऐसा लगता था मानों नसीर में गालिब की रूह समा गई हो। बल्लीमारान की वो गलियां और उनके घरों में लटके पोशीदा टाट के परदे। यकीन मानिए मिर्जा के उस युग को ढूंढने मैंने पुरानी दिल्ली के इलाके के कई चक्कर भी काटे।

गालिब उन घरों-गलियों में तो न मिले, अलबत्ता लोगों के दिलों में पैबस्त जरूर मिले। सीरियल के जरिए ही सही, गालिब की दर्दभरी जिंदगी से रूबरू हुआ तो उसके बाद उनकी शायरी और ज्यादा कीमती लगने लगी। कमसिन उम्र के सात-सात बच्चों को गंवाने वाले गालिब दंपति की त्रासदी, पेंशन के लिए दिल्ली से कलकत्ते तक की भागम-भाग और जिंदगी की तल्ख सच्चाइयों की आंच में पगी वो उम्दा शायरी-

दिल ही तो है, न संगोखिस्त, दर्द से भर न आए क्यों, रोएंगे हम हजार बार कोई हमें सताए क्यों, सुनकर कलेजा कट जाता। 
यारों के साथ कभी रात में चकल्लस को बैठा तो भी गालिब का ही सहारा रहा, गो हाथ में जुंबिश नहीं, आंखों में तो दम है, रहने दो अभी सागर-ओ-मीना मेरे आगे। 

जब भी कभी अपनी इमेज के बारे में सोचा तो यह शेर जुबां पर आया– 
ये मसाइल-ए-तसव्वुफ वो तेरा बयान गालिब, तुझे हम वली समझते जो न वादाखार होता। 

अपनी फटेहाली बयां करने के लिए गालिब से बेहतर और क्या होगा-
चिपक रहा है बदन पे लहू से पैराहन हमारी जेब को अब हाजत-ए-रफू क्या है।

जिंदगी को गमों ने घेरा तो-
कैद-ए-हयात बंद-ए-गम असल में दोनों एक हैं, मौत से पहले आदमी गम से निजात पाए क्यों 

ये शेर ढाल बन गए। मन कभी रहस्यवाद और तत्वमीमांसा के बारे में फिक्रमंद हुआ और वेदांत की परिभाषा ढूंढनी चाही तो सोचा अपने मियां गालिब को ही पकड़ते हैं और वो शेर मिल गए जिससे रहस्यवाद और वेदांत की परिभाषा गढ़ी जा सकती है। 

उग रहा है दर-ओ-दीवार पर सब्ज गालिब, हम बियाबां में हैं और घर में बहार आई है
और न था कुछ तो खुदा था, न होता तो खुदा होता, डुबोया मुझको होने ने, न होता गर तो क्या होता। 

संतानों के एक-एक कर मरने का सदमा सहता, सियासी वजहों से अंग्रेजों से पेंशन के लिए संघर्ष करता यह शायर कितना जीवट भरा और जिंदादिल था उसका अंदाजा एक घटना से लगाया जा सकता है। हुआ यूं कि एक बार गालिब को पेंशन की कई बकाया किस्तें एक साथ मिल गईं। सारे पैसों की वह शराब खरीद कर लाए।

जब उनसे पूछा गया कि वे खाएंगे क्या तो उन्होंने अपने अलबेले अंदाज में जवाब दिया-खुदा ने जब उन्हें जमीं पर भेजा है तो उन्हें खिलाने की जिम्मेदारी भी उसी की है। लेकिन चूंकि शराब की जिम्मेदारी खुदा ने नहीं ली है लिहाजा यह इंतजाम उन्होंने खुद किया।

यह अजीम शायर अपनी फटेहाली और बदहाली को भी किस कदर तंजिया अंदाज में ढालता है उसकी बानगी देखिए-

कर्ज की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हां
रंग लाएगी हमारी फाकामस्ती एक दिन।।


मिर्जा गालिब के शेरों की अनगिनत पैरोडियां गढ़ी गईं। इसी से पता चलता है कि गालिब कितने मकबूल हैं और उनका आम जीवन में कितना असर है। लोग अमरत्व की कल्पना करते हैं, गालिब ने अपनी शायरी के जरिए यह काम करके दिखाया है। मीर, दाग, मोमिन, बहादुर शाह जफर के जैसे शायरों के दौर में गालिब ने अपने लिए अलग राह बनाई तो उसकी वजह भी थी। 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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