जलवायु परिवर्तन: पूर्वोत्तर में बड़ा खतरा बनते तेजी से पिघलते ग्लेशियर
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देश के पूर्वोत्तर इलाके में ग्लोबल वार्मिंग का प्रकोप ज्यादा होने की खबरें तो बीते कुछ वर्षो से सामने आ रही हैं। लेकिन अब एक ताजा अध्ययन रिपोर्ट ने पर्यावरणविदों की चिंता बढ़ा दी है। हाल में नागालैंड विश्वविद्यालय और गुवाहाटी स्थित कॉटन विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने अपने एक ताजा अध्ययन में कहा-
अरुणाचल प्रदेश में बीते तीन दशकों के दौरान ग्लेशियर प्रति साल 16.94 वर्ग किलोमीटर की दर से पिघल रहा है और अगर यह सिलसिला जारी रहा तो ग्लेशियर के पिघलने से निकलने वाले पानी पर निर्भर रहने वाले समुदायों को भविष्य में खेती और पीने के लिए पानी की किल्लत का सामना करना पड़ सकता है। छोटे ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार और ज्यादा है।
वैज्ञानिकों की एक टीम ने बीते 32 वर्षों के आंकड़ों की सहायता से अरुणाचल प्रदेश में ग्लेशियरों की संख्या और उनके घटते आकार का अध्ययन किया है। इससे पता चलता है कि वर्ष 1988 में जहां राज्य का 585 वर्ग किलोमीटर इलाका ग्लेशियर ढका था, वहीं वर्ष 2020 में यह घट कर महज 275 वर्ग किलोमीटर रह गया है। इससे साफ है कि ग्लेशियर के क्षेत्रफल में इस दौरान करीब 53 फीसदी की कमी आई है।
जलवायु परिवर्तन और इसके दुष्प्रभाव
बीते महीने जर्नल आफ अर्थ सिस्टम साइंस में छपी इस अध्ययन रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन और उसके गंभीर असर के आकलन के लिए ग्लेशियर एक बेहतर पैमाना हैं। अध्ययन टीम के सदस्य और गुवाहाटी स्थिति कॉटन विश्वविद्यालय के पर्यावरण जीव विज्ञान और वन्य जीव विज्ञान विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. नबोजित हजारिका कहते हैं कि यह अध्ययन इस बात का सबूत है कि पूर्वी हिमालय में ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्लेशियर कितनी तेजी से पिघल रहे हैं।
इस टीम ने अपने अध्ययन के दौरान तवांग, वेस्ट कामेंग, अपर सियांग और अपर दिबांग वैली इलाकों में ग्लेशियरों का अध्ययन किया। इस इलाके में ज्यादातर ग्लेशियर समुद्र की सतह से साढ़े चार हजार से 48 सौ मीटर की ऊंचाई पर स्थित हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लेशियरों के पिघलने के कारण ग्लेशियल झीलों के निर्माण का खतरा बढ़ जाता है। ऐसी झीलें अक्सर तबाही मचाती हैं। दो साल पहले सिक्किम में ऐसी एक झील के फटने से बड़े पैमाने पर तबाही मची थी और जान-माल का भारी नुकसान हुआ था।
अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 1988 में अरुणाचल प्रदेश में कुल 756 ग्लेशियर थे जो वर्ष 2020 में घट कर 646 रह गए। टीम के एक अन्य सदस्य और नागालैंड विश्वविद्यालय के डा। एल। जमीर बताते हैं कि पश्चिमी हिमालय के मुकाबले पूर्वी हिमालय की ऊंचाई कम है। यही वजह है कि इस इलाके में ग्लोबल वार्मिंग का असर ज्यादा होने का अंदेशा है।
ग्लोबल वार्मिंग के असर का पता लगाने के लिए ग्लोशियरों के पिघलना एक पैमाना माना जाता है। लेकिन इससे पहले कभी पूर्वी हिमालय में इतने बड़े पैमाने पर कोई अध्ययन नहीं किया गया था। अध्ययन रिपोर्ट में कहा गया है कि इलाके में शोध केंद्र कम होना इसकी प्रमुख वजह है।
डा. हजारिका के मुताबिक कई बार ग्लेशियर पिघलने के बाद दो या उससे ज्यादा हिस्सों में बंट जाते हैं, लेकिन चिंता की बात यह नहीं बल्कि उनका क्षेत्रफल कम होना है।
वह बताते हैं कि ग्लेशियरों के पिघलने का सबसे तात्कालिक खतरा यह है कि खेती और रोजमर्रा की जरूरतों के लिए इनके पिघलने से मिलने वाली पानी पर निर्भर समुदायों को निकट भविष्य में पानी की किल्लत से जूझना पड़ सकता है। मोटे आंकड़ों के मुताबिक करीब 1।3 अरब लोग इस पानी पर निर्भर हैं।
जलवायु परिवर्तन का प्रतिकूल असर
पूर्वोत्तर इलाके में देश के बाकी हिस्सों के मुकाबले ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन का प्रतिकूल असर कुछ ज्यादा ही नजर आने लगा है। इलाके के तमाम राज्यों में बेमौसम की बरसात, भयावह बाढ़, भूस्खलन, असम चाय की पैदावार व गुणवत्ता में कमी और दुनिया के सबसे नम इलाके वाले मेघालय में पीने के पानी की कमी जैसे मामले इसका सबूत हैं।
पूर्वोत्तर इलाका अपनी जैव-विविधता के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। लेकिन मौसम के बदलते मिजाज की वजह से दुर्लभ किस्म की कई वनस्पतियों का अस्तित्व खत्म होने की कगार पर पहुंच गया है।
जलवायु परिवर्तन के बढ़ते असर ने इलाके में लोकप्रिय झूम खेती की परंपरा को भी खतरे में डाल दिया है। झूम यानी हर साल-दो साल जगह बदल कर ढलवां सीढ़ीदार जगह पर होने वाली खेती पूर्वोत्तर भारत में सदियों पुरानी परंपरा रही है। इलाके की भौगोलिक बसावट भी इसके लिए मुफीद रही है।
मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन का इलाके की जैव विविधता पर असर साफ नजर आने लगा है। अरुणाचल प्रदेश के अपर सियांग जिले में अब जाड़े के दिनों में भी आम फलने लगे हैं। यह एक नई बात है। मौसम के बदलते मिजाज की वजह से इलाके में कई दुर्लभ वनस्पतियों का अस्तित्व खत्म होने की कगार पर पहुंच गया है।
मौसम वैज्ञानिक डॉ. भूमिधर बर्मन कहते हैं कि पूर्वोत्तर में जलवायु परिवर्तन के असर के सटीक आकलन के लिए हमारे पास आंकड़ों की कमी है। दरअसल यह समस्या जितनी नजर आती है उससे कहीं ज्यादा गंभीर है। दुर्गम इलाकों से आंकड़े जुटाने का कोई ठोस इंतजाम नहीं है। ऐसे में ज्यादातर इलाकों के आकलन में अनुमानों का ही सहारा लिया जाता है।
ताजा अध्ययन रिपोर्ट में रिपोर्ट में कहा गया है कि इलाके में जल संसाधनों के बेहतर प्रबंधन के लिए ग्लेशियरों के पिघलने पर लगातार निगरानी के साथ ही बेहतर जलवायु अनुकूलन रणनीति पर विचार करना और उनको लागू करना जरूरी है।
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