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महात्मा गांधी 150वीं जयंतीः पीएम मोदी की इस चुनौती से कैसे निपटेगी कांग्रेस?

Ajay Khemariyaअजय खेमरिया Updated Wed, 10 Jul 2019 06:26 PM IST
सरदार वल्लभ भाई पटेल और महात्मा गांधी (फाइल फोटो)
सरदार वल्लभ भाई पटेल और महात्मा गांधी (फाइल फोटो) - फोटो : फाइल फोटो
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जिस कांग्रेस को मोहनदास गांधी ने पल्लवित औऱ पुष्पित किया, लगता है वह 134 साल में हारने के बाद थक भी गई है। एक हताश पार्टी उस गांधी की साधना में लगी है जो पिछले कई दशकों से सैंकड़ों लोगों के लिए सत्ता की पारस पथरिया है जो स्पर्श होते ही किसी भी आम आदमी को सत्ता के गलियारों में गुलामनबी, सलमान खुर्शीद, प्रतिभा पाटिल औऱ मनमोहन सिंह बना सकता है। लेकिन बदले हुए वक्त में पारस खुद केवल पत्थर सा बनकर रह गया। नई पीढ़ी के गांधी ने अपनी कृपा को कछुए की तरह समेट रखा है फिलहाल।
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कांग्रेस और गांधी के बीच दूरियां 
दशकों तक कृपापात्र रहे सत्ता से हरियाए एलीट (अभिजन) दुबलाये जा रहे हैं क्योंकि नेहरु गांधी मतलब लुटियन्स का इंद्रलोक सरीखा वैभव, और बिन गांधी मोदी की निर्मम दुनिया, लेकिन सवाल यह है कि क्या कांग्रेस में गांधी युग फिर से स्थापित होना चाहिए?

क्या वास्तव में गांधी से कोई वैचारिक सरोकार इस पार्टी के बचे हैं? बहुत गहरे में मत जाइए। गांधी का कांग्रेस से रिश्ता आजादी के बाद कभी रहा ही नहीं है। इंदिरा गांधी के आते-आते यह रिश्ता हिन्द महासागर में समाधि ले गया। आज जिस अस्तित्व के संकट का सामना 134 साल पुरानी पार्टी को करना पड़ रहा है उसकी बुनियाद भी गांधी ही हैं, लेकिन यह नेहरू गांधी नहीं महात्मा गांधी हैं। मोहनदास करमचंद गांधी।

मुद्दा यह है कि कांग्रेस की वीथिकाओं में लोग आजादी के बाद किस गांधी को अपने नजदीक महसूस करते हैं? स्वाभविक ही है नेहरु- गांधी को। दोनों में बड़ा बुनियादी फ़र्क है। एक सत्ता के जरिये सुशासन औऱ लोककल्याण की बात करता है दूसरा धर्मसत्ता की,भारतीय सनातन मूल्यों की वकालत करता है।एक आत्मा की बात करता है दूसरा शरीर की।

जाहिर ही है आत्मा की अनुभूति दुरुह ही होगी इसलिए पोरबंदर के गांधी का बोरिया बिस्तर तो 24 अकबर रोड से बंधना ही था। लेकिन हमें यह भी पता है शरीर की सीमा है। आज 134 साल बाद यह दम तोड़ रहा है। वैचारिकी के बिना कोई संस्थान आखिरी कब तक टिक पाता है। विचार भी खोखले औऱ सिर्फ हवाई आदर्श होंगे तो वही हाल होता है जो वाम विचार का पूरी दुनिया मे हुआ। कभी भी कहीं भी लाल क्रांति स्थाई नहीं हुई।

कहीं भी सत्ता सिर्फ बंदूक की नाल से निकली। कहीं निकली भी तो स्थाई नही हो सकी, क्योंकि कम्युनिज्म जमीन पर टिकाऊ नहीं है न ही मानवीय इतिहास से उसका कोई सरोकार।लेकिन यह हकीकत है कि गांधी यानी मोहनदास करमचंद गांधी की वैचारिकी न तो खोखली थी न हवाई आदर्श का मुजायरा, क्योंकि गांधी तो भारत के विचारों को ही आगे बढ़ा रहे थे जो इसी धरती से निकले हैं हजारों साल पहले।
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