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दूसरा पहलू: मोहब्बत की मिसाल बना...आलीशान पुल... आगरा-मुंबई हाईवे पर मुगल काल में बनी ये बेमिसाल कृति

Thu, 21 Aug 2025 08:14 AM IST
ज्योति भास्कर भूपेंद्र कुमार, अमर उजाला।
भूपेंद्र कुमार, अमर उजाला। Published by: ज्योति भास्कर Updated Thu, 21 Aug 2025 08:14 AM IST
सार

जहांगीर ने नूरजहां के नाम पर मध्य प्रदेश के नूराबाद में जो पुल बनवाया था, सैकड़ों साल बाद भी बरकरार है उसकी खूबसूरती। आगरा-मुंबई हाईवे पर सांक नदी पर मुगल काल में बने पुल के बुर्ज और मीनारें बरबस ही ध्यान अपनी ओर खींच लेती हैं।  ब्रिटिश इतिहासकार कर्नल जेम्स टाड ने 1829 ईस्वी में प्रकाशित अपनी पुस्तक एनल्स एंड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान तथा द सेंट्रल एंड वेस्टर्न राजपूत स्टेट्स आॅफ इंडिया में लिखा है, नूराबाद में शानदार स्मारक है। 

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magnificent bridge became example of love unique masterpiece built during Mughal period on Agra-Mumbai highway
मध्य प्रदेश के नूराबाद में मोहब्बत की मिसाल बना ये पुल (फाइल) - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

क्या किसी पुल की भी कोई कहानी हो सकती है। आगरा-मुंबई हाईवे पर चंबल नदी को पार कर मुरैना के आगे अगर आप बाईं तरफ देखेंगे, तो पाएंगे एक बेहद खूबसूरत पुल, जो अब इस्तेमाल नहीं होता। पुल पर बने बुर्ज व मीनारें बरबस ही ध्यान अपनी ओर खींच लेंगी। मन करेगा गाड़ी से उतरकर यहां कुछ वक्त बिताएं। तब शायद सरगोशियों में खामोशी से बैठकर आप पुल की अनोखी दास्तान सुन सकते हैं।
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ग्वालियर से 24 किलोमीटर पहले सांक नदी पर मुगल काल में बने इस पुल की दास्तां जहांगीर और नूरजहां की मोहब्बत से जुड़ी है। पहले इस जगह का नाम सिरोहा था, पर मुगल बादशाह ने अपनी बेगम के नाम पर इसे नूराबाद कर दिया। लगभग चार सौ साल पहले बना यह पुल वास्तुकला की नायाब मिसाल है। इसमें सात मेहराबें हैं। ये मेहराबें छह मीटर ऊंची और पांच मीटर चौड़ी हैं।
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सातवीं सदी से ही मेहराबों का इस्तेमाल इमारत या पुल के वजन को बराबर बांटने के लिए किया जाता रहा है। साथ ही इस्लामिक वास्तुकला में इसे धर्म से जोड़कर भी देखा जाता है। पुल के दोनों तरफ चौड़ी चहारदीवारी है, दो अष्टकोणीय गुंबदनुमा छतरियां हैं, जो इसे विशिष्ट बनाती हैं। जहांगीर के शासनकाल में यहां सराय का निर्माण भी किया गया था। इस सराय में बुर्ज और दो विशालकाय दरवाजे हैं। हालांकि, अब इसकी हालत काफी खराब है।
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सराय के दरवाजे पर फारसी में लिखा है कि इसकी मरम्मत 1661 में औरंगजेब के शासनकाल में की गई थी। ब्रिटिश इतिहासकार कर्नल जेम्स टाड ने 1829 ईस्वी में प्रकाशित अपनी पुस्तक एनल्स एंड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान तथा द सेंट्रल एंड वेस्टर्न राजपूत स्टेट्स आॅफ इंडिया में लिखा है, नूराबाद में तेली का पुल या आॅयलमैन ब्रिज शानदार स्मारक है।

नूराबाद पुल को तेली का पुल कहने की वजह शायद यहां से होने वाला व्यापार था। टाड लिखते हैं, भले ही यह पुल मुगलों ने बनवाया पर कारोबार के लिए तेल व्यापारियों के काफिले जब इससे गुजरने लगे तो इसे तेली का पुल नाम दिया गया। 


पुल किसने बनवाया, यह स्पष्ट नहीं है। कहीं यह भी है कि जहांगीर की आत्मकथा इकबालनामा-ए-जहांगीरी लिखने वाले मुतामद खान ने इसे बनवाया। कुछ इतिहासकार इसे 1605 ईस्वी में जहांगीर द्वारा बनवाया बताते हैं, तो अन्य इसे औरंगजेब के शासनकाल में 17वीं शताब्दी में बनवाया मानते हैं। फिलहाल वास्तुकला के इस नायाब नमूने की हालत खराब है, सरकार ने इसके बगल में एक और पुल कुछ साल पहले बना दिया था, अब इस पर यातायात बंद है। मेहराबें और मीनारें जीर्ण-शीर्ण हो चुकी हैं।
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