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जीवन धारा: मशीन रोशनी दे सकती है, आंख नहीं; कल्पना के अदृश्य धागे से सींचें अनदेखी संभावनाएं

Sat, 17 Oct 2026 09:41 AM IST
ज्योति भास्कर एडा लवलेस
एडा लवलेस Published by: ज्योति भास्कर Updated Sat, 17 Oct 2026 09:41 AM IST
सार

मशीनें सत्य की खोज में एक प्रकाशस्तंभ बन सकती हैं, पर उस रोशनी को देखने वाली आंख हमेशा इन्सानी ही रहेगी। प्रतीकों को समझकर मशीनें धुन रच सकती हैं, लेकिन मूल विचार पैदा नहीं कर सकतीं।

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Machine can provide light but it cannot see nurture unseen possibilities using invisible imagination threads
मशीन इन्सान को प्रकृति की समस्याओं से अलग नहीं करती, बल्कि उसे उनकी गहराई में ले जाती है। -एंटोइन डी सेंट एक्सुपरी - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

लोग मुझे अक्सर लॉर्ड बायरन की बेटी कहते हैं, मानो मेरी शिराओं में केवल अतृप्त कविता का ज्वार बहता हो। मेरी मां, लेडी बायरन, शायद इसी डर से मुझे कविताओं से दूर गणित के कठोर अनुशासन में धकेलती रहीं। मगर वह यह भूल गईं कि संख्याओं की अपनी एक लय होती है, अपनी एक रहस्यमयी कविता। मैंने कविता को छोड़ा नहीं, बल्कि उसे विज्ञान की सबसे अमूर्त प्रयोगशाला में ले जाकर रोप दिया। इसी संगम को मैं ‘पोएटिकल साइंस’ (काव्यात्मक विज्ञान) कहती हूं।

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जब चार्ल्स बैबेज ने मुझे अपना ‘एनालिटिकल इंजन’ दिखाया, तो कई लोगों ने उसे सिर्फ ऐसी मशीन के रूप में देखा, जो केवल उबाऊ जोड़-घटाव कर सकती थी। मगर उस धातु के कंकाल में मुझे चेतना की धड़कन सुनाई दी। मेरी नजर में वह सिर्फ हिसाब-किताब का औजार नहीं था। मैंने जोसेफ जैकार्ड के उस करघे को भी देखा है, जो रेशम पर पेचीदा फूलों के नक्शे बुनता था। उस दिन मेरे भीतर एक बिजली सी कौंधी-‘यह इंजन (कंप्यूटर) ठीक उसी तरह बीजगणितीय पैटर्नों को बुनता है, जैसे जैकार्ड का करघा पत्तियों और फूलों को बुनता है।’ यहीं से मेरा और दुनिया का नजरिया अलग हो गया। बैबेज केवल संख्याओं को गिन रहे थे, जबकि मैं प्रतीकों की असीम दुनिया को देख रही थी।
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अगर कोई चीज नियमों और संबंधों में बंधी है, चाहे वह संगीत के सुर हों, भाषा के शब्द हों या कैनवास के रंग, तो मशीन उन प्रतीकों को समझकर खुद एक धुन रच सकती है। मगर यह भी सच है कि मशीनें कभी ‘मूल विचार’ पैदा नहीं कर सकतीं। वे वही कर सकती हैं, जिसे करने का हम उन्हें हुक्म देते हैं। वे सत्य की खोज में एक प्रकाशस्तंभ बन सकती हैं, पर उस रोशनी को देखने वाली आंख हमेशा इन्सानी ही रहेगी। विज्ञान और कल्पना कोई विरोधी ताकतें नहीं हैं; कल्पना ही वह अदृश्य धागा है, जो अनदेखी संभावनाओं को सींचता है।

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