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बड़ा संकट: मौसम की मार से खेती को बचाने की चुनौती
सार
भारत मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार 15 अक्तूबर 2026 तक दक्षिण-पश्चिम मानसून की वापसी पूरे देश से हो चुकी है। इस वर्ष मानसूनी बारिश दीर्घकालिक औसत से लगभग 13 प्रतिशत कम रही। दूसरी ओर, दक्षिण भारत में उत्तर-पूर्वी मानसून का दौर शुरू हो गया है, जो तमिलनाडु और आसपास के क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण है।
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कृषि क्षेत्र में मौसम की अनिश्चितता के कारण किसानों की परेशानियां
- फोटो : Amarujala.com/AI
विस्तार
भारत में खेती का भविष्य अब केवल मानसून की मेहरबानी पर निर्भर नहीं रह सकता। कभी बारिश की कमी खेतों को सुखा देती है तो कभी कुछ घंटों की मूसलाधार बारिश खड़ी फसल बर्बाद कर देती है। बाढ़, सूखा, बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि की बढ़ती चुनौतियों ने किसानों के सामने एक बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया है, जब मौसम का मिजाज अनिश्चित है तो खेती को सुरक्षित कैसे बनाया जाए?
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समस्या केवल पानी की कमी या अधिकता नहीं, बल्कि फसल की जरूरत के समय पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करने की है।
भारत मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार 15 अक्टूबर 2026 तक दक्षिण-पश्चिम मानसून की वापसी पूरे देश से हो चुकी है। इस वर्ष मानसूनी बारिश दीर्घकालिक औसत से लगभग 13 प्रतिशत कम रही। दूसरी ओर, दक्षिण भारत में उत्तर-पूर्वी मानसून का दौर शुरू हो गया है, जो तमिलनाडु और आसपास के क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण है।
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हालांकि, राष्ट्रीय औसत से कम बारिश का अर्थ यह नहीं कि पूरा देश सूखे की चपेट में है। स्थिति का वास्तविक आकलन स्थानीय वर्षा, मिट्टी की नमी, जलाशयों और सिंचाई की उपलब्धता के आधार पर ही किया जा सकता है। फिर भी मानसून की कमी ने रबी की फसलों की तैयारी को लेकर सतर्कता बढ़ा दी है।
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सिर्फ कम बारिश ही नहीं है चुनौती...
खेती के लिए बारिश की कुल मात्रा से अधिक उसका समय और वितरण मायने रखता है। बुआई के समय नमी न मिले, फसल की बढ़वार के दौरान लंबा शुष्क अंतराल पड़ जाए या कटाई के समय तेज बारिश हो जाए तो उत्पादन प्रभावित होना तय है। सामान्य से अधिक बारिश वाले साल में भी किसी इलाके में सूखे जैसी स्थिति बन सकती है, जबकि कम बारिश के बावजूद अचानक आई मूसलाधार वर्षा बाढ़ का कारण बन सकती है। इसलिए कृषि नियोजन में केवल मानसून के आंकड़ों के बजाय स्थानीय परिस्थितियों को प्राथमिकता देनी होगी।
जलवायु परिवर्तन, बढ़ता तापमान और बदलते वर्षा पैटर्न इस चुनौती को गंभीर बना रहे हैं। हालांकि, प्राकृतिक घटनाओं से होने वाला नुकसान केवल मौसम पर निर्भर नहीं करता। भूजल का अत्यधिक दोहन, जंगलों का क्षरण, अनियोजित निर्माण और जल निकासी की कमजोर व्यवस्था भी संकट को बढ़ाते हैं। बारिश का पानी यदि तेजी से बहकर निकल जाए, तो एक ओर जलभराव का खतरा बढ़ता है।
दूसरी ओर भविष्य के लिए पानी संचित नहीं हो पाता। ऐसे में मौसम के साथ जल प्रबंधन की कमियों को दूर करना भी जरूरी है।
मानसून की विदाई के बाद अब गेहूं, सरसों, चना और दूसरी रबी फसलों की तैयारी का समय है। कम बारिश वाले क्षेत्रों में किसानों को बुआई से पहले मिट्टी की नमी और सिंचाई के साधनों का आकलन करना होगा। पानी की कमी से फसल की बढ़वार प्रभावित हो सकती है, जबकि सिंचाई पर निर्भरता बढ़ने से बिजली, डीजल और अन्य लागतों का बोझ बढ़ेगा। सीमित संसाधनों वाले किसानों के लिए यह अतिरिक्त खर्च बड़ी परेशानी बन सकता है।
अलग-अलग राज्यों की अलग-अलग समस्याएं
राजस्थान जैसे शुष्क क्षेत्रों में यह चुनौती विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, हालांकि राज्य के सभी जिलों की परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं। कहीं खेती बारिश पर निर्भर है तो कहीं भूजल सिंचाई का प्रमुख साधन है। पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के सिंचित क्षेत्रों में भी भूजल स्तर तथा पानी की उपलब्धता चिंता का विषय हैं। वहीं, दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में उत्तर-पूर्वी मानसून राहत दे सकता है। स्पष्ट है कि पूरे देश के लिए एक जैसी रणनीति के बजाय क्षेत्र विशेष की जरूरतों के अनुरूप कृषि योजना बनानी होगी।
इस अनिश्चितता की सबसे बड़ी कीमत छोटे और सीमांत किसानों को चुकानी पड़ती है। कृषि गणना 2015-16 के अनुसार देश की लगभग 86 प्रतिशत कृषि जोतें छोटी और सीमांत श्रेणी में थीं। सीमित जमीन और पूंजी के कारण इन किसानों के लिए फसल का नुकसान सहना कठिन होता है।
एक मौसम की मार से उनकी बचत खत्म हो सकती है और अगली बुआई के लिए कर्ज लेने की नौबत आ सकती है। इसलिए कृषि नीति का उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि किसान को नुकसान से उबरने में सक्षम बनाना भी होना चाहिए।
फसल बीमा और सरकारी मुआवजा इस दिशा में महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनका लाभ तभी है जब नुकसान का आकलन सही हो और भुगतान समय पर मिले। तकनीक से फसल क्षति का आकलन बेहतर बनाया जा सकता है, पर स्थानीय सत्यापन और शिकायत निवारण की व्यवस्था भी मजबूत करनी होगी। राहत का मकसद केवल तत्काल सहायता देना नहीं, बल्कि किसान को अगली फसल की तैयारी के लिए सक्षम बनाना होना चाहिए।
बाजार पर भी पड़ता है असर
खेती पर मौसम की मार का असर बाजार और आम उपभोक्ता तक भी पहुंचता है। उत्पादन घटने या आपूर्ति बाधित होने से खाद्य वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं। हालांकि, महंगाई के लिए केवल मानसून को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। परिवहन, भंडारण और बाजार की परिस्थितियां भी इसमें भूमिका निभाती हैं। फिर भी फसल की अनिश्चितता खाद्य वस्तुओं की उपलब्धता और कीमतों को स्थिर रखने की चुनौती बढ़ा सकती है। इसका बोझ विशेष रूप से उन परिवारों पर पड़ता है जिनकी आय का बड़ा हिस्सा भोजन पर खर्च होता है।
इस संकट का स्थायी समाधान पानी के बेहतर प्रबंधन से शुरू होना चाहिए। वर्षा जल संचयन, खेत तालाब, जलग्रहण क्षेत्र विकास और भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देना जरूरी है। जहां परिस्थितियां अनुकूल हों, वहां टपक और फव्वारा सिंचाई जैसी तकनीकों से पानी का अधिक कुशल उपयोग किया जा सकता है। इसके साथ ही सूखा प्रभावित क्षेत्रों में कम पानी की जरूरत वाली उपयुक्त फसलों को प्रोत्साहित करना और बाढ़ संभावित इलाकों में जल निकासी सुधारना आवश्यक है।
फसल विविधीकरण के तहत बाजरा, ज्वार, दालों और तिलहनों जैसी फसलों को बढ़ावा दिया जा सकता है, लेकिन किसानों को केवल पारंपरिक फसलों से हटने की सलाह देना पर्याप्त नहीं है। वैकल्पिक फसलों के लिए बाजार, उचित मूल्य, भंडारण और प्रसंस्करण की सुविधाएं भी उपलब्ध करानी होंगी। इन व्यवस्थाओं के बिना किसान नई फसल अपनाने का जोखिम उठाने से हिचकेगा।
मौसम संबंधी पूर्वानुमान को खेत तक पहुंचाना भी उतना ही जरूरी है। किसानों को स्थानीय भाषा में समय पर ऐसी जानकारी मिलनी चाहिए, जिससे वे बुआई, सिंचाई, छिड़काव और कटाई के बारे में सही निर्णय ले सकें। कृषि विज्ञान केंद्रों, मौसम विभाग और स्थानीय प्रशासन के बीच बेहतर तालमेल से इस जानकारी का लाभ बढ़ाया जा सकता है। जिन किसानों तक डिजिटल माध्यमों की पहुंच सीमित है, उनके लिए स्थानीय स्तर पर सलाह और चेतावनी की व्यवस्था भी जरूरी है।
खेती को सुरक्षित बनाने के लिए राहत योजनाओं से आगे बढ़कर दीर्घकालिक तैयारी करनी होगी। कृषि अनुसंधान, मौसम के अनुकूल बीज, मिट्टी की नमी का संरक्षण, सिंचाई सुविधाएं और भरोसेमंद बीमा व्यवस्था एक साझा रणनीति का हिस्सा होने चाहिए। योजनाओं का लाभ छोटे किसानों तक पहुंचाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि सबसे कम संसाधन रखने वाले किसान के लिए मौसम का जोखिम सबसे अधिक नुकसानदेह साबित होता है।
मानसून की कमी और उत्तर-पूर्वी मानसून की शुरुआत दोनों इस बात की याद दिलाते हैं कि भारत की कृषि जरूरतें क्षेत्र के अनुसार बदलती हैं। कहीं पानी बचाना प्राथमिकता है, तो कहीं अतिरिक्त पानी से फसल की रक्षा करना। मौसम को नियंत्रित करना हमारे हाथ में नहीं, लेकिन उसके प्रभाव को कम करने की तैयारी जरूर की जा सकती है।
किसान की मेहनत को केवल अनुकूल मौसम के भरोसे छोड़ना अब उचित नहीं है। जल संरक्षण, स्थानीय जरूरतों के अनुरूप फसल चयन, समय पर मौसम संबंधी जानकारी और प्रभावी बीमा व्यवस्था से खेती को अधिक सुरक्षित बनाया जा सकता है। कृषि नीति की असली कसौटी यही है कि मौसम चाहे जैसा हो, किसान अपनी फसल बचाने और अगली बुआई की तैयारी करने में कितना सक्षम है।
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