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लोकसभा चुनाव: क्षेत्रीय दलों की बी-टीम बनकर रही तो 2029 में भी मुश्किल रहेगी कांग्रेस की राह
सार
वर्ष 2014 में कांग्रेस को 44 और वर्ष 2019 में 52 सीटें मिली थीं। इस बार उसकी सीटें बढ़ी हैं, लेकिन पंजाब (7) और केरल (13) को छोड़कर कहीं भी कांग्रेस अपने बलबूते पर किसी भी राज्य में सबसे बड़ा दल नहीं बन सकी है। हिंदी पट्टी में तो कांग्रेस वर्षों से बी-पार्टनर बनी हुई है।
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सोनिया गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे, प्रियंका गांधी, राहुल गांधी।
- फोटो : एएनआई
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विस्तार
लोकसभा की तस्वीर अब बिल्कुल साफ हो चुकी है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी 240 सीटों के साथ सबसे बड़ा दल बनकर उभरी है, जबकि राहुल गांधी की अगुवाई में कांग्रेस ने 99 सीटें हासिल की हैं और वो दूसरे नंबर पर है। शेष अधिकांश सीटें क्षेत्रीय दलों के खाते में गई हैं। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) अगले पांच साल सत्ता में रहेगा, यह करीब-करीब साफ है।
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वर्ष 2029 में कांग्रेस के लिए कोई संभावना बनेगी, यह वर्तमान प्रदर्शन को देखकर थोड़ा मुश्किल दिख रहा है, क्योंकि कांग्रेस की सीटें तो बढ़ी हैं, लेकिन भाजपा से सीधे मुकाबले में वो पीछे है। आज भी कई राज्यों में कांग्रेस क्षेत्रीय दलों की बी-टीम बनी हुई है, जबकि भाजपा अब पैन इंडिया पार्टी बन चुकी है। भाजपा पंजाब और तमिलनाडु जैसे राज्यों में अपने ए-पार्टनर को छोड़कर अकेली चल रही है। ओडिशा में बीजू जनता दल को छोड़कर वो राज्य में सरकार बना रही है।
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पहले कांग्रेस की बात करते हैं। वर्ष 2014 में कांग्रेस को 44 और वर्ष 2019 में 52 सीटें मिली थीं। इस बार उसकी सीटें बढ़ी हैं, लेकिन पंजाब (7) और केरल (13) को छोड़कर कहीं भी कांग्रेस अपने बलबूते पर किसी भी राज्य में सबसे बड़ा दल नहीं बन सकी है। हिंदी पट्टी में तो कांग्रेस वर्षों से बी-पार्टनर बनी हुई है। बिहार में कांग्रेस को तीन सीटें राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और उत्तर प्रदेश में छह सीटें समाजवादी पार्टी (सपा) के कारण मिली हैं।
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महाराष्ट्र में कांग्रेस ने सबसे अधिक 13 सीटें जरूर जीती हैं, लेकिन यहां भी शरद पवार और उद्धव ठाकरे के साथ गठबंधन था। जिन राज्यों में कांग्रेस अकेले दम पर लड़ी, वहां वो या तो भाजपा से पीछे रह गई या बराबर रही। भाजपा से सीधी टक्कर वाले राजस्थान में कांग्रेस को 8 (भाजपा को 14), कर्नाटक में 9 (भाजपा को 17), असम में 3 (भाजपा को 9), हरियाणा में 5 (भाजपा को 5), तेलंगाना में 8 (भाजपा को 8) सीटें मिलीं।
कांग्रेस का जम्मू-कश्मीर, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में खाता नहीं खुला है। गुजरात, ओडिशा, छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को 1-1 सीट ही मिली, जबकि झारखंड में 2 सीटें मिलीं। कांग्रेस को देशभर में इस चुनाव में 13.7 करोड़ (21.19 प्रतिशत) वोट मिले हैं, जो भाजपा से काफी कम हैं। भाजपा को देश में 23.6 करोड़ (36.56 प्रतिशत) वोट मिले हैं।
लोकसभा चुनाव में भाजपा के प्रदर्शन की बात करें तो पार्टी की वर्ष 2019 में 303 सीटें थीं, जो उसका अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन रहा। इस चुनाव में पार्टी ने इन 303 में से 208 सीटें पुनः जीती हैं, यानी उसने 68 प्रतिशत अपनी सीटें वापस पा ली हैं। देश में 33 सीटें ऐसी रहीं, जहां भाजपा के प्रत्याशियों को विजय उम्मीदवारों से मात्र 6 लाख वोट काम मिले, जैसे चंडीगढ़ में पार्टी मात्र 2504 वोटों से हारी।
वर्ष 2019 के मुकाबले पार्टी ने 32 नई सीटें जीतीं और वो पैन इंडिया पार्टी बन गई। ओडिशा में 12, तेलंगाना में 4, महाराष्ट्र में 3, आंध्र प्रदेश में 3, पश्चिम बंगाल में 2, बिहार में 1, दादर नगर हवेली में 1, छत्तीसगढ़ में 1, अंडमान और निकोबार में 1, उत्तर प्रदेश में 1, मध्य प्रदेश में 1, कर्नाटक में 1 और केरल में एक सीट भाजपा ने नई जीती है।
उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और राजस्थान में भाजपा का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा। यदि इन राज्यों में पार्टी अपना पिछला प्रदर्शन ही दोहरा देती तो 300 सीटों से अधिक पर होतीं। मध्य प्रदेश में भले पार्टी को सभी 29 सीटें मिली हैं, लेकिन वोट प्रतिशत कम हुआ है। गुजरात में पार्टी ने 26 में से 25 सीटें जीती हैं, लेकिन वोट प्रतिशत गिरा है। राजस्थान में पार्टी इस बार 25 में से 14 सीटें ही जीत सकी और उसके वोट प्रतिशत में गिरावट आई है।
पश्चिम बंगाल में पार्टी 42 में से 12 सीटें ही जीत सकी। महाराष्ट्र में पार्टी ने पिछले चुनाव में 23 सीटें जीती थीं, लेकिन इस बार वो मात्र 9 सीटों पर सिमट गई। यदि ओडिशा में पार्टी ने 21 में से 20, छत्तीसगढ़ में 11 में 10, दिल्ली में सभी 7, उत्तराखंड में सभी 5, हिमाचल प्रदेश में सभी 4 सीटें नहीं जीती होतीं तो 200 सीटें हासिल करना भी कठिन हो जाता।
भाजपा का इस चुनाव में कांग्रेस से 92 सीटों पर सीधा मुकाबला था, जिसमें से भाजपा 50 सीटें जीतने में कामयाब रही। ऐसी धारणा बन चुकी है कि दक्षिण भारत के राज्यों में भाजपा को सीटें और वोट नहीं मिलते, लेकिन इस बार दक्षिण में भाजपा को कांग्रेस से अधिक वोट मिले हैं। भाजपा ने दक्षिण के राज्यों में 3,94,65,778 वोट हासिल किए, जबकि कांग्रेस को 3,91,65,682 वोट मिले। दक्षिण में 131 सीटें हैं।
यहां कांग्रेस 94 सीटों और भाजपा 88 सीटों पर चुनाव लड़ी है। तमिलनाडु जैसे राज्य में भाजपा ने भले एक भी सीट नहीं जीती, लेकिन पार्टी को 18 प्रतिशत वोट मिले हैं, जो पिछले चुनाव से 11 प्रतिशत अधिक है। भाजपा पंजाब में भी अकेले लड़ी। हालांकि, उसे एक भी सीट नहीं मिली, लेकिन पार्टी 23 विधानसभा सीटों पर आगे रही है। पंजाब में कांग्रेस को 38 विधानसभा सीटों, आम आदमी पार्टी को 32 विधानसभा सीटों और शिरोमणि अकाली दल को 9 विधानसभा सीटों पर बढ़त मिली।
पांच साल बाद यदि कांग्रेस को सत्ता में वापसी करनी है तो उसे अकेले दम पर उत्तर भारत के राज्यों को जीतना होगा। उत्तर प्रदेश, बिहार, तमिलनाडु जैसे राज्यों में बी-टीम बनाकर काम नहीं चलेगा। वो बड़े राज्यों और सीधे मुकाबले वाले राज्यों में भाजपा को परास्त कर ही सत्ता में वापसी कर सकती है। वहीं, भाजपा को इस चुनाव से बड़े सबक मिले हैं। यदि वो गलतियों में सुधार करती है तो पांच साल बाद फिर सत्ता में वापसी कर सकती है। देश की दोनों बड़ी पार्टियों के लिए अगले पांच साल बेहद महत्वपूर्ण रहने वाले हैं।
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