लोकसभा चुनाव प.बंगाल: सोशल मीडिया के दौर में चुनावी प्रचार से रंगी हैं दीवारें
साल 1952 में हुए पहले चुनाव से ही दीवार लेखन बंगाल में चुनाव अभियान का अभिन्न हिस्सा है। सोशल मीडिया के मौजूदा दौर में भी इसकी प्रासंगिकता कम नहीं हुई है।
चुनावों के समय अपने-अपने उम्मीदवारों के समर्थन में प्रचार और विपक्ष के खिलाप चुटीले नारों से सजी दीवारें बरबस ही ध्यान खींचती हैं। एक अनुमान के मुताबिक, यह कारोबार करीब सौ करोड़ का है।
साल 1952 में हुए पहले चुनाव से ही दीवार लेखन बंगाल में चुनाव अभियान का अभिन्न हिस्सा है। सोशल मीडिया के मौजूदा दौर में भी इसकी प्रासंगिकता कम नहीं हुई है।
चुनावों के समय अपने-अपने उम्मीदवारों के समर्थन में प्रचार और विपक्ष के खिलाप चुटीले नारों से सजी दीवारें बरबस ही ध्यान खींचती हैं। एक अनुमान के मुताबिक, यह कारोबार करीब सौ करोड़ का है।
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पश्चिम बंगाल शायद देश का अकेला ऐसा राज्य है जहां सोशल मीडिया के मौजूदा दौर में भी दीवार लेखन की परंपरा प्रासंगिक और समृद्ध बनी हुई है। राज्य की दीवारें जब नेताओं के कार्टूनों और चुभती क्षणिकाओं से रंगी नजर आने लगें तो समझना चाहिए कि यहां चुनावों का मौसम आ गया है। इस राज्य के हजारों लोग दीवार लेखन की इस कला से जुड़े हुए हैं।
चुनावों के समय अपने-अपने उम्मीदवारों के समर्थन में प्रचार और विपक्ष के खिलाप चुटीले नारों से सजी दीवारें बरबस ही ध्यान खींचती हैं। एक अनुमान के मुताबिक, यह कारोबार करीब सौ करोड़ का है। इस बार भी लोकसभा चुनाव की तारीखों के ऐलान के पहले से ही राज्य में ज्यादातर दीवारें अलग-अलग पार्टियों और उनके उम्मीदवारों के प्रचार से पट गई थी।
करीब चार दशक तक कोलकाता के सबसे बड़े अखबार समूह में काम करने वाले वरिष्ठ पत्रकार तापस मुखर्जी कहते हैं कि साल 1952 में हुए पहले चुनाव से ही दीवार लेखन बंगाल में चुनाव अभियान का अभिन्न हिस्सा है। सोशल मीडिया के मौजूदा दौर में भी इसकी प्रासंगिकता कम नहीं हुई है।
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दिलचस्प बात यह है कि जब चुनाव नहीं होते तब बी कई जगह तमाम दलों में दीवारों पर कब्जे की होड़ मची रहती है। उन पर सफेद रंग पोत कर काली या नीली स्याही से लिख दिया जाता है कि यह दीवार अमुक पार्टी के अगले पांच सालो तक के लिए रिजर्व है।
दीवारों पर ऐसे-ऐसे चुभते नारे लिखे जाते हैं जो आम लोगों की जुबान पर चढ़ जाते हैं इस दौरान बनाए गए कई कार्टून भी काफी चोट करते हैं।
राजनीतिक दलों का कहना है कि दीवार लेखन से जहां पर्यावरण का संदेश जाता है वहीं इस पर लिखे नारों और कार्टूनों का आम लोगों में बहुत गहरा असर होता है। कई नारे और कार्टून तो “देखन में छोटे लगें, घाव करें गंभीर” को चरितार्थ करते नजर आते हैं। नक्सल आंदोलन के दिनों में “आमार बाड़ी, तोमार बाड़ी नक्सलबाड़ी-नक्सलबाड़ी यानी हमारा घर, तुम्हारा घर-नक्सलबाड़ी” हिट रहा था।
वर्ष 2006 के विधानसभा चुनावों के दौरान चुनाव आयोग ने दीवार लेखन पर पाबंदी लगा दी थी। आयोग ने तब वेस्ट बंगाल प्रिवेंशन आफ प्रापर्टी डिफेसमेंट एक्ट, 1976 के तहत यह पाबंदी लगाई थी।
दिलचस्प बात यह है कि तब तमाम राजनीतिक इस फैसले के खिलाफ एकजुट हो गए थे। इससे यहां दीवार लेखन की अहमियत का पता चलता है। बाद में इस कानून को कुछ शिथिल बनाया गया। इसमें कहा गया कि दीवार पर लिखने के लिए उसके मालिक की सहमति जरूरी है।
महानगर के एक कार्टूनिस्ट मनोरंजन मंडल कहते हैं-
ऐसे कलाकारों की कमी नहीं है जो हमारे बनाए कार्टूनों को जस का तस दीवारों पर उतार देते हैं। कलाकारों के मोहल्ले चितपुर में बीरेन दास बताते हैं कि उनके जिम्मे काफी काम है। वो दो महीने से अपने लोगों के साथ उत्तर कोलकाता की दीवारों पर विभिन्न पार्टियों के समर्थन में नारे लिखने और कार्टून बनाने में व्यस्त हैं।
तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सौगत राय कहते हैं-
“आम लोगों तक पहुंचने के लिए दीवार लेखन का कोई सानी नहीं है। प्रचार के इस पारंपरिक तरीके का वोटरों के दिमाग पर गहरा असर होता है।”
सीपीएम नेता सुजन चक्रवर्ती भी यह बात मानते हैं। वे कहते हैं, “सोशल मीडिया के इस दौर में भी दीवार लेखन, दोहों और कार्टूनों का तत्काल असर होता है।” सीपीएम के वरिष्ठ नेता स,जन चक्रवर्ती कहते हैं कि सोशल मीडिया के मौजूदा दौर में भी यहां दीवार लेखन के जरिए प्रचार की अहमियत बनी हुई है। रोजाना आते-जाते इन दीवारों को देखने के कारण आम लोगों के मन पर इनकी गहरी छाप पड़ती है। यह दशकों से प्रचार का एक कामयाबी फार्मूला रहा है।”
बीजेपी नेता दिलीप घोष का कहना है कि बंगाल में नारों के जरिए प्रचार का इतिहास बहुत पुराना और समृद्ध रहा है। इसका आम लोगों पर असर तो होता ही है, पर्यावरण को नुकसान भी नहीं पहुंचता।” जाने-माने बांग्ला साहित्यकार शीर्षेंदु मुखर्जी राज्य में हुए अब तक तमाम चुनावों के साक्षी रहे हैं।
वह कहते हैं कि बंगाल में दीवार लेखन महज प्रचार का हथियार ही नहीं बल्कि एक कला भी है। देश में कहीं भी ऐसी कला देखने को नहीं मिलेगी। सोशल मीडिया, पोस्टरों और बैनरों के इस दौर में भी इसकी अपनी खास जगह और पहचान कायम है। राजनीतिक विश्लेषक विश्वनाथ चक्रवर्ती भी मानते हैं कि इंटरनेट और सोशल मीडिया के मौजूदा दौर में भी दीवार लेखन की प्रासंगिकता बनी हुई है।