प्रचार में विवादित बयान देकर मुकरने का फैशन, नेताओं पर सख्ती में कंजूस क्यों चुनाव आयोग?
राज्य की विधानसभाओं और लोकसभा चुनाव के दौरान चुनाव आयोग द्वारा राजनीतिक दलों से जिस आचार संहिता की ईमानदारी से पालन करने की अपेक्षा की जाती है उसका पालन कम ही हो पाता है। आचार संहिता की उपेक्षा और अनादर करने वाले नेता हर राजनीतिक दल की कमजोरी होते हैं। खेद की बात यह है कि राजनीतिक दल खुद से अपने नेताओं को ऐसी हिदायत कम ही देते है कि वे चुनावी रैलियों अथवा सोशल मीडिया के जरिए ऐसे बयान देने से परहेज करें, जिनसे धर्म अथवा जाति के नाम पर चुनावों की निष्पक्षता के प्रभावित होने की आशंका हो।
आयोग पर क्यों नाराज हुआ सुप्रीम कोर्ट?
वर्तमान लोकसभा चुनाव में भी यह सिलसिला बेखौफ जारी है और अफ़सोस की बात यह है कि केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी, उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, बसपा प्रमुख मायावती और आजम खान के आपत्तिजनक बयानों पर चुनाव आयोग सख्त तो हुआ लेकिन नेताओं की बयानबाजी का सिलसिला थमा नहीं है।
शायद नेताओं ने यह मान लिया है कि चुनाव आयोग उन्हें केवल चेतावनी दे सकता है और ज्यादा से ज्यादा कुछ दिनों के लिए उन्हें चुनाव प्रचार करने से रोक सकता है। इससे अधिक आयोग कुछ नहीं कर सकता है, इसलिए चुनाव आयोग को अपनी उन शक्तियों का प्रयोग करने से नहीं हिचकना चाहिए, जिनकी अपेक्षा सर्वोच्च न्यायालय ने एक याचिका पर सुनवाई के दौरान आयोग से की है।
चुनाव आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय को अगर अपनी उन शक्तियों का निर्भीकतापूर्ण प्रयोग करने का भरोसा दिलाया है तो उसकी सराहना की जानी चाहिए। अब आयोग को यह साबित करना है कि वह अब अपनी शक्तियों का प्रयोग करने में कोई कोताही नहीं बरतेगा।
गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई और न्यायाधीश जस्टिस संजीव खन्ना की खंडपीठ ने सयुंक्त अरब अमीरात के शारजाह स्थित प्रवासी भारतीय योग शिक्षक हरप्रीत मनसुखानी द्वारा द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग द्वारा अपनी सीमित शक्तियों का हवाला दिए जाने पर नाराजगी जताई थी। इस नाराजगी के अगले ही दिन एससी ने आयोग के एक अधिकारी को आयोग की शक्तियों पर विचार करने के लिए अदालत में उपस्थित रहने का आदेश दिया था।
सुप्रीम कोर्ट की फटकार और आयोग का एक्शन
सर्वोच्च न्यायालय के सख्त रुख को देखकर चुनाव आयोग एकदम हरकत में आ गया। कुछ ही घंटों के अंदर उसने केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी, उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, बसपा प्रमुख मायावती एवं सपा नेता आजम खान को अपनी ताकत का अहसास करा दिया। आयोग ने इन नेताओं के प्रचार पर कुछ समय के लिए प्रतिबन्ध लगा दिया।
आयोग के वकील सीए सुंदरम द्वारा जब इन नेताओं पर की गई कार्यवाही की सूची से एससी को अवगत कराया तब उस पर संतुष्टि जताते हुए एससी ने कहा- लगता है अब आपको अपनी शक्तियों का अहसास हो गया। एससी की इस टिप्पणी पर आयोग के वकील ने कहा था कि हमने देखा कि हमारे पास कई शक्तियां है।
दरअसल, चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा नाराजगी दिखाए जाने के बाद उक्त नेताओं पर कार्यवाही की, जिसे उसे पहले ही कर देना चाहिए था, लेकिन उसने केवल नोटिस देकर ही अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली थी। यदि कोर्ट ने उसे अपनी शक्तियों का अहसास नहीं कराया होता तो वह शायद ही उक्त नेताओं पर कार्यवाही करने की जरुरत महसूस करता।
खेद की बात तो यह है कि चुनाव आयोग की उक्त कार्यवाही के बाद भी यह सिलसिला थमता दिखाई नहीं दे रहा है। राजनेताओं के मुख धर्म व जाति के नाम पर भड़काऊ भाषण देने से परहेज नहीं कर रहे हैं। नेतागण लगातार ऐसा काम कर रहे हैं, जिससे आचार संहिता का उल्लंघन हो रहा है।
जब बंगाल में पहुंचे बांग्लादेशी फिल्म अभिनेता?
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपनी पार्टी के प्रत्याशियों को जिताने की अपील करने के लिए बांग्लादेश के फ़िल्म अभिनेताओं को बुला लिया। इन अभिनेताओं को पार्टी चुनाव प्रचार का हिस्सा बनाना किस वर्ग को रिझाने के लिए किया गया है, यह कहना कठिन नहीं है।
कहने का मतलब है कि चुनाव आयोग की कठोर कार्यवाही से कोई भी नेता सबक लेने को तैयार नहीं है। जिस दिन आयोग ने चार नेताओं पर कार्यवाही की उसके अगले ही दिन कांग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू ने बिहार के कटिहार में मुसलमानों से अपील की कि आपकी ऐसी सीट है जहां पर आप बहुसंख्यक हैं, इसलिए अगर आप एकजुटता दिखाएं तो कांग्रेस उम्मीदवार तारिक अनवर को कोई नहीं हरा सकता। चुनाव आयोग ने इस बयान पर कटिहार के अधिकारी से रिपोर्ट मांगी थी, लेकिन उस पर पर कार्यवाही नहीं हुई।
माफी भी नहीं मांगते नेता और ना जाहिर करते हैं अफसोस
आश्चर्य की बात यह है कि आचार संहिता का खुल्ल्म खुल्ला उलंघन करने वाले ये राजनेता अपने आपत्तिजनक बयांनो पर खेद जताने या माफ़ी मांगने की आवश्यकता भी महसूस नहीं करते है। ये नेता जिस दल से जुड़े होते हैं वे भी इसे उनका निजी बयान बताकर इससे पल्ला झाड़ लेते हैं। बयानों पर ज्यादा विवाद होने पर नेतागण बचाव का एक और मार्ग ढूंढ लेते हैं कि इनके बयान को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया है।
एक तरह से भारतीय राजनीति में यह फैशन बन गया है कि पहले विवादित बयान दे दो फिर उससे मुकर जाओ। इस प्रवृत्ति पर निकट भविष्य में रोक लगने की संभावना नहीं दिखती है। अतः अब होना तो यह चाहिए की सारे राजनीतिक दल मिलकर यह तय करें कि वह आचार संहिता के दौरान उन सभी नियमों का पालन करेंगे जो चुनाव आयोग ने तय किए हैं। अब सवाल यह उठता है कि क्या राजनीतिक दल सचमुच पर गंभीरता से विचार करेंगे।
चुनाव आयोग सक्षम है लेकिन?
जहां तक चुनाव आयोग की शक्तियों सवाल है तो यह बात निश्चित रूप से कही जा सकती है कि उसे वर्तमान में प्राप्त शक्तियां ही इस तरह के आपत्तिजनक बयानों पर प्रभावी रोक लगाने के लिए पर्याप्त हैं। आचार संहिता का प्रभावी ढंग से पालन कराने के लिए आयोग को केवल इच्छाशक्ति दिखाने की आवश्यकता है, तब ही उसके उस रुतबे के लौटने की उम्मीद की जा सकती है,जो पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन एवं जेएम लिंगदोह के कार्यकाल में दिखाई देता था।
इसके साथ ही देश के मतदाता भी यह ठान लें कि धर्म और जाति के नाम पर वोट मांगने वाले दलों एवं प्रत्याशियों को वह अपना बहुमूल्य वोट नहीं देंगे तो सभी राजनीतिक दलों को सबक मिल सकता है जिससे ऐसे आपत्तिजनक बयानों पर खुद ब खुद अंकुश लग जाएगा। क्या कभी ऐसा सुनहरा वक्त भारतीय राजनीति में आएगा?
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.