प. बंगाल से ग्राउंड रिपोर्टः जानें कैसी है बीजेपी की स्थिति, कहां खड़े हैं कांग्रेस-ममता और लेफ्ट?
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इस समय यूपी से ज्यादा चुनावी गर्मी पश्चिम बंगाल में है। भाजपा का सबसे ज्यादा जोर पश्चिम बंगाल में लगा है, क्योंकि हंग पार्लियामेंट की स्थिति में पश्चिम बंगाल ही दिल्ली की सरकार तय करेगा। भाजपा हिंदी बेल्ट में हो रहे अपने नुकसान की भरपाई पश्चिम बंगाल से करना चाहती है। ममता बनर्जी 2014 का अपना प्रदर्शन दोहरा कर 2019 में दिल्ली की किंगमेकर बनना चाहती हैं। ममता ने जनवरी 2019 में कोलकाता के ब्रिगेड ग्राउंड में 23 राजनीतिक दलों की रैली कर शक्ति प्रदर्शन किया था। इधर, बंगाल में सबसे खराब हालत लेफ्ट फ्रंट और कांग्रेस की है। लेफ्ट फ्रंट जमीन खो रहा है। कांग्रेस अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रही है।
42 सीटें बनाती है बंगाल को सबसे महत्वपूर्ण
बिहार के विभाजन के बाद लोकसभा की 42 सीटों के हिसाब से पश्चिम बंगाल खासा महत्वपूर्ण है। हंग पार्लियामेंट की स्थिति में तो पश्चिम बंगाल का महत्व और बढ़ जाता है। उतर प्रदेश, महाराष्ट्र के बाद सरकार बनाने में पश्चिम बंगाल महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा।
2014 के लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस का जलवा यहां दिखा। 42 में से 34 सीटें टीएमसी ने जीतीं। भाजपा को 2 सीटें मिली थीं। कांग्रेस को राज्य से 4 और सीपीएम को 3 सीटें मिली थीं। 2014 में भाजपा को सीट बेशक 2 मिली, लेकिन वोट बैंक 2009 के 6 प्रतिशत के मुकाबले 17 प्रतिशत हो गया।
हालांकि ममता बनर्जी ने भी वोट बैंक में 2009 के 31 प्रतिशत के मुकाबले 40 प्रतिशत वोट पाकर अपनी मजबूती दिखाई। लेकिन राज्य में सीपीएम और कांग्रेस वोट बैंक के हिसाब से नीचे की तरफ चले गए। सीपीएम का वोट 2009 के 42 प्रतिशत के मुकाबले 30 प्रतिशत रह गया। वहीं कांग्रेस का 13 प्रतिशत के मुकाबले 10 प्रतिशत रह गया। भाजपा वोट प्रतिशत के हिसाब से 2014 में सफल रही। 2014 का उत्साह ही भाजपा का आत्मविश्वास बढ़ाए हुए है। हालांकि 2016 विधानसभा चुनाव में भाजपा यहां 3 सीटें ही जीत पाईं। इसके बावजूद भाजपा का उत्साह बना रहा। 2018 में उलबेरिया लोकसभा विधानसभा उपचुनाव में भाजपा ने सीपीएम, कांग्रेस को नीचे धकेल दूसरा स्थान प्राप्त किया।
सिर्फ हिंदुत्व का सहारा है भाजपा के पास?
2014 में दिल्ली की गद्दी पर काबिज होने के बाद ही भाजपा का ऑपरेशन बंगाल शुरू हो गया था, क्योंकि लेफ्ट पॉलिटिक्स के गढ़ होने के बाद भी बंगालियों के जीवन में हिंदू धार्मिक त्योहारों का बड़ा प्रभाव है। बंगाल की धार्मिक जनसांख्यिकी ने भाजपा को खासी मदद की है। बंगाल में 27 प्रतिशत मुस्लिम हैं।
इस बीच बंगाल मे कुछ आतंकी गतिविधियों के संकेत भी मिले। अक्टूबर 2014 में वर्धमान में एक बम विस्फोट हो गया। बम विस्फोट में इंडियन मुजाहदीन के दो आतंकी मारे गए। पुलिस ने यहां से भारी मात्रा में गोला-बारूद बरामद किया। भाजपा ने इसे मुद्दा बना लिया। भाजपा ने आऱोप लगाया कि ममता बनर्जी इन आतंकियों को शरण दे रही है। ब्लास्ट का जायजा लेने खुद प्रधानमंत्री के सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल वर्धमान पहुंच गए।
2015 के बाद भाजपा ने बांग्लादेशी घुसपैठियों का मामला जमकर उठाया। ममता बनर्जी पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगाया। यही नहीं हिंदू त्योहारों के दौरान निकाले जाने वाले जुलूसों पर रोक लगाने का मुद्दा भी इस दौराना जमकर उछला और संघ परिवार और बजरंग दल खुलकर बंगाल में सक्रिय रहे। अप्रैल 2017 में संघ समर्थित संगठनों ने रामनवमी के अवसर पर 175 जुलूस पूरे बंगाल में निकाले। खास बात यह रही कि बजरंग दल की ऱणनीति से घबराई टीएमसी ने रामनवमी का जुलूस निकालना शुरू कर दिया। यहां तक कि दोनों पार्टियों ने हुनमान जयंती का समारोह मनाना शुरू कर दिया।
इस बीच रामनवमी के जुलूस के दौरान कुछ जगहों पर दंगे भी हुए। हुगली में 2017 में दंगे हुए। 2018 में रायगंज और आसनसोल में धार्मिक जुलूस के दौरान दंगा हुआ। इससे पहले 2016 में भी कई दंगे बंगाल में हुए। 2018 में उलबेरिया लोकसभा उपचुनाव में भाजपा ने सीपीएम, कांग्रेस को तीसरे औऱ चौथे नंबर पर भेज दिया। भाजपा को यहां 2.93 लाख वोट मिले जो 2014 के आम चुनाव के 1.37 लाख के मुकाबले दोगुना वोट था।
8 सीटों पर है भाजपा की नजर
भाजपा के लिए पश्चिम बंगाल खासा महत्वपूर्ण है। उतर बंगाल के 8 सीटों पर भाजपा ने खासा जोर लगा दिया है। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने अप्रैल 2017 में अपनी राष्ट्रीय यात्रा की शुरूआत पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से की। भाजपा ने प्रतीकात्मक संदेश दिया कि वे पश्चिम बंगाल में लेफ्ट स्टाइल पॉलिटिक्स खत्म करेगी। सीपीएम की तरह ममता भी लेफ्ट स्टाइल पालिटिक्स करती हैं।
बंगाल की चुनावी सभा में भाजपा विकास की बात नहीं करती। बांग्लादेशी घुसपैठिए, नेशनल रजिस्टर फॉर सिटिजन, और सिटिजन अमेंडमेंट बिल का मुद्दा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह लगातार उठा रहे हैं। मार्च और अप्रैल में दोनों नेताओं ने कई चुनावी रैलियों को पश्चिम बंगाल में संबोधित किया। फरवरी में बांग्लादेश सीमा पर स्थित ठाकुरगंज में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ममता बनर्जी से सिटिजन अमेंडमेंट बिल पर समर्थन मांगा और बांग्लादेश से आए हिंदुओं को लुभाने की कोशिश की।
इधर, चुनावी सभा में पार्टी अध्यक्ष अमित शाह भी नेशनल रजिस्टर फॉर सिटिजन का मुद्दा उठा रहे हैं। 22 अप्रैल को अपने चुनावी कार्यक्रमों में अमित शाह ने बंगाल में एनआरसी लागू करने का वादा किया है। उन्होंने एनआरसी से बांग्लादेश से आए हिंदुओं को छूट देने का वादा भी किया। सिटिजनशिप अमेंडमेंट बिल 2019 का विरोध को लेकर ममता बनर्जी को कोसा, ताकि बांग्लादेश से आए हिंदू भाजपा के समर्थन में खड़े हों। ममता सरकार पर लगातार मुस्लिम इमामों को आर्थिक सहायता दिए जाने के आरोप भी भाजपा नेता लगा रहे हैं।
क्या तृणमूल का उतर रहा है जादू?
चुनाव में जीत को लेकर भाजपा बड़े-बड़े दावे कर रही है। 2019 में भाजपा बंगाल में 20 सीटों पर जीत का दावा है। लेकिन विश्लेषकों के अनुसार टीएमसी का ग्राफ जरूर गिरा है। फिर भी माना जा रहा है कि टीएमसी 30 से ज्यादा सीटें जीत सकती है। इसका मुख्य कारण राज्य की 27 प्रतिशत मुस्लिम आबादी और गरीब हिंदुओं का ममता के पीछे लामबंद होना है।
चुनाव विश्लेषक मानते हैं कि भाजपा की नीति अमीर समर्थक है जबकि ममता गरीबों को लेकर बंगाल में कई कार्यक्रम चलाती है। दूसरी ओर मुसलमानों का 90 प्रतिशत वोट टीएमसी को जा रहा है और गरीब हिंदू ममता के साथ हैं। उसका मुख्य कारण टीएमसी सरकार की वेलफेयर स्कीम है। राज्य में 2 रुपए किलो चावल गरीबों को दिए जा रहे हैं। स्कूली बच्चों को साइकिल उपलब्ध करवाया गया है।
गरीब परिवारों के बच्चों को पढ़ाई के लिए वजीफे दिए जा रहे हैं। ममता बनर्जी ने अपने कमजोर इलाके में सेंध भी लगाई। दार्जिलिंग इलाके में गोरखा जन मुक्ति मोर्चा को तोड़ दिया। भाजपा समर्थक बिमल गुरंग पर कई मुकदमे दर्ज कर दिए। गोरखा नेता बिनय तमांग को अपने साथ जोड़ लिया। यही नहीं दार्जिलिंग क्षेत्र में मौजूद कई जनजातियों के विकास के लिए अलग से बोर्ड का भी गठन किया। नॉर्थ बंगाल के मालदा में कांग्रेस के गढ़ में भी सेंध ममता ने ही लगाई है। यहां के मजबूत कांग्रेसी नेता स्वर्गीय अब्दुल गनी खान चौधरी के परिवार को ममता ने विभाजित कर दिया।
गनी खान का परिवार और ममता की पॉलिटिक्स
गनी खान के परिवार की मौसम नूर अब उतर मालदा से टीएमसी उम्मीदवार है। मौसम नूर यहीं से कांग्रेस की टिकट पर 2014 में चुनी गई थी। अब नूर के खिलाफ उनके ही परिवार के ईशा खान कांग्रेसी उम्मीदवार हैं। ये गनी खान चौधरी के भतीजे हैं। दक्षिण मालदा से ईशा खान के पिता अबू हाशिम चौधरी दक्षिण मालदा से कांग्रेस उम्मीदवार हैं। भाजपा गनी खान चौधरी के परिवार में विभाजन से खुश हैं, क्योंकि इससे मुस्लिम वोट बंट रहा है। भाजपा को उम्मीद है कि वो ये सीट निकाल लेगी।
ममता बेशक लेफ्ट विरोधी रहीं लेकिन उनका राजनीतिक स्टाइल लेफ्ट का ही रहा है। लेफ्ट स्टाइल पॉलिटिक्स के बल पर उन्होंने पश्चिम बंगाल से 2011 में लेफ्ट फ्रंट की सरकार को उखाड़ फेंका, क्योंकि ममता ने लेफ्ट स्टाइल में ही सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलन चलाया। लेकिन अब वही लेफ्ट स्टाइल पॉलिटिक्स ममता के ग्राफ को नीचे गिरा रहा है। पश्चिम बंगाल में लेफ्ट स्टाइल का एक रूप विरोधियों पर शारीरिक हमला करना, उन्हें राजनीतिक प्रक्रिया में भाग लेने से रोकना भी है।
टीएमसी की सियासत के तरीके
2018 के पंचायत पोल में टीएमसी समर्थकों ने जमकर गुंडागर्दी की। विरोधियों को नामांकन तक नहीं करने दिया। पंचायत चुनावों में 34 प्रतिशत सीटें निर्विरोध जीत लीं। पंचायत चुनावों में भारी हिंसा हुई, इससे टीएमसी का ग्राफ गिरा। ममता समर्थकों के लेफ्ट स्टाइल गुंडागर्दी से लोगों में नाराजगी फैली। इसका लाभ भाजपा ने उठाया। कांग्रेस, सीपीएम समर्थक ममता के खिलाफ मजबूती से लड़ने के लिए भाजपा की तरफ जाने लगे।
बंगाल में मुस्लिम वोट बैंक और टीएमसी, कांग्रेस और भाजपा
बंगाल में मुस्लिम वोट बैंक का महत्व इसलिए है कि यहां 27 प्रतिशत मुस्लिम हैं। कुछ जिलों में मुसलमानों की आबादी खासी है। मुशिर्दाबाद, मालदा, उतरी दिनाजपुर आदि में मुस्लिम आबादी हिंदुओं से ज्यादा है। जबकि कई इलाकों में मुसलमान 25 से 30 प्रतिशत तक हैं। बंगाल में बांग्लादेश से आए अवैध लोगों ने मुस्लिमों की संख्या बढ़ाई है। भाजपा इसी को मुद्दा बनाए हुए है। भाजपा लगातार आरोप लगा रही है कि इन इलाकों के गांवों से हिंदुओं को भगाया गया है। कई गांवों में हिंदू है ही नहीं।
भाजपा ने उतर प्रदेश के कैराना के तर्ज पर ही बंगाल में हिंदुओं के पलायन का मुद्दा उठाया है। हालांकि राज्य में मुसलमानों की संख्या खासी अच्छी है। लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति खासी खराब है। नोबेल पुस्कार विजेता अमर्त्य सेन के प्रतीची इंस्टीट्यूट एंड एसोसिएशन की रिपोर्ट के मुताबिक पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यकों की माली हालत काफी खराब है।
मुस्लिम समुदाय के सिर्फ 1 प्रतिशत परिवार के पास ही प्राइवेट सेक्टर में जॉब में है। ग्रामीण इलाकों में रह रही 47 फीसदी मुस्लिम आबादी खेती और गैर खेती के कामों में लगी है। ग्रामीण इलाके में करीब 80 फीसदी मुस्लिम परिवारों की कमाई प्रति माह 5000 रुपए के करीब है। अगर पूरे राज्य के मुसलमानों की बात करें तो 38 फीसदी मुस्लिम परिवार 2500 रुपये प्रतिमाह ही कमा पाते हैं।
जमीन खोती कांग्रेस और महत्व खोता लेफ्ट फ्रंट
2014 के लोकसभा चुनाव में लेफ्ट फ्रंट और कांग्रेस पश्चिम बंगाल में सिमट गई। कांग्रेस को 10 प्रतिशत वोट के साथ 4 सीटे मिलीं। कांग्रेस जंगीपुर, बहरामपुर, मालदा उतर और मालदा दक्षिण जीतने में सफल रही जबकि सीपीएम 2 सीटों पर सिमट गई। इस बार दोनों दल अपने अस्तित्व को बचाने के लिए लड़ रहे हैं। कांग्रेस की हालत ममता बनर्जी के पार्टी छोड़ने के समय से ही खराब हो गई थी, क्योंकि कांग्रेस के जमीनी कार्यकर्ता टीएमसी के साथ चले गए थे। लेकिन कुछ परिवारों ने कांग्रेस को बचाए रखा। मालदा इलाके में अब्दुल गनी खान चौधरी का प्रभाव दो लोकसभा सीटों पर बरकरार रहा।
कौन कहां लड़ रहा है चुनाव? कौन हैं बड़े चेहरे?
इस बार गनी खान के परिवार में विभाजन है। इस परिवार की कांग्रेसी सांसद मौसम नूर टीएमसी से लड़ रही हैं। जंगीपुर से प्रणव मुखर्जी के बेटे अभिषेक मुखर्जी चुनाव लड़ रहे हैं। लेकिन उनका भी चुनाव फंसा है। राहत की बात यह है कि उनके खिलाफ भाजपा, टीएमसी और सीपीएम तीनों ने मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं। इस तरह मुस्लिम वोटों का विभाजन ही उनकी उम्मीद है।
2014 लेफ्ट फ्रंट को दो सीटें बंगाल में मिली थीं। रायगंज से मोहम्मद सलीम और मुर्शिदाबाद से बदरूदोज्जा खान चुनाव जीते थे। लेकिन लेफ्ट फ्रंट को 30 प्रतिशत वोट मिले थे। 2019 में हालात बदल गए हैं। पिछले दो सालों में लेफ्ट फ्रंट के नीचले वर्कर भाजपा में शामिल हो गए हैं। टीएमसी वर्करों से टकराव के बाद सीपीएम वर्करों असुरक्षा की भावना में भाजपा के साथ चले गए हैं। 2019 में लेफ्ट फ्रंट कितनी मजबूती से लड़ा यह 23 मई को पता चलेगा।
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