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ढाई दशक बाद मुलायम को पिछड़े वर्ग का 'असली नेता' बताने के पीछे मायावती की क्या है मजबूरी?

Amalendu Upadhyayअमलेंदु उपाध्याय Updated Sat, 20 Apr 2019 01:10 PM IST
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जब मायावती कह रही थीं कि मुलायम ही पिछड़े वर्ग के 'जन्मजात, वास्तविक और असली नेता हैं', तो इसके निहितार्थ  अलग हैं।
जब मायावती कह रही थीं कि मुलायम ही पिछड़े वर्ग के 'जन्मजात, वास्तविक और असली नेता हैं', तो इसके निहितार्थ अलग हैं। - फोटो : Social Media
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संभवतः 1996 के मध्य की बात है। सपा-बसपा के बीच खाई बहुत चौड़ी हो चुकी थी। लखनऊ की राजभवन कालोनी में समाजवादी पार्टी के युवा संगठनों के कार्यालय में समाजवादी युवजन सभा के दफ्तर में प्रदेश के चुनिंदा युवा नेताओं के साथ मुलायम सिंह यादव ने बैठक की। उस बैठक में उन्होंने जो कहा उसका भावार्थ था कि मायावती स्वयं को दलितों का नेता कहती हैं, लेकिन क्या वे सारे दलितों की नेता हैं? ठीक उसी तरह जैसे वह (मुलायम) पिछड़ों के नेता कहे जाते हैं, क्या वास्तव में सारे पिछड़ों के नेता हैं?
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मतलब अपरोक्ष रूप से नेताजी के नाम से अपने समर्थकों के बीच पुकारे जाने वाले मुलायम सिंह ने कहा कि मायावती अपनी जाति और वे अपनी जाति के नेता हैं। लेकिन लगभग ढाई दशक बाद मैनपुरी के क्रिश्चियन कॉलेज मैदान में जब मायावती कह रही थीं कि मुलायम ही पिछड़े वर्ग के 'जन्मजात, वास्तविक और असली नेता हैं', तो इसके निहितार्थ और लोकसभा चुनाव 2019 में इस वक्तव्य के प्रभाव को समझने की आवश्यकता है।

पिछले दिनों एक शोध के विषय में इटावा जाना हुआ था और वहां जिन कई पुराने राजनीतिक कार्यकर्ताओं और नेताओं से मुलाकात हुई, उनमें एक पत्रकार और बसपा के एक पुराने मुस्लिम कार्यकर्ता से भी मुलाकात हुई, जिनका दावा था कि मैनपुरी की सभा में उन्होंने ही सबसे पहले “मिले मुलायम कांशीराम हवा में उड़ गए जय श्रीराम” नारा लगाया था, जो बाद में 1993 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में पूरे यूपी में गूंजा। 

बहरहाल, अगर उनका दावा सही है कि मैनपुरी में ही सबसे पहले ये नारा लगा था तो फिर यह यक्ष प्रश्न खड़ा होता है कि क्या एक बार फिर माया-मुलायम की आंधी में भाजपा उड़ जाएगी ? हालांकि इस ढाई दशक में देश-प्रदेश की राजनीति में काफी बदलाव आया है, लेकिन सपा-बसपा-रालोद के इस गठबंधन से भाजपा की नींद तो फिलहाल उड़ गई है। 

यहां यह याद दिलाना भी जरूरी है कि 1993 के चुनाव में बसपा को 67 सीटें हासिल हुई थीं और सपा को 109 सीटें। इस तरह मुलायम कांशीराम के मिलने से जय श्रीराम का नारा पूरी तरह हवा में उड़ा था। यहां तक की सरकार कांग्रेस व जनता दल के समर्थन से बनी थी। हालांकि उस चुनाव में दलित मत सपा-बसपा को एकमुश्त नहीं पड़ा था।   
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