ढाई दशक बाद मुलायम को पिछड़े वर्ग का 'असली नेता' बताने के पीछे मायावती की क्या है मजबूरी?
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संभवतः 1996 के मध्य की बात है। सपा-बसपा के बीच खाई बहुत चौड़ी हो चुकी थी। लखनऊ की राजभवन कालोनी में समाजवादी पार्टी के युवा संगठनों के कार्यालय में समाजवादी युवजन सभा के दफ्तर में प्रदेश के चुनिंदा युवा नेताओं के साथ मुलायम सिंह यादव ने बैठक की। उस बैठक में उन्होंने जो कहा उसका भावार्थ था कि मायावती स्वयं को दलितों का नेता कहती हैं, लेकिन क्या वे सारे दलितों की नेता हैं? ठीक उसी तरह जैसे वह (मुलायम) पिछड़ों के नेता कहे जाते हैं, क्या वास्तव में सारे पिछड़ों के नेता हैं?
मतलब अपरोक्ष रूप से नेताजी के नाम से अपने समर्थकों के बीच पुकारे जाने वाले मुलायम सिंह ने कहा कि मायावती अपनी जाति और वे अपनी जाति के नेता हैं। लेकिन लगभग ढाई दशक बाद मैनपुरी के क्रिश्चियन कॉलेज मैदान में जब मायावती कह रही थीं कि मुलायम ही पिछड़े वर्ग के 'जन्मजात, वास्तविक और असली नेता हैं', तो इसके निहितार्थ और लोकसभा चुनाव 2019 में इस वक्तव्य के प्रभाव को समझने की आवश्यकता है।
पिछले दिनों एक शोध के विषय में इटावा जाना हुआ था और वहां जिन कई पुराने राजनीतिक कार्यकर्ताओं और नेताओं से मुलाकात हुई, उनमें एक पत्रकार और बसपा के एक पुराने मुस्लिम कार्यकर्ता से भी मुलाकात हुई, जिनका दावा था कि मैनपुरी की सभा में उन्होंने ही सबसे पहले “मिले मुलायम कांशीराम हवा में उड़ गए जय श्रीराम” नारा लगाया था, जो बाद में 1993 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में पूरे यूपी में गूंजा।
बहरहाल, अगर उनका दावा सही है कि मैनपुरी में ही सबसे पहले ये नारा लगा था तो फिर यह यक्ष प्रश्न खड़ा होता है कि क्या एक बार फिर माया-मुलायम की आंधी में भाजपा उड़ जाएगी ? हालांकि इस ढाई दशक में देश-प्रदेश की राजनीति में काफी बदलाव आया है, लेकिन सपा-बसपा-रालोद के इस गठबंधन से भाजपा की नींद तो फिलहाल उड़ गई है।
यहां यह याद दिलाना भी जरूरी है कि 1993 के चुनाव में बसपा को 67 सीटें हासिल हुई थीं और सपा को 109 सीटें। इस तरह मुलायम कांशीराम के मिलने से जय श्रीराम का नारा पूरी तरह हवा में उड़ा था। यहां तक की सरकार कांग्रेस व जनता दल के समर्थन से बनी थी। हालांकि उस चुनाव में दलित मत सपा-बसपा को एकमुश्त नहीं पड़ा था।
जमीनी हकीकत और राजनीति
वैसे राजनीति में दो और दो चार नहीं हुआ करते हैं फिर भी इस गठबंधन ने प्रदेश की राजनीति में नई उठापटक तो पैदा कर ही दी है। सियासी हलकों में कहा ये जा रहा था कि सपा-बसपा का ये गठबंधन भाजपा के इशारों पर हुआ है ताकि कांग्रेस को इससे बाहर रखकर कमजोर किया जा सके। इस आरोप में दम लग सकता है, लेकिन राजनीति में बहुत कुछ जो सतह पर दिखाई देता है, सतह के नीचे चीजें ठीक उसके उलट भी होती हैं।
अब पहले बात मायावती ने मुलायम को पिछड़े वर्ग के 'जन्मजात, वास्तविक और असली नेता' क्यों बताया? अभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद की जाति बता चुके हैं, जो एक तरह से सबसे बड़ी आबादी ओबीसी को अपनी तरफ करने का एक दांव समझा जा रहा है। मोदी के इस दांव की काट में मायावती ने यह सदाशयता दिखाई है। जो लोग मुलायम सिंह के इतिहास से वाकिफ हैं वो जानते हैं कि नेताजी ओबीसी की राजनीति करके आगे नहीं आए हैं, बल्कि उनकी पहचान एक जुझारू किसान नेता की रही है।
अब ये बात दीगर है कि मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने और भाजपा द्वारा उन्हें मुल्ला मुलायम घोषित करने के बाद नेताजी को भी अपने ऊपर ओबीसी नेता का टैग पसंद आया। जबकि 1989 में जब मुलायम सिंह यादव पहली बार मुख्यमंत्री बने थे तो उनके मंत्रिमंडल में थोक भाव में ब्राह्मण मंत्री थे। ये भी तथ्य है कि मंडल के मसीहा विश्वनाथ प्रताप सिंह के खिलाफ झंडा उठाने वाले पहले ओबीसी नेता भी मुलायम सिंह यादव ही थे, जो चंद्रशेखर के साथ मिल गए थे।
क्या है चुनावी गणित? माया के निशाने पर कांग्रेस-बीजेपी?
खैर! अब यूपी में जो चुनाव बचा है उसमें ओबीसी मतदाता एक बड़ा फैक्टर है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता। इन ओबीसी मतदाताओं में सबसे बड़ी संख्या यादवों की है। तो क्या मायावती का यह संदेश केवल मोदी के उत्तर में है ? इसका उत्तर है नहीं। जी हां। मुलायम को ओबीसी का जन्मजात नेता बताने का अर्थ केवल मोदी नहीं बल्कि कांग्रेस के लिए भी है। कैसे ?
यह एक कड़वी सच्चाई है कि उत्तर प्रदेश में अति पिछड़ी जातियां समाजवादी पार्टी के विरोध में बसपा का समर्थन करती रही थीं, लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव और 2017 के विधानसभा चुनाव में ये जातियां भाजपा के खेमे में जा पहुंची थीं। योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद अब इन जातियों में भाजपा से मोहभंग शुरू हुआ है, लेकिन यादवों से उनकी अदावत खत्म हो गई हो, ऐसा नहीं कहा जा सकता। ऐसे में सपा-बसपा के गठबंधन के बाद भी इन जातियों का इस खेमे में लौटना मुश्किल है।
अब नया समीकरण जो बनता दिख रहा है वह यह है कि कांग्रेस, जिसे सपा-बसपा ने रहम खाकर दो सीटें छोड़ी थीं, उसने भाजपा से छिटक रही उन जातियों पर दांव लगा दिया है जो भाजपा और सपा-बसपा से अलग ठिकाना ढूंढ रही थीं। प्रियंका गांधी की बोट यात्रा को सिर्फ चुनावी पर्यटन समझने की भूल न की जाए। इस यात्रा के जरिए गंगा किनारे बसने वाले अति पिछड़ों से उनका जो सीधा संवाद हुआ है उसके परिणाम दिखाई दे सकते हैं।
दूसरी तरफ कांग्रेस ने कभी मायावती के सिपहेसालार रहे बाबू सिंह कुशवाहा से हाथ मिला लिया है। बाबू सिंह कुशवाहा अपने समाज के नेता हैं और वोट ट्रांसफर कराने की क्षमता रखते हैं। साथ ही कांग्रेस ने यादवों के बाद दूसरी सबसे बड़ी पिछड़ी जाति कुर्मियों पर दांव लगाया है। पूर्व दस्यु सम्राट ददुआ के भाई बाल कुमार पटेल कांग्रेस में शामिल हो गए हैं तो केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल की मां कृष्णा पटेल के अपना दल के साथ भी कांग्रेस ने गठबंधन कर लिया है।
कांग्रेस का गणित भी समझना होगा?
यहां यह याद दिलाना उचित रहेगा कि 2009 के लोकसभा चुनाव में कुर्मियों ने कांग्रेस में जान फूंकने का काम किया था। आज फिर स्थिति ऐसी है कि कुर्मी यूपी में अपना नेतृत्व देखना चाहते हैं। भाजपा में भले ही संतोष गंगवार बड़े कुर्मी नेता हों, लेकिन उनकी पहचान कभी भी एक कुर्मी नेता की नहीं रही। बेनी प्रसाद वर्मा अब चुक चुके हैं। अनुप्रिया पटेल के साथ व्यक्तिगत तौर पर तो उनकी जाति जा सकती है, लेकिन वो वोट ट्रांसफर करा पाएं, इसमें संदेह है।
इधर, सपा-बसपा के विरोधी हमेशा यह आरोप लगाते रहे हैं कि दोनों ही दल बात तो दलितों और पिछड़ों की करते हैं, लेकिन मुख्यमंत्री बनने पर दोनों दलों में अपने परिवारों का आजन्म आरक्षण है, और मैनपुरी में अखिलेश के साथ मायावती के भतीजे आकाश के साथ खड़े होने से यह संदेश और गाढ़ा हो गया है। भाजपा ने पिछले चुनाव में इसी सपा-बसपा विरोधी भावना को भुनाया था, जिस पर अब कांग्रेस पिछले दरवाजे से हल्के से हाथ रख रही है।
मुलायम को लेकर क्यों मजबूर हैं मायावती?
मायावती और अखिलेश-मुलायम, दोनों के साथ एक ही समस्या है। दोनों को मजबूत भाजपा से कोई परेशानी नहीं है, लेकिन दोनों को मजबूत कांग्रेस परेशान करती है। क्योंकि अगर 1996 में मुलायम सिंह यादव की कही गई बात आज भी सच है (जो सच है) तो ये सपा-बसपा गठबंधन अधिकतम कुल बीस फीसदी मतों पर टिका है, बाकी जो मत उसके खीसे में हैं वो भाजपा विरोध के हैं और मायावती भी इस बात को समझती हैं और अखिलेश भले न समझते हों पर मुलायम समझते हैं। इसलिए मायावती का मुलायम ही पिछड़े वर्ग के 'जन्मजात, वास्तविक और असली नेता हैं', कहने की मजबूरियां हैं क्योंकि अब उत्तर प्रदेश में जो चुनाव बचा है उसमें कुर्मी और कुशवाहा भी एक बड़ा वोट बैंक है,
साथ ही अन्य छोटी ओबीसी जातियां भी एक रोल अदा कर सकती हैं, अगर ऐसा हुआ और इन जातियों का जुड़ाव कांग्रेस के साथ हो गया तो सपा-बसपा के खाते में जो भाजपा विरोधी वोट है उसे कांग्रेस के साथ खड़े होने में तनिक देर नहीं लगेगी। ऐसी स्थिति में यूपी के परिणाम क्या होंगे जरा अंदाजा लगा लीजिए और गेस्ट हाउस कांड की याद करते हुए भी मुलायम की तारीफ करती मायावती की असल परेशानी समझिए।
(अमलेन्दु उपाध्याय, वरिष्ठ पत्रकार, राजनैतिक विश्लेषक, टीवी पैनलिस्ट व स्तंभकार हैं।)
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