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पशुओं की रोचक दुनिया: सिवेट्स के बारे में मिथक और सच्चाई

Mon, 12 Jan 2026 02:29 PM IST
Vibhav Srivastava विभव श्रीवास्तव
Updated Mon, 12 Jan 2026 02:29 PM IST
सार

  • सिवेट्स हमारे मित्र हैं और ये चूहों तथा कीड़े मकोड़ों को खा कर हमें उनसे मुक्ति दिलाते हैं, और सबसे बड़ी बात की ये पर्यावरण के एक अभिन्न अंग है।  

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life of animals civet lifespan and myths about animal around us
सिवेट जानवर और इसका लाइफस्पेन - फोटो : कल्याण वर्मा

विस्तार

सिवेट्स, बिज्जू या फिर कबर बिज्जू... और न जाने ही कितने नामों से जाना जाने वाला यह जीव असल में अपनी असली पहचान से ज्यादा अपनी गलत पहचान से जाना जाता है। चूंकि ये शहरों, गावों और जंगल में बहुतायत से पाए जाते हैं पर इनको देखने वालों की संख्या बहुत कम है। अगर किसी ने देखा भी है तो वो शायद ही इसकी सही पहचान कर पाया होगा।

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अब जब सही पहचान ही नहीं है तो साथ में बहुत सी गलत अवधारणाएं भी इसके साथ जुड़ गई हैं, जिसके पीछे प्रमुख वजह है समाज में फैले अन्धविश्वास और जागरूकता की कमी। इन अंधविश्वासों, पूर्वाग्रहों, गलत अवधारणाओं और गलत पहचान की वजह से इन मासूम जीवों को या तो मार दिया जाता है या फिर बुरी तरह घायल कर के छोड़ दिया जाता है।
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भारत में सिवेट

भारतीय उपमहाद्वीप में सीविट की कुल आठ भिन्न प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें मालाबार सिवेट गंभीर रूप से संकटग्रस्त की श्रेणी में आती है, बाकि सभी प्रजातियां या तो खतरे से बाहर हैं या फिर कम खतरे में हैं। इन प्रजातियों का वितरण भारत के लगभग सभी लैंडस्केप में है।  
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इन सभी आठों प्रजातियों में से भी सबसे ज्यादा पाए जाने वाली प्रजातियां हैं कॉमन पाम सिवेट और स्मॉल इंडियन सिवेट जिसे हिंदी में कस्तूरी बोलते हैं।

सबसे पहले बात करते हैं कॉमन पाम सिवेट की, जो की एक रात्रिचर, एकाकी और पेड़ों पर रहने वाला जीव है। ये प्रमुख रूप से जंगलों , बगीचों , फलों के बागानों और गांव में रहने वाले एक शर्मीला जीव है। खाने की तलाश में ये मनुष्य के आवास के काफी नजदीक भी आ जाते हैं। ये घरों के खपरैलों में और छतों के छुपने वाले जगहों पर रहते हैं। वैसे तो मीठे फल इनका पसंदीदा आहार होते हैं पर जैसा की इनके नाम से जाहिर है ये ताड़ यानि पाम के फल खाना बहुत पसंद करते हैं।

इसके अलावा ये चूहे तथा कीड़ों मकोड़ों को भी खाना पसंद करते हैं। इनका गहरा रंग, शर्मीला और रात्रिचर स्वभाव की वजह से अक्सर इन्हें न सिर्फ खतरनाक समझा जाता है बल्कि इनको तंत्र मंत्र आदि अंधविश्वासों से भी जोड़ कर देखा जाता है।  इनके बारे में एक आम धारणा है की ये कब्र से मुर्दा निकल कर खाते हैं, जिसकी वजह से कई लोग इन्हें कबर बिज्जू भी कहते हैं, जो की सर्वथा गलत है।

कबर बिज्जू, हनी बेजर का एक नाम है जो उसके मृत जीवों को खाने की आदत की वजह से पड़ा है। स्वभाव से ये जीव हमारे लिए बिलकुल भी हानिकारक नहीं होते हैं और अगर ये हमारे घर के आस पास दिखें तो हमें तुरंत वन विभाग को सूचित करना चाहिए वो इन्हें उनके प्रकृतिकण आवास में छोड़ देंगे। 
 
स्मॉल इंडियन सिवेट

दूसरी बहुतायत में पायी जाने वाली सिवेट की प्रजाति है, स्मॉल इंडियन सिवेट, जिसे हिंदी में कस्तूरी कहते है। वैसे ये पाम सिवेट के तुलना में कम पाए जाते हैं पर इनके बारे में ज्यादा जागरूकता है और इनकी समस्याएं भी अलग हैं। इनकी गुदा ग्रंथि से एक तरल पदार्थ निकलता है जिसकी खुशबू अत्यधिक तेज होती है और इसकी वजह से दक्षिण भारत में  लोग इस पालते थे।  

ये जिस जगह पर उस तरल पदार्थ को रगड़ते हैं वो वहां कुछ देर में वो जम जाता है और लोग खुरच कर उसे निकल लेते हैं। इस कस्तूरी का प्रयोग न सिर्फ सुगंध के लिए होता है बल्कि कुछ पारम्परिक  दवाओं में भी उसका उपयोग होता है।  

इसके अलावा इस कस्तूरी को तेल के साथ मिला कर सुगन्धित प्रसाद के रूप में तिरुपति मंदिर में प्रयोग करते हैं। चूंकि ये परंपरा तिरुपति मंदिर में वर्षों से चली आ रही है पर हाल के दिनों में इस परंपरा में पशुओं के ऊपर हो रही क्रूरता और उनके संरक्षण पर सवाल उठ रहे हैं, इस वजह से तिरुपति मंदिर ट्रस्ट ने प्राणी उद्यानों में इनके कंजर्वेशन ब्रीडिंग के लिए दान देना शुरू कर दिया है।  

इनके अलावा सिवेट्स की और प्रजातियां भी किसी न किसी चुनौती से जूझ रही हैं जिनमे प्रमुख है आवास की कमी, शिकार और शहरीकरण, जागरूकता और संरक्षण प्रयासों से हम अपने इन मित्रों को उनके प्राकृतिक आवास में संरक्षित करने में एक बड़ा योगदान दे सकते हैं।  



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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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