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विश्व साहित्य का आकाश: प्रसिद्धि के बावजूद आत्महत्या
सार
कुछ लोग जिन्हें खूब प्रसिद्धि, सम्पत्ति, सम्मान मिला होता है ऐसे लोग भी आत्महत्या करते हैं। इसके उदाहरण हैं, कुछ नोबेल पुरस्कृत लेखक, जैसे हेमिंग्वे और कावाबाता यासूनारी। वैसे और कई रचनाकारों ने आत्महत्या की है, जिनमें वर्जीनिया वुल्फ, सिल्विया पाथ, यूकियो मिशिमा, जैक लंदन आदि प्रमुखता से इसके लिए जाने जाते हैं।
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साहित्य की दुनिया
- फोटो : adobestock
विस्तार
आदमी जानता है, उसे किसी की जिंदगी लेने का कोई हक नहीं है। अपनी जिंदगी लेने का भी नहीं। फिर भी दिन-रात हत्याएं होती हैं। कभी व्यक्तिगत, कभी पारिवारिक, कभी सामुदायिक, कभी देश-समाज की इज्जत की रक्षा के नाम पर। इसी तरह कुछ लोग आत्महत्या करते हैं।
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जटिल प्रश्न है, आदमी आत्महत्या क्यों करता है? कभी अवसादग्रस्त होकर, कभी अपमानित हो, कभी असफलता मिलने पर, कभी प्रतिकार के लिए, कभी दबाव में। मनोविज्ञान बताता है, कुछ लोग जन्म से आत्महंता प्रवृति के होते हैं, जैसे नोबेल पुरस्कृत साहित्यकार अर्नेस्ट हेमिंग्वे। वैसे कोई आदमी आत्महत्या किसी एक कारण से करता है, यह कहना कठिन है।
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बड़ी विचित्र बात है, कुछ लोग जिन्हें खूब प्रसिद्धि, सम्पत्ति, सम्मान मिला होता है ऐसे लोग भी आत्महत्या करते हैं। इसके उदाहरण हैं, कुछ नोबेल पुरस्कृत लेखक, जैसे हेमिंग्वे और कावाबाता यासूनारी। वैसे और कई रचनाकारों ने आत्महत्या की है, जिनमें वर्जीनिया वुल्फ, सिल्विया पाथ, यूकियो मिशिमा, जैक लंदन आदि प्रमुखता से इसके लिए जाने जाते हैं।
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1968 में नोबेल समिति ने उपन्यास ‘स्नो कंट्री’ को यासुनारी कावाबाता के नोबेल पुरस्कार का आधार बनाया। 11 जून 1899 में जापान के ओसाका शहर में हुआ। उनके पिता एक पिता एक सम्मानित डॉक्टर थे। जब कावाबाता मात्र दो वर्ष के थे वे अनाथ हो गए। उन्हें सुदूर देहात में अपने बूढ़े-बीमार तथा अंधे नाना के पास रहना पड़ा। जब सात वर्ष के थे तब नानी गुजरी और जब वे पंद्रह वर्ष के थे तब उनके नाना भी गुजर गए। स तरह उनका बचपन बहुत हादसों के साथ गुजरा।
यासुनारी कावाबाता और उनकी रचनाएं
यासुनारी कावाबाता का नोबेल भाषण भी बहुत महत्वपूर्ण है। वे इसे ‘जापान, सुंदर और मैं’ शीर्षक देते हैं। इसमें वे जापान की प्राचीन संस्कृति, जापान की प्राक्रूतिक सुंदरता, साहित्य की विशिष्टताओं को व्याख्यायित करते हैं।
‘स्नो कंट्री’ ‘थाउजंड क्रेन्स’, ‘द साउंड ऑफ द माउंटेन’, ‘द मास्टर ऑफ गो’, ‘द हाउस ऑद स्लीपिंग ब्यूटीज’, ‘ब्यूटी एंड सैडनेस’ जैसी रचनाएं कावाबात की हैं।
उनकी रचनाओं, नोबेल भाषण में मृत्यु प्रमुखता से स्थान पाती है। ‘मैं न तो इसकी प्रशंसा करता हूं और न ही आत्महत्या के साथ मेरी कोई सहानुभूति है।’ ऐसा कहने वाले, काफी दिन से बीमार चल रहे यासुनारी कावाबाता बिना किसी सुसाइड नोट के 16 अप्रैल 1972 की रात को मुंह में गैस पाइप लगा कर आत्महत्या करते हैं। उस समय वे 72 साल के थे। यासुनारी कावाबाता ने आत्महत्या क्यों की? इसके केवल तरह-तरह के कयास लगाए जा सकते हैं।
दो साल पहले 25 नवंबर 1970 में उनके शिष्य युकिओ मिशिमा (वास्तविक नाम किमिटेक हिराओका) ने जापान की हाराकिरी विधि से आत्महत्या की थी। उसकी मृत्यु से न केवल कावाबाता वरन पूरा देश सदमें में आ गया था। कावाबाता की आत्महत्या से भी उनके मित्र सनाखा का गए, समस्त साहित्य जगत स्तब्ध था। कोई भी उनकी मौत की व्याख्या नहीं कर पा रहा था, क्योंकि मिलने वालों के अनुसार वे काफी अच्छे मूड में थे।
भले ही शारीरिक रूप से कुछ समय से अस्वस्थ थे। केवल तमाम अटकलें लगाई जा रही थीं। कुछ लोगों ने अनुसार इसका कारण मिशिमा यूकिओ की मौत था। उनका यह करीबी मित्र-शिष्य, उपन्यासकार मिशिमा मात्र 45 साल का था। उसने आत्महत्या की क्योंकि वह सक्रिय राजनीति में था, एक आंदोलन में शरीक था और आंदोलन असफल हो गया था। अपने जीवन और कार्य के शीर्ष पर उसने आत्महत्या की थी। मिशिमा ने अपने हर लेखन में अपनी मृत्यु का आभास दिया। वह कहता भी था वह 50 साल तक ही जीवित रहेगा।
कावाबाता और मिशिमा की नजदीकी के चलते कावाबाता की पालित बेटी से उसका विवाह तय था। हालांकि मिशिमा समलैंगिक था। उसने 1958 में एक दूसरी लड़की से शादी की, तब भी कावाबाता शादी के ऑफीशियल मैचमेकर थे। शुरु में मिशिमा उनका बहुत कृतज्ञ था।
जब 1968 में कावाबाता को नोबेल पुरस्कार मिलने की घोषणा हुई, तो मिशिमा उन्हें बधाई देने तत्काल उनके घर पहुंचा। और उसके अंतिम संस्कार के समय कावाबाता ने उसके लिए मृत्यु लेख पढ़ा। लेकिन बाहर से जो दीखता है, वही सब कुछ नहीं होता है। सतह के नीचे बहुत कुछ चल रहा होता है।
एक समय का नम्र, विनीत शिष्य काफी समय से अपने मेंटर का प्रतिद्वंद्वी बन गया था। उसका नाम कई बार नोबेल पुरस्कार के लिए नामित हुआ। उसने इसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी जोड़-तोड़, दौड़-भाग भी की। यहां तक कि स्टॉकहोम भी गया था। लेकिन पुरस्कार तो कावाबाता को मिला। इस समय तक मिशिमा खुद को जापान का सबसे बड़ा रचनाकार मानने लगा था। वह दूसरे रचनाकारों पर टिप्पणियां भी करने लगा था। वह था भी एक बड़ा रचनाकार। वह कहीं कावाबाता की गिरती दशा का जिम्मेदार भी था।
परिवार में आत्महत्या की प्रवृति
अमेरिकन उपन्यासकार, पत्रकार, हथियारों के विशेषज्ञ, बुल फाइटर, कुशल निशानेबाज, शिकारी, नोबेल पुरस्कृत अर्नेस्ट हेमिंग्वे के परिवार में आत्महत्या की प्रवृति थी। उनके डॉक्टर पिता क्लैरेन्स एडमन्ड्स हेमिंग्वे, बहन उर्सुला तथा भाई लेसेस्टर ने यह किया।
ये हादसे उन्हें भीतर से तोड़ गए। बाद में पोती सुपरमॉडल मार्गौक्स ने भी आत्महत्या की। उनकी पत्नी हेडली के पिता ने आत्महत्या कर ली। पैरोनाइड, हाइपरटेंशन, हताश, अवसाद ग्रसित हो स्वयं हेमिंग्वे ने 2 जुलाई 1961 को भोर में अपनी प्रिय डबलबैरल शॉटगन से उन्होंने अपनी इहलीला समाप्त कर ली।
हेमिंग्वे के जीवन काल में प्रकाशित कृतिया सात उपन्यास, छ: कहानी संग्रह, दो कथेतर गद्य है।
गुजरने के बाद तीन उपन्यास, चार कहानी संग्रह तथा तीन कथेतर गद्य और प्रकाशित हुआ। ‘ए फेरवल टू आर्म्स’, ‘द सन आलसो राइजेज’, ‘फॉर हूम द बेल टोल्स’, ‘विनर टेक नथिंग’, टू हैव एंड हैव नॉट’, ‘मेन विदआउट वीमेन’ उनकी कृतियां हैं। ‘एक्रॉस द रिवर एंड इन्टू द ट्रीज’ उनके जीवित रहते प्रकाशित उनका अंतिम उपन्यास है।
बहुमुखी प्रतिभा के हेमिंग्वे को 1954 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ। उन्हें उनके समस्त कार्य पर पुरस्कार मिला पर समिति ने खासतौर पर ‘दि ओल्ड मैन एंड द सी’ का उल्लेख किया। उस साल एल्बर्ट कामू और हेमिंग्वे के मित्र एजरा पाउंड भी रेस में थे। घायल हेमिंग्वे पुरस्कार लेने स्टॉकहोम न जा सके। पढ़ने केलिए अपनी लिखित स्पीच भेज दी। जिसे स्वीडन में अमेरिकी राजदूत जॉन एम. कबोट ने पढ़ा।
पूरे विश्व में उनकी ख्याति है, युद्ध के विरुद्ध उन्होंने जम कर लिखा है, फिर भी उन्होंने ऐसा निकृष्ट कार्य किया।
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