फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   Ramlila Ground: The Echo of the Movement and the Ouster of Power in the Election

रामलीला मैदान: आंदोलन की गूंज और चुनाव में सत्ता की विदाई

सार

दिल्ली का रामलीला मैदान केवल राजनीतिक रैलियों का स्थल नहीं रहा। यह उस जन-असंतोष का प्रतीक भी बना, जिसने सत्ता के सामने सवाल खड़े किए। यहां जुटी भीड़ ने कई बार देश का ध्यान उन मुद्दों की ओर खींचा, जिन्हें राजनीतिक व्यवस्था नजरअंदाज नहीं कर सकती थी।

विज्ञापन
Ramlila Ground: The Echo of the Movement and the Ouster of Power in the Election
प्रदर्शन करते हुए लोग (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : AI Generated

विस्तार

जेपी आंदोलन के बाद 1977 में इंदिरा गांधी और अन्ना आंदोलन के तीन साल बाद 2014 में मनमोहन सिंह की सरकार चुनाव में सत्ता से बाहर हुई। दिल्ली में 2013 में शीला दीक्षित के 15 साल के शासन का अंत भी चुनावी फैसले से हुआ। रामलीला मैदान से उठी आवाजों ने राजनीतिक माहौल को प्रभावित किया, लेकिन क्या आंदोलनों ने इन सरकारों की विदाई की जमीन तैयार की?

विज्ञापन


ऐतिहासिक जंतर-मंतर को विरोध प्रदर्शनों और धरनों के अधिकृत स्थलों की सूची से हटाए जाने के बाद अब रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और सीबीडी ग्राउंड को नए ठिकानों के रूप में निर्धारित किया गया है। गृह मंत्रालय द्वारा गठित समिति की सिफारिशों के आधार पर हुए इस बदलाव के बीच रामलीला मैदान का इतिहास खास मायने रखता है। 
विज्ञापन


दिल्ली का रामलीला मैदान केवल राजनीतिक रैलियों का स्थल नहीं रहा। यह उस जन-असंतोष का प्रतीक भी बना, जिसने सत्ता के सामने सवाल खड़े किए। यहां जुटी भीड़ ने कई बार देश का ध्यान उन मुद्दों की ओर खींचा, जिन्हें राजनीतिक व्यवस्था नजरअंदाज नहीं कर सकती थी। यह महज धरना-प्रदर्शन की जमीन नहीं, बल्कि वह मंच है जहां से उठी आवाजों ने सत्ता को चुनौती दी, राजनीतिक विमर्श बदला और कई बार चुनावी राजनीति की दिशा को प्रभावित किया।
विज्ञापन
विज्ञापन


विरोध का मंच या सत्ता परिवर्तन की शुरुआत?

आंदोलन में उमड़ी भीड़ और चुनाव में मिलने वाले जनादेश को लेकिन एक मान लेना सही नहीं होगा। लोकतंत्र में सरकार का भविष्य चुनाव और विधायी बहुमत तय करते हैं। आंदोलन की भूमिका इससे पहले शुरू होती है।

वह किसी मुद्दे को राष्ट्रीय बहस में ला सकता है, सरकार की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर सकता है और जनता के सामने नए राजनीतिक विकल्पों की मांग को मजबूत कर सकता है। इसी कसौटी पर जेपी आंदोलन, अन्ना आंदोलन और शीला दीक्षित की सत्ता से विदाई को समझना जरूरी है।

जेपी आंदोलन: आपातकाल और हार

1970 के दशक में महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के खिलाफ बढ़ते असंतोष ने देश की राजनीति को प्रभावित किया। जयप्रकाश नारायण यानी जेपी के नेतृत्व में आंदोलन ने व्यापक रूप लिया। बिहार से शुरू हुई यह लहर केंद्र की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गई।

25 जून 1975 को दिल्ली के रामलीला मैदान में जेपी की विशाल रैली हुई। इसी दिन उन्होंने सरकार के खिलाफ संघर्ष तेज करने का आह्वान किया। इसके अगले दिन देश में आपातकाल लागू होने की घोषणा हुई। नागरिक स्वतंत्रताओं पर पाबंदियां लगीं, विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार किया गया और प्रेस पर प्रतिबंध लगाए गए।

आपातकाल के बाद मार्च 1977 में लोकसभा चुनाव हुए। कांग्रेस को करारी हार मिली और इंदिरा गांधी की सरकार सत्ता से बाहर हो गई। यह लोकतांत्रिक अधिकारों और आपातकाल के अनुभव पर जनता के फैसले के रूप में भी देखा गया।

हालांकि, इंदिरा गांधी की सत्ता का अंत केवल रामलीला मैदान की रैली का परिणाम नहीं था। जेपी आंदोलन, आपातकाल के खिलाफ असंतोष और चुनावी परिस्थितियों ने मिलकर राजनीतिक बदलाव की जमीन तैयार की। आंदोलन ने चुनौती खड़ी की, लेकिन सत्ता से विदाई का फैसला मतदाताओं ने किया।

अन्ना आंदोलन: भ्रष्टाचार बना राष्ट्रीय मुद्दा

वर्ष 2011 में रामलीला मैदान एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आया। अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जन लोकपाल कानून की मांग को लेकर आंदोलन किया। उनके अनशन को युवाओं, शहरी मध्यम वर्ग और समाज के विभिन्न तबकों से समर्थन मिला। मीडिया ने भी इसे देशव्यापी पहचान दी।

उस समय मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों और शासन की विश्वसनीयता को लेकर सवालों का सामना कर रही थी। 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन और राष्ट्रमंडल खेलों से जुड़े विवादों ने सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया था। अन्ना आंदोलन ने इन सवालों को व्यापक जनचर्चा का हिस्सा बना दिया।

लेकिन क्या इस आंदोलन ने मनमोहन सिंह की सरकार गिरा दी? तथ्य यह है कि यूपीए सरकार ने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की हार हुई और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने केंद्र में सरकार बनाई।

इसलिए अन्ना आंदोलन को सरकार की सीधी विदाई का कारण बताना सही नहीं होगा। फिर भी, भ्रष्टाचार के मुद्दे को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में लाने और कांग्रेस विरोधी माहौल को मजबूत करने में इसकी भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

शीला दीक्षित: अन्ना आंदोलन और बदली दिल्ली

दिल्ली में शीला दीक्षित के नेतृत्व में कांग्रेस ने 1998 से लगातार तीन विधानसभा चुनाव जीते थे। उनके 15 साल के शासन में मेट्रो और शहरी बुनियादी ढांचे का विस्तार हुआ, लेकिन तीसरे कार्यकाल के अंतिम दौर में महंगाई, बिजली-पानी की कीमतों और भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर असंतोष बढ़ रहा था।

अन्ना आंदोलन से जुड़े अरविंद केजरीवाल ने बाद में आम आदमी पार्टी बनाई। भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन में उठे सवालों को उन्होंने चुनावी राजनीति का आधार बनाया। इस तरह विरोध की आवाज एक नए राजनीतिक विकल्प में बदल गई।

दिसंबर 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा 31 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी। आम आदमी पार्टी ने अपने पहले ही चुनाव में 28 सीटें जीत लीं, जबकि कांग्रेस आठ सीटों पर सिमट गई। नई दिल्ली सीट से खुद शीला दीक्षित अरविंद केजरीवाल से हार गईं। 28 दिसंबर 2013 को केजरीवाल ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।

यहां भी अंतर समझना जरूरी है। शीला दीक्षित की सरकार को रामलीला मैदान के किसी एक प्रदर्शन ने नहीं हटाया। दिल्ली की स्थानीय समस्याओं, कांग्रेस के खिलाफ असंतोष और आम आदमी पार्टी के उभार ने मिलकर चुनावी नतीजों को प्रभावित किया। अन्ना आंदोलन ने नई राजनीतिक ऊर्जा पैदा की, लेकिन उसका चुनावी परिणाम कई कारकों से तय हुआ।

तीन घटनाएं, एक सवाल

इंदिरा गांधी, मनमोहन सिंह और शीला दीक्षित की सरकारों के अंत में एक समानता जरूर है—राजनीतिक बदलाव का अंतिम फैसला चुनाव ने किया। लेकिन तीनों की परिस्थितियां एक जैसी नहीं थीं। इंदिरा गांधी की हार आपातकाल के बाद हुई; मनमोहन सिंह की सरकार ने कार्यकाल पूरा करने के बाद चुनाव गंवाया; शीला दीक्षित की सत्ता दिल्ली विधानसभा चुनाव में समाप्त हुई।

इन घटनाओं से यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि रामलीला मैदान पर प्रदर्शन होते ही किसी सरकार की विदाई तय हो जाती है। आंदोलन का प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि उसका मुद्दा कितना व्यापक है, जनता उससे कितना जुड़ती है और विपक्ष या कोई नया राजनीतिक विकल्प उस असंतोष को चुनावी समर्थन में कितना बदल पाता है।

आंदोलन की गूंज, सत्ता में बदलाव

लोकतंत्र में आंदोलन और चुनाव राजनीतिक प्रक्रिया के दो अलग पहलू हैं। आंदोलन सत्ता से सवाल पूछता है; चुनाव जनता को उन सवालों के आधार पर फैसला सुनाने का अवसर देता है।

रामलीला मैदान की ऐतिहासिक भूमिका इसी में है। जेपी आंदोलन ने लोकतांत्रिक अधिकारों का प्रश्न उठाया, अन्ना आंदोलन ने भ्रष्टाचार को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में रखा और उससे निकली राजनीतिक ताकत ने दिल्ली में नया विकल्प प्रस्तुत किया।

रामलीला मैदान सरकारों की विदाई का संवैधानिक रास्ता नहीं, लेकिन सत्ता को चुनौती देने वाली आवाजों का महत्वपूर्ण मंच जरूर है। आंदोलन राजनीतिक जमीन तैयार कर सकता है; उस जमीन पर सत्ता किसकी बनेगी, इसका फैसला जनता अपने वोट से करती है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed