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कोलकाता नगर निगम: ऐतिहासिक मेयर की कुर्सी पर अब भाजपा की नजर!
सार
देशबंधु चित्तरंजन दास और नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसी ऐतिहासिक शख्सियतें जिस मेयर की कुर्सी पर बैठीं, उस पर इस बार कौन बैठेगा? कोलकाता नगर निगम का चुनाव अगले महीने होने की संभावना है। 144 से बढ़कर 209 वार्ड, महिला आरक्षण और बदले राजनीतिक समीकरणों के बीच क्या तृणमूल कांग्रेस अपना दबदबा कायम रख पाएगी, भाजपा नई चुनौती पेश करेगी या वामपंथ-कांग्रेस अपनी खोई जमीन तलाशेंगे? कोलकाता की इस सियासी जंग के नतीजों पर सबकी नजर रहेगी।
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शुभेंदु अधिकारी, मुख्यमंत्री, पश्चिम बंगाल
- फोटो : एक्स/पश्चिम बंगाल वन विभाग
विस्तार
पश्चिम बंगाल की राजनीति में कोलकाता का महत्व हमेशा से रहा है। राज्य की राजधानी होने के साथ-साथ यह शहर राजनीतिक आंदोलनों, सत्ता संघर्ष और विचारधाराओं की लड़ाई का केंद्र भी रहा है। इसलिए कोलकाता नगर निगम का चुनाव केवल पार्षदों के चयन तक सीमित नहीं रहता। इसके नतीजों में शहर के राजनीतिक मिजाज और प्रमुख दलों की संगठनात्मक ताकत की झलक भी मिलती है।
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हालांकि, नगर निगम और विधानसभा चुनावों के मुद्दे एक जैसे नहीं होते। विधानसभा चुनाव में राज्य सरकार, मुख्यमंत्री और व्यापक राजनीतिक एजेंडे की भूमिका बड़ी होती है, जबकि निगम चुनाव में वार्ड स्तर के समीकरण, स्थानीय उम्मीदवार, नागरिक सुविधाएं और पार्षदों का काम अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है। यही वजह है कि विधानसभा में मजबूत प्रदर्शन करने वाली पार्टी के लिए नगर निगम में जीत अपने आप सुनिश्चित नहीं हो जाती।
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इस बार चुनाव का महत्व इसलिए भी बढ़ गया है, क्योंकि वार्डों की संख्या में बड़ा बदलाव हुआ है। पुराने 144 वार्डों की जगह अब 209 वार्डों की व्यवस्था की गई है। यानी 65 नए वार्ड जुड़ने से चुनावी नक्शा और उम्मीदवारों के चयन का गणित बदल सकता है। ऐसे में मुकाबला केवल राजनीतिक लोकप्रियता का नहीं, बल्कि नए वार्डों में संगठन और जनाधार स्थापित करने का भी होगा।
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ब्रिटिश दौर से शुरू हुआ राजनीतिक इतिहास
कोलकाता के नगर प्रशासन का इतिहास ब्रिटिश शासन के दौर तक जाता है। 1876 में नगर निगम की स्थापना के बाद इसकी संरचना और अधिकारों में कई बदलाव हुए। स्वतंत्रता से पहले भी यह संस्था राजनीतिक नेतृत्व और सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखती थी।
1924 में देशबंधु चित्तरंजन दास कोलकाता के पहले निर्वाचित मेयर बने। 1930 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने भी मेयर का पद संभाला। इन नामों से ही समझा जा सकता है कि कोलकाता का नगर प्रशासन केवल नागरिक सुविधाओं की व्यवस्था नहीं था, बल्कि राष्ट्रीय आंदोलन और राजनीतिक नेतृत्व से भी जुड़ा हुआ था।
आजादी के बाद नगर निगम की व्यवस्था में कई बदलाव हुए। समय के साथ चुनावी ढांचा विकसित हुआ और निगम की राजनीति में कांग्रेस, वामपंथी दलों तथा बाद में तृणमूल कांग्रेस की भूमिका बढ़ती गई।
वामपंथ का प्रभाव और कांग्रेस की चुनौती
स्वतंत्रता के बाद के दशकों में कोलकाता की राजनीति में कांग्रेस का प्रभाव रहा, लेकिन धीरे-धीरे वामपंथी दलों ने शहर में अपना आधार मजबूत किया। मजदूर संगठनों, ट्रेड यूनियनों और वामपंथी राजनीतिक गतिविधियों ने कोलकाता को वाम राजनीति का महत्वपूर्ण केंद्र बनाया।
1960 और 1970 के दशक के राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बीच नगर निगम की सत्ता भी बदलती रही। बाद के वर्षों में वामपंथी दलों ने निगम की राजनीति में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। 1977 में पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा सरकार बनने के बाद उसकी राजनीतिक पकड़ लंबे समय तक बनी रही।
लेकिन वामपंथ के सामने एक चुनौती थी। राज्य की सत्ता में लंबे समय तक बने रहने के बावजूद शहरी क्षेत्रों में असंतोष, स्थानीय प्रशासन की समस्याएं और कांग्रेस की चुनौती लगातार मौजूद रही। यही वह राजनीतिक जमीन थी, जिस पर आगे चलकर ममता बनर्जी की राजनीति ने विस्तार पाया।
2000: ममता बनर्जी की पार्टी ने पहली बार हासिल की निगम की सत्ता
कोलकाता नगर निगम की राजनीति में वर्ष 2000 निर्णायक साबित हुआ। तृणमूल कांग्रेस ने निगम चुनाव जीतकर वामपंथी दलों को चुनौती दी। सुब्रत मुखर्जी मेयर बने। यह ममता बनर्जी के लिए शहरी राजनीति में अपनी ताकत स्थापित करने का महत्वपूर्ण अवसर था।
लेकिन तृणमूल कांग्रेस की यह जीत स्थायी नहीं रही। 2005 के चुनाव में वाममोर्चा ने वापसी की और विकास रंजन भट्टाचार्य मेयर बने। इससे साफ हुआ कि कोलकाता में तृणमूल का उभार होने के बावजूद वामपंथ का संगठन और स्थानीय आधार पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था।
फिर 2010 में राजनीतिक तस्वीर बदल गई। तृणमूल कांग्रेस ने 141 में से 97 सीटें जीतकर निगम की सत्ता हासिल की। इसके बाद 2011 में विधानसभा चुनाव में भी ममता बनर्जी ने वाममोर्चा को सत्ता से बेदखल कर दिया।
2015: तृणमूल की पकड़ और मजबूत हुई
2015 के निगम चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने 144 में से 114 सीटें जीत लीं। वामपंथ, कांग्रेस और भाजपा के लिए यह बड़ा झटका था। कोलकाता के नगर प्रशासन में तृणमूल की पकड़ और मजबूत हो गई।
यह वह दौर था, जब भाजपा पश्चिम बंगाल में अपनी राजनीतिक जमीन बढ़ाने की कोशिश कर रही थी। लेकिन विधानसभा चुनावों में बढ़ती चुनौती के बावजूद कोलकाता नगर निगम में तृणमूल को रोकना उसके लिए आसान नहीं था।
2021: 134 सीटों के साथ तृणमूल का रिकॉर्ड प्रदर्शन
2021 के निगम चुनाव ने तृणमूल कांग्रेस के वर्चस्व पर मुहर लगा दी। पार्टी ने 144 में से 134 सीटें जीत लीं। भाजपा को सिर्फ तीन, कांग्रेस को दो और वामपंथी दलों को कुल दो सीटें मिलीं। तीन सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवार विजयी हुए।
यह नतीजा तृणमूल के पक्ष में बेहद मजबूत था। भाजपा 2021 के विधानसभा चुनाव में मुख्य विपक्षी दल बनकर उभरी थी, लेकिन उसी साल नगर निगम चुनाव में वह उस राजनीतिक ताकत को सीटों में नहीं बदल पाई।
यही कोलकाता की राजनीति का महत्वपूर्ण पहलू है। विधानसभा चुनाव में किसी पार्टी को व्यापक समर्थन मिलना और वार्ड स्तर पर स्थानीय चुनाव जीतना दो अलग-अलग बातें हैं। निगम चुनाव में उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़, स्थानीय संगठन और नागरिक समस्याओं पर उसकी सक्रियता भी निर्णायक हो सकती है।
फिरहाद हकीम का दौर और बदली राजनीतिक परिस्थितियां
तृणमूल कांग्रेस के शासनकाल में कोलकाता नगर निगम की राजनीति में सुब्रत मुखर्जी और शोभन चटर्जी के बाद फिरहाद हकीम प्रमुख चेहरा बने। 2018 में शोभन चटर्जी के पद छोड़ने के बाद फिरहाद हकीम ने मेयर की जिम्मेदारी संभाली। 2021 के चुनाव के बाद भी वह मेयर बने रहे।
लेकिन 2026 में राज्य की सत्ता में बदलाव के बाद नगर निगम की राजनीति भी बदल गई। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने जून में घोषणा की कि कोलकाता नगर निगम का चुनाव दिसंबर 2026 तक कराया जाएगा। इसके बाद निगम के निर्वाचित बोर्ड को भंग कर प्रशासक नियुक्त किए जाने से चुनाव की राजनीतिक अहमियत और बढ़ गई।
अब तृणमूल कांग्रेस के सामने यह साबित करने की चुनौती है कि नगर निगम में उसका जनाधार केवल राज्य की सत्ता के कारण नहीं था। दूसरी ओर, भाजपा के लिए यह अपने शासन को स्थानीय स्तर पर राजनीतिक समर्थन में बदलने का अवसर है।
209 वार्ड: इस बार मुकाबला पहले जैसा नहीं होगा
इस चुनाव का सबसे बड़ा बदलाव परिसीमन है। पश्चिम बंगाल विधानसभा ने अगस्त 2026 में संशोधन विधेयक पारित कर कोलकाता नगर निगम के वार्डों की संख्या 144 से बढ़ाकर 209 करने का रास्ता साफ किया। सितंबर में राज्य सरकार ने संशोधित वार्डों की व्यवस्था से संबंधित अधिसूचना जारी की। निगम के 16 बोरो पहले की तरह बने रहेंगे।
इसका मतलब है कि अब 65 अतिरिक्त वार्ड होंगे। राजनीतिक दलों को ज्यादा उम्मीदवार उतारने होंगे और कई जगह पुराने वार्डों की सीमाएं बदलने से उम्मीदवारों का पारंपरिक जनाधार भी प्रभावित हो सकता है।
सरकार ने इस बदलाव के पीछे आबादी के वितरण में परिवर्तन और नागरिक सुविधाओं को बेहतर तरीके से पहुंचाने की जरूरत बताई है। हालांकि, परिसीमन की प्रक्रिया और वार्डों की सीमाओं को लेकर विपक्ष ने सवाल भी उठाए हैं। इसलिए चुनाव में यह मुद्दा भी राजनीतिक बहस का हिस्सा बन सकता है।
महिला आरक्षण: उम्मीदवार चयन की नई चुनौती
209 वार्डों में महिलाओं के लिए आरक्षण भी इस चुनाव के समीकरण को प्रभावित करेगा। सितंबर में प्रकाशित मसौदा आरक्षण सूची में 70 वार्ड महिलाओं के लिए आरक्षित किए जाने का प्रस्ताव सामने आया था। यह संख्या कुल वार्डों की लगभग एक-तिहाई है। हालांकि, मसौदा सूची और अंतिम अधिसूचना में अंतर हो सकता है, इसलिए अंतिम आरक्षण की पुष्टि जरूरी है।
आरक्षण के कारण राजनीतिक दलों को उम्मीदवारों की रणनीति नए सिरे से बनानी होगी। कुछ पुराने पार्षदों को अपनी सीट छोड़नी पड़ सकती है, जबकि महिला नेताओं और नए चेहरों के लिए अवसर खुल सकते हैं।
लेकिन क्या केवल नए उम्मीदवार उतारने से किसी पार्टी को लाभ मिलेगा? असली सवाल यह है कि कौन-सा दल मजबूत स्थानीय उम्मीदवारों को सामने लाता है, कौन अपने संगठन को नए वार्डों में सक्रिय करता है और कौन मतदाताओं के बीच बेहतर भरोसा बना पाता है। यहीं से इस चुनाव का असली मुकाबला शुरू होता है।
भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती: विधानसभा की ताकत को वार्डों में बदलना
कोलकाता नगर निगम के आगामी चुनाव में भाजपा के सामने सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि क्या वह राज्य की सत्ता में अपनी मौजूदगी को शहर के वार्डों में चुनावी सफलता में बदल सकती है?
2021 के निगम चुनाव में भाजपा को केवल तीन सीटें मिली थीं। लेकिन इस बार मुकाबले की परिस्थितियां अलग हैं। राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद भाजपा के पास अपने संगठन को मजबूत करने और स्थानीय स्तर पर राजनीतिक पकड़ बनाने का अवसर है।
हालांकि, राज्य की सत्ता में होना नगर निगम चुनाव जीतने की गारंटी नहीं है। कोलकाता में तृणमूल कांग्रेस का वर्षों पुराना संगठन, स्थानीय नेताओं का नेटवर्क और वार्ड स्तर पर उसका प्रभाव भाजपा के लिए बड़ी चुनौती बना रह सकता है।
भाजपा को यह भी साबित करना होगा कि उसके उम्मीदवार केवल पार्टी के नाम पर वोट मांगने के बजाय स्थानीय समस्याओं पर प्रभावी ढंग से काम करने का भरोसा दे सकते हैं। नए परिसीमन के बाद 65 अतिरिक्त वार्डों में उम्मीदवार खड़े करना और संगठन को प्रभावी बनाना आसान नहीं होगा।
तृणमूल के सामने अपनी पुरानी ताकत बचाने की चुनौती
तृणमूल कांग्रेस ने 2010, 2015 और 2021 के नगर निगम चुनावों में लगातार जीत हासिल की। 2021 में 134 सीटें जीतना उसके शहरी संगठन की ताकत का प्रमाण था। लेकिन अब उसे बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों में अपना आधार साबित करना होगा।
सवाल यह है कि क्या तृणमूल का पारंपरिक मतदाता अब भी उसके साथ मजबूती से खड़ा रहेगा? क्या पुराने पार्षदों का स्थानीय प्रभाव कायम है? क्या नागरिक सुविधाओं को लेकर उठने वाली शिकायतें पार्टी के चुनावी प्रदर्शन को प्रभावित करेंगी?
नए वार्डों में पुराने राजनीतिक समीकरणों का टूटना भी तृणमूल के लिए चुनौती बन सकता है। जिस उम्मीदवार ने वर्षों तक किसी खास इलाके में अपनी पकड़ बनाई थी, नए परिसीमन के बाद उसका क्षेत्र बदल सकता है। ऐसे में पार्टी को नए चेहरों और पुराने नेताओं के बीच संतुलन बनाना होगा।
दूसरी ओर, तृणमूल यह तर्क दे सकती है कि स्थानीय शासन का मूल्यांकन नागरिक सुविधाओं और वार्ड स्तर के काम के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल राज्य की सत्ता बदलने के आधार पर।
वामपंथ और कांग्रेस: क्या वापसी की कोई गुंजाइश है?
कोलकाता कभी वामपंथी राजनीति का प्रमुख केंद्र था। कांग्रेस की भी शहर में पुरानी राजनीतिक मौजूदगी रही है। लेकिन पिछले कुछ चुनावों में दोनों दलों का प्रभाव काफी कमजोर हुआ है।
2021 में वाम दलों और कांग्रेस को निगम में बहुत कम सीटें मिली थीं। अब उनके सामने सवाल है कि क्या वे मतदाताओं के बीच अपनी विश्वसनीयता दोबारा बना सकते हैं।
नए परिसीमन से इन दलों को कुछ वार्डों में नए सिरे से संगठन खड़ा करने का अवसर मिल सकता है। लेकिन इसके लिए केवल पुराने राजनीतिक इतिहास का सहारा पर्याप्त नहीं होगा। उन्हें मजबूत स्थानीय उम्मीदवार, स्पष्ट चुनावी मुद्दे और मतदाताओं तक पहुंचने की प्रभावी रणनीति तैयार करनी होगी।
अगर विपक्षी वोटों का बंटवारा होता है, तो इसका लाभ किसे मिलेगा? क्या भाजपा मुख्य विपक्ष के रूप में अपनी स्थिति और मजबूत करेगी, या वामपंथ और कांग्रेस कुछ वार्डों में अपनी वापसी दर्ज करा पाएंगे? इसका उत्तर उम्मीदवारों की घोषणा और चुनाव प्रचार के दौरान अधिक स्पष्ट होगा।
महिला आरक्षण: नए चेहरों के लिए अवसर या पुराने समीकरणों में बदलाव?
209 वार्डों में से 70 वार्ड महिलाओं के लिए आरक्षित किए गए हैं। यानी लगभग एक-तिहाई सीटों पर महिला उम्मीदवारों को मैदान में उतारना होगा। राज्य प्रशासन की अंतिम आरक्षण सूची के अनुसार यह संख्या 70 है।
इससे सभी प्रमुख दलों के उम्मीदवार चयन पर असर पड़ेगा। जिन वार्डों में पुराने पुरुष पार्षद चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे, वहां आरक्षण के कारण उन्हें दूसरी सीट तलाशनी पड़ सकती है। वहीं महिला नेताओं और नए राजनीतिक चेहरों के लिए अवसर खुलेंगे।
लेकिन महिला आरक्षण अपने आप में किसी दल की जीत सुनिश्चित नहीं करेगा। असली प्रश्न यह है कि क्या पार्टियां केवल औपचारिक उम्मीदवार उतारेंगी या उन्हें वास्तविक राजनीतिक नेतृत्व का अवसर भी देंगी? क्या महिला पार्षदों को स्थानीय मुद्दों पर स्वतंत्र रूप से काम करने का अवसर मिलेगा? इस चुनाव में उम्मीदवारों की सामाजिक पृष्ठभूमि, स्थानीय लोकप्रियता और संगठनात्मक क्षमता भी महत्वपूर्ण होगी।
नागरिक सुविधाएं बनाम राजनीतिक पहचान
कोलकाता नगर निगम चुनाव का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि मतदाता केवल राजनीतिक विचारधारा के आधार पर फैसला नहीं करते। उनके रोजमर्रा के जीवन से जुड़े मुद्दे भी चुनावी नतीजों को प्रभावित करते हैं।
सड़कें, पेयजल, जलभराव, कचरा प्रबंधन, साफ-सफाई, अवैध निर्माण और स्थानीय प्रशासन की जवाबदेही जैसे सवाल चुनाव के केंद्र में आ सकते हैं। शहर के अलग-अलग हिस्सों में समस्याएं भी अलग-अलग हो सकती हैं। इसलिए वार्डवार स्थिति का विश्लेषण पूरे शहर के चुनावी रुझान को समझने में मदद करेगा।
भाजपा के लिए चुनौती होगी कि वह नागरिक सुविधाओं को लेकर ठोस विकल्प पेश करे। तृणमूल के सामने अपने पिछले काम का हिसाब देने और भविष्य की योजनाओं पर भरोसा पैदा करने का सवाल होगा। वहीं वामपंथ और कांग्रेस को यह दिखाना होगा कि वे केवल राजनीतिक विरोध तक सीमित नहीं, बल्कि स्थानीय शासन का व्यावहारिक विकल्प भी हैं।
क्या कोलकाता में फिर लिखी जाएगी सत्ता परिवर्तन की कहानी?
कोलकाता नगर निगम का इतिहास बताता है कि यहां राजनीतिक वर्चस्व हमेशा एक जैसा नहीं रहा। वामपंथ ने लंबे समय तक अपनी पकड़ बनाए रखी, तृणमूल कांग्रेस ने उसे चुनौती देकर सत्ता हासिल की और फिर लगातार तीन चुनावों में अपनी स्थिति मजबूत की।
अब 209 वार्डों वाला नया चुनावी नक्शा, महिला आरक्षण और राज्य की बदली हुई सत्ता व्यवस्था मुकाबले को नया रूप दे रहे हैं। भाजपा के लिए यह अपने शहरी जनाधार को साबित करने का अवसर है, जबकि तृणमूल के लिए अपना पुराना किला बचाने की परीक्षा।
लेकिन अंतिम फैसला केवल राज्य की सत्ता या बड़े नेताओं के भाषणों से नहीं होगा। उम्मीदवारों की विश्वसनीयता, स्थानीय संगठन, नागरिक समस्याएं और मतदाताओं का रुख निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।
क्या कोलकाता में तृणमूल कांग्रेस का वर्चस्व कायम रहेगा, या भाजपा नगर निगम में भी सत्ता परिवर्तन का रास्ता खोल देगी? क्या वामपंथ और कांग्रेस अपनी खोई जमीन वापस हासिल कर पाएंगे? इन सवालों के जवाब चुनाव परिणाम देंगे। फिलहाल इतना तय है कि 209 वार्डों का यह मुकाबला कोलकाता की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत कर सकता है।
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