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दूसरा पहलू: भोर में अनायास ही नहीं गाते हैं परिंदे, वैज्ञानिकों के शोध में क्या नई जानकारी मिली?
Thu, 22 Oct 2026 08:47 AM IST
ज्योति भास्कर
अमित मुद्गल
अमित मुद्गल
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Thu, 22 Oct 2026 08:47 AM IST
सार
कहा जाता है कि भोर की नमी और दूर तक आवाज साफ जाने के कारण सुबह पक्षियों की आवाज अधिक सुनाई देती है। पर, यह थ्योरी गलत साबित हो गई है। वैज्ञानिकों ने पाया कि सुबह के समय रोशनी कम होने से शिकार ढूंढने में मुश्किल के कारण वे इस समय अपने साथी को रिझाने के लिए गाते हैं।
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पक्षियों के कलरव पर वैज्ञानिकों का नया अध्ययन (सांकेतिक)
- फोटो : adobe
विस्तार
दुनियाभर के साहित्यकारों ने अपनी-अपनी रचनाओं में भोर में पक्षियों के कलरव का अपने-अपने तरीके से सजीव वर्णन किया है। गाने वाले पक्षियों से जुड़ा एक दिलचस्प अध्ययन जून 2025 में कॉर्नेल लैब ऑफ ऑर्निथोलॉजी और भारत के प्रोजेक्ट ध्वनि ने मिलकर किया था। वैज्ञानिकों ने जब वर्षावनों की ऑडियो रिकॉर्डिंग की जांच की, तो पाया कि पक्षी सुबह इसलिए गाते हैं, क्योंकि उस वक्त रोशनी कम होती है और शिकार ढूंढना मुश्किल होता है। इसलिए, वे उस खाली समय का उपयोग अपनी सीमाओं को तय करने और साथी को आकर्षित करने के लिए गाना गाकर करते हैं।
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अध्ययन बताता है कि जिन पक्षियों की आंखें उनके शरीर के अनुपात में बड़ी होती हैं (जैसे रॉबिन या थ्रश), वे सुबह के बहुत कम उजाले में भी कीट-पतंगों को देख सकते हैं। इसलिए, वे सबसे पहले उठकर गाना शुरू करते हैं। छोटी आंखों वाले पक्षी (जैसे गौरैया या कबूतर) रोशनी बढ़ने के बाद अपनी तान छेड़ते हैं। सूरज की रोशनी के साथ-साथ सुबह का यह संगीत भी एक लहर की तरह पूर्व से पश्चिम की ओर बढ़ता है। उदाहरण के लिए, जब भारत के अरुणाचल प्रदेश में पक्षी गाना शुरू करते हैं, तो उसके लगभग दो घंटे बाद गुजरात के पक्षी उसी सुर में गा रहे होते हैं।
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इस अध्ययन को मशहूर विज्ञान पत्रिका फिलॉसॉफिकल ट्रांजैक्शंस ऑफ द रॉयल सोसाइटी बी में प्रकाशित किया गया। शोधकर्ताओं ने भारत के पश्चिमी घाट पर उपकरण लगाकर 69 पक्षी प्रजातियों की आवाजों का विश्लेषण किया। उन्होंने पाया कि भोर के समय एशियाई कोयल उन शुरुआती पक्षियों में से एक है, जो सूरज उगने से काफी पहले ही गाना शुरू कर देती है। हैबिटेट इकोलॉजी ऑफ एशियन कोएल रिपोर्ट में यह भी जिक्र है कि शहरों में कौओं की आबादी के कारण कोयल ने भी इन्सानी बस्तियों और शहरी पेड़ों (जैसे नीम, पीपल) के आसपास अपनी मौजूदगी और गायन को बहुत तेजी से ढाल लिया है।
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इस अध्ययन में जो डाटा और पैसिव एकॉस्टिक मॉनिटरिंग तकनीक इस्तेमाल की गई थी, उसे विस्तार देते हुए शोधकर्ताओं ने भारत की पहली ओपन-एक्सेस क्राउडसोर्स्ड ध्वनि लाइब्रेरी तैयार की है। इसमें 25 राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों से रिकॉर्ड की गई 518 प्रजातियों की करीब 5,815 मिनट की आवाजें शामिल हैं। इस अध्ययन और उसके बाद जुटाए गए डाटा का इस्तेमाल अब भारतीय वन्यजीवों और पक्षियों की आवाजों को समझने के लिए विशेष एआई मॉडल्स को प्रशिक्षित करने में किया जा रहा है।