फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   Kargil Vijay Diwas Story of Valour and Bravery

कारगिल विजय दिवस 2022: पराक्रम और शौर्य की कहानी, अपने सैनिकों को सलाम करता है हर हिंदुस्तानी

Tue, 26 Jul 2022 09:28 AM IST
Rajesh Verma राजेश वर्मा
Updated Tue, 26 Jul 2022 09:28 AM IST
सार

आज 26 जुलाई को देश, विजय दिवस के रूप में कारगिल युद्ध की 23वीं वर्षगांठ मना रहा है। 1971 के युद्ध में मुंह की खाने के बाद लगातार छेड़े गए छद्म युद्ध के रूप में पाकिस्तान ने ऐसा ही छ्द्म हमला कारगिल में 1999 में किया। इस लेख में स्तंभकार राजेश वर्मा याद कर रहे हैं वीर सैनिकों उनके महान कारनामों को और सलाम कर रहे हैं हमारे सैनिकों की शहादत को।

विज्ञापन
Kargil Vijay Diwas Story of Valour and Bravery
18 हजार फीट की ऊंचाई पर कारगिल का यह युद्ध तकरीबन दो माह तक चला, जिसमें 527  वीर सैनिकों की शहादत देश को देनी पड़ी। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

विजय दिवस के रूप में 26 जुलाई यानी आज कारगिल युद्ध की 22वीं वर्षगांठ देशभर में मनाई जा रही है। 1971 के युद्ध में मुंह की खाने के बाद लगातार छेड़े गए छद्म युद्ध के रूप में पाकिस्तान ने ऐसा ही छ्द्म हमला कारगिल में 1999 के दौरान किया।

विज्ञापन


18 हजार फीट की ऊंचाई पर कारगिल का यह युद्ध तकरीबन दो माह तक चला, जिसमें 527  वीर सैनिकों की शहादत देश को देनी पड़ी। 1300 से ज्यादा सैनिक इस जंग में घायल हुए। पाकिस्तान के लगभग 1000 से 1200 सैनिकों की इस जंग में मौत हुई। भारतीय सेना ने अदम्य साहस से जिस तरह कारगिल युद्ध में दुश्मन को खदेड़ा, उस पर हर देशवासी को गर्व है।
विज्ञापन

 

हिमाचल प्रदेश की वीर भूमि में जन्मे 52 वीर सैनिकों ने भी इस युद्ध में शहादत का जाम पिया। इन्हीं में से कुछ नाम ऐसे भी हैं, जिनकी वीर गाथा आज भी हर प्रदेश वासी की जुबान पर है। कैप्टन विक्रम बत्रा जब पहली जून 1999 को कारगिल युद्ध के लिए गए तो उनके कंधों पर राष्ट्रीय श्रीनगर-लेह मार्ग के बिलकुल ठीक ऊपर महत्वपूर्ण चोटी 5140 को दुश्मन फौज से मुक्त करवाने की जिम्मेदारी थी।

विज्ञापन
विज्ञापन

 


आसान नहीं थी कारगिल की जंग 

यह दुर्गम क्षेत्र मात्र एक चोटी ही नहीं थी यह तो करोड़ों देशवासियों के सम्मान की चोटी थी जिसे विक्रम बत्रा ने अपनी व अपने साथियों की वीरता के दम पर 20 जून 1999 को लगभग 3 बजकर 30 मिनट पर अपने कब्जे में ले लिया। उनका रेडियो से विजयी उद्घोष 'यह दिल मांगे मोर....जैसे ही देश वासियों को सुनाई दिया हर एक भारतीय की नसों में ऐसा जज्बा भर गया और हर एक की जुबान भी यह दिल मांगे मोर... ही कह रही थी। 

अगला पड़ाव चोटी 4875 का था यह अभियान भी विक्रम बत्रा की ही अगुवाई में शुरू हुआ। विक्रम बत्रा बहुत से पाकिस्तानी सैनिकों को मारते हुए आगे बढ़े लेकिन इस बीच वह अपने घायल साथी लेफ्टिनेंट नवीन को बचाने के लिए बंकर से बाहर निकल आए। 'तुम बीबी- बच्चों वाले हो यहीं रुको बाहर मैं जाता हूं'  मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण वीर योद्धा कैप्टन विक्रम बत्रा के ये शब्द अपनी ही टीम के एक सुबेदार के लिए थे।

घायल लेफ्टिनेंट नवीन को बचाते हुए जब एक गोली विक्रम बत्रा के सीने में लगी तो भारत मां के इस लाल ने भारत माता की जय कहते हुए अंतिम सांस ली, इससे आहत सभी सैनिक गोलियों की परवाह किए बिना दुश्मन पर टूट पड़े और चोटी 4875 को आखिरकार फतह किया। इस वीरता के चलते 15 अगस्त 1999 को कैप्टन विक्रम बत्रा को परमवीर चक्र से नवाजा गया।

Kargil Vijay Diwas Story of Valour and Bravery
आज कारगिल युद्ध को 23वर्ष पूरे हो चले। यह बेहद गौरव की बात है कि देश इस युद्ध में शहीद हुए वीर सैनिकों को विजय दिवस मनाकर याद कर रहा है। - फोटो : अमर उजाला

शहीदों की शहादत की कहानियां  

बिलासपुर जिले से संबंध रखने वाले परमवीर चक्र विजेता संजय कुमार की वीर गाथा भी इसी तरह की है-


संजय अपने 11 साथियों के साथ कारगिल में मस्को वैली प्वाइंट 4875 के फ्लैट टॉप पर तैनात थे। पाकिस्तानी सैनिकों ने ऊंचाई का फायदा उठाते हुए टीम के 8 सैनिकों को घायल कर दिया जबकि 2 शहीद हो गए। संजय को 3 गोलियां लग चुकी थी और राइफल भी खाली थी लेकिन फिर भी इस साहसी योद्धा ने घायल अवस्था में भी दुश्मन के बंकर में घुसकर उनकी ही बंदूक छीन कर दुश्मन के 3 सैनिकों को मार कर दूसरे मुख्य बंकर पर कब्जा कर लिया। इस अदम्य साहस के लिए संजय को भी परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।

कुल्लू जिला के आनी से एक और वीर सैनिक डोला राम की वीर-गाथा भी देश प्रेम के लिए प्रेरित करती है। डोला राम ने अपने 2 साथियों की सहायता से बिना हथियारों के सियाचिन ग्लेशियर की चोटी पर बंकर में छिपे 17 घुसपैठियों को मौत की नींद सुला दिया। डोला राम देश के लिए शहीद होकर भी अमर हो गए।
 

कारगिल युद्ध में जब तक ब्रिगेडियर खुशहाल ठाकुर के नाम का जिक्र न हो तब तक यह विजयी गाथा अधूरी है। प्रदेश के कुल्लू व मंडी जिला की सीमा पर स्थित गांव नंगवाई से संबंध रखने वाले ब्रिगेडियर खुशहाल ठाकुर के नेतृत्व में सैन्य टीम ने तोलोलिंग चोटी पर कब्जा किया तो किसी ने नहीं सोचा था की यह पड़ाव इस युद्ध का टर्निंग प्वाइंट साबित होगा।


18 ग्रेनेडियर्ज के कमांडिंग ऑफिसर कर्नल खुशहाल ठाकुर की इस कमान में सबसे अधिक सैनिकों ने देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। इतनी बड़ी संख्या में नुकसान का सीधा कारण दुश्मन के ऊंचाई पर बैठ कर वार करना था। इस नुकसान से स्तब्ध कर्नल खुशहाल ठाकुर ने खुद कमान संभाली और विजयी रथ को मंजिल तक पहुंचा दिया। 13 जून का दिन था जब 18 ग्रेनेडियर्ज ने 2 राजपूताना राइफल्स के साथ मिलकर तोलोलिंग पर कब्जा किया। इस सफलता की भारी कीमत घायल लैफ्टिनैंट कर्नल विश्वनाथन ने कर्नल खुशहाल ठाकुर की गोद में अपने प्राण त्याग कर चुकाई थी।

कर्नल खुशहाल ठाकुर ने अपनी यूनिट के साथ पहले तोलोलिंग व फिर सबसे ऊंची चोटी टाइगर हिल पर विजय पताका फहराई।  भारतीय सैन्य इतिहास में रिकार्ड बनाते हुआ इस विजय अभियान के लिए भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति ने 18 ग्रेनेडियर्ज को 52 वीरता सम्मानों से सम्मानित किया। इसी कमान के ग्रेनेडियर योगेंद्र यादव को मात्र 19 वर्ष की आयु में परमवीर चक्र से नवाजा गया।

Kargil Vijay Diwas Story of Valour and Bravery
विजय दिवस एक दिवस मात्र ही नहीं यह सभी देशवासियों के लिए प्रेरणा दिवस भी है। - फोटो : अमर उजाला

कैप्टन सौरभ कालिया को कोई नहीं भुला सकता यदि यह कहा जाए कि विजय दिवस की गाथा का पहला पन्ना यहीं से शुरू होता है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। हिमाचल के इस सपूत ने कारगिल युद्ध शुरू होने से पहले ही अपनी जान देश के लिए कुर्बान कर दी। 5 मई 1999 का ही वह दिन था जब कैप्टन कालिया लद्दाख की एक पोस्ट पर अपने 5 अन्य साथियों के साथ गश्त कर रहे थे और उसी समय पाकिस्तानी फौज ने इन्हें बंदी बना लिया। 20 दिनों तक कैद में रखने के साथ इनके साथ तरह-तरह से अत्याचार किए गए। 


उनके शरीर में जलती सिगरेट दागी गई, कानों में लोहे की गरम सलाखें डाल दी, शारीरिक यातनाएं दी गई। उनके शव को बुरी तरह से क्षत-विक्षत कर दिया गया, पहचान मिटाने के लिए चेहरे व शरीर पर धारदार हथियारों से कई बार प्रहार किया गया। कई निजी अंग काट दिए थे। देश के लिए अपनी संतान द्वारा शहादत देना हर किसी माता-पिता के लिए गर्व की बात होती है लेकिन जिस तरह कैप्टन कालिया से अमानवीय व्यवहार हुआ वह किसी के भी सीने को छलनी कर सकता है।
 

आज कारगिल युद्ध को 23वर्ष पूरे हो चले। यह बेहद गौरव की बात है कि देश इस युद्ध में शहीद हुए वीर सैनिकों को विजय दिवस मनाकर याद कर रहा है। देश का सैनिक जब सरहद पर होता है तो मातृभूमि ही उसके लिए उसका घर परिवार आदि सबकुछ होता है, इसकी हिफाज़त के लिए वह अपने प्राणों तक का बलिदान दे देता है। विजय दिवस एक दिवस मात्र ही नहीं यह सभी देशवासियों के लिए प्रेरणा दिवस भी है।

Kargil Vijay Diwas Story of Valour and Bravery
कारगिल विजय दिवस: देश अपने शहीदों की शहादत कभी नहीं भूलेगा। - फोटो : सोशल मीडिया

कारगिल युद्ध में मुख्य भूमिका निभाने वाले ब्रिगेडियर खुशहाल ठाकुर कारगिल युद्ध के बारे में बताते हुए कहते हैं कि..
 

कारगिल युद्ध में मेरे पास 18 ग्रेनडियर की कमान की थी हमारी यूनिट ने तोलोलिंग की पहाड़ी और करगिल की पहाड़ी टाईगर हिल पर विजय पताका फहराई थी। 18 ग्रेनडियर की इस यूनिट को 52 वीरता पुरस्कार मिले थे  जो अब तक का मिलट्री इतिहास है। जब तोलोलिंग पर दुश्मन के साथ संघर्ष चल रहा था तो हमारे उप-कमान अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल आर विश्वनाथन मेरी ही गोद में वीरगति को प्राप्त हुए। इन्हें इनकी बहादुरी के लिए मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया। उस दृश्य को याद करूं तो कारगिल का युद्ध इतना कठिन था कि वहां छिपने के लिए खाली व सूखी पहाड़ियों के अलावा तिनका तक भी नहीं था। 


रात का समय था पाकिस्तान ने जब मशीनगन के ऊपर हमला किया तो उस लड़ाई में मेरे साथ अन्य  9 जवान शहीद हुए इसमें कर्नल विश्वनाथन भी थे इन्हें भी एक गोली लगी और बड़ी मुश्किल से इन्हें खींच कर नीचे लाए व एक पत्थर के नीचे ले गए। खून बह रहा था लेकिन मैं इन्हें सहला रहा था। रौशनी का न तो कोई प्रबंध था न ही रौशनी जला सकते थे यह भी कारण था कि विश्वनाथन को वह प्राथमिक उपचार नहीं मिल सका जो हम उन्हें दे सकते थे इसका कारण यह भी था कि सामने से गोलियों की बौछारें हो रही थी।

इन्होंने अंतिम सांसे मेरी ही गोद में ली। पूरी कारगिल की लड़ाई में ये सबसे वरिष्ठ सैन्य अधिकारी थे जो शहीद हुए। वैसे तो हिमाचल के 52 वीर योद्धा शहीद हुए हैं और हिंदुस्तान के 527 रणबांकुरों ने देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दी है लेकिन सबसे वरिष्ठ शहीद होने वाले अधिकारी कर्नल विश्वनाथन थे।

इस हमले में मैं भी इनके साथ में था और जब दोनों तरफ़ से गोलियों व गोलों से जोरदार हमला हो रहा था तो मेरे आगे सूबेदार रणधीर सिंह थे, विश्वनाथन जी को जब गोली लगी तो मैंने सूबेदार रणधीर सिंह को बोला की आगे बढ़ें और इन्हें (विश्वनाथन) पीछे खींचें तथा आप आगे बढ़ें लेकिन तभी देखा कि सूबेदार रणधीर को भी गोली लग चुकी है और ये भी शहीद हो चुके थे।

हम बिलकुल साथ-साथ आगे सरक रहे थे। इसी तरह मेरे एक हवलदार राम कुमार थे जो रेडियो आपरेटर थे उनका हैंडसेट मेरे हाथ में था और ये मेरे पीछे थे मैंने देखा कि हैंडसेट मुझे पीछे खींच रहा है आगे नहीं आ रहा जबकि रणधीर शहीद हो चुका है लेकिन मैं आगे नहीं बढ़ रहा हूं तब पीछे मुडकर देखा तो पाया कि हवलदार राम कुमार भी शहीद हो चुका है। 
 

इसी तरह एक मेजर राजेश अधिकारी थे जिनकी शादी को अभी 6 माह ही हुए थे वे जब तोलोलिंग की लड़ाई में दुश्मन सैनिकों के साथ गुत्थमगुथा हो रहे थे तो मैं भी इनसे बात करना चाह रहा था लेकिन आपरेटर इन तक नहीं पहुंच पा रहा था ऑपरेटर ने कहा कि साहब बहुत गोलियां आ रही हैं इसलिए मैं आपकी बात मेजर साहब से नहीं करवा सकता उसी समय जब इससे बात हो रही थी तो रेडियो सेट पर चीखने की जोरदार आवाज आई "ओ मां..." और पता लगा कि मेरे से बात करते-करते इस रेडियो ऑपरेटर को भी गोली लगी है तथा ये भी शहीद हो गया है। मेजर राजेश अधिकारी भी बहादुरी से संघर्ष करते हुए शहीद हो गए। उन्हें भी मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।

Kargil Vijay Diwas Story of Valour and Bravery
कारगिल युद्ध में ब्रिगेडियर खुशहाल ठाकुर ने मुख्य भूमिका निभाई। - फोटो : फाइल फोटो

यह लड़ाई इतनी भयानक थी कि जो दुश्मन के स्नाइपर फायर थे उनकी आवाज तक नहीं होती थी। एक जवान हवलदार विरेन्द्र जो कि मुझे बता रहा था कि पाकिस्तान का फायर सामने से आ रहा है वह बचाव के लिए सचेत कर रहा था। हम तीन लोग थे मैं कर्नल विश्वनाथन और हवलदार विरेन्द्र।

उसी क्षण स्नाइपर  का फायर आया और विरेंद्र के माथे पर लगा और यह वहीं गिर गया हमें समझ ही नहीं आया कि यह कैसे गिर गया। तोलोलिंग की इतनी भयानक लड़ाई हमनें 22 दिन तक लड़ी। उसके बाद मेरी यूनिट ने द्रास सेक्टर की सबसे मुश्किल और मशहूर चोटी टाईगर हिल्स पर फतह हासिल की।

इसी का परिणाम था कि मेरी यूनिट के हवलदार योगेंद्र यादव को परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया जबकि एक अन्य अधिकारी लेफ्टिनेंट बलवान सिंह को महावीर चक्र मिला। पूरी कारगिल की लड़ाई में मेरी यूनिट 18 ग्रेनडियर को 52 वीरता पुरस्कार दिए गए।

मैं आज भी उस घटनाक्रम को याद करता हूं तो रोमांच व साहस से भर जाता हूं। कारगिल युद्ध की यादें मुझे आज भी प्रेरित करती हैं तथा हौंसला देती हैं कि हमारा देश आज भी सुरक्षित हाथों में है देश की सेना पर हम गर्व है तथा गर्व है हमें भारतीय होने पर।  

(ब्रिगेडियर खुशहाल ठाकुर).


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed