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कल्पवास मेला: एक पुरातन भारतीय परंपरा और जीवन मूल्य

Thu, 24 Nov 2022 10:23 AM IST
Amiy bhushan अमिय भूषण
Updated Thu, 24 Nov 2022 10:23 AM IST
सार

इन दिनों कल्पवास मेले चल रहे हैं। यह एक पुरातन भारतीय परंपरा है। ये जुगों-जुगों से कल्प और कल्पान्तर से चली आ रही है। इस दौरान श्रद्धालु पवित्र नदी तटों पर निवास कर भक्ति साधना करते हैं।

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Kalpwas Mela: Importance and Significance of Kalpwas Mela in Indian Culture
प्रयागराज के त्रिवेणी तट का कल्पवास माघ तो हरिद्वार का बैसाख महीने में आता है। नासिक में भादों और चैत्र में उज्जैन के कुंभ स्थलों पर कल्पवास होता है। - फोटो : twitter

विस्तार

इन दिनों कल्पवास मेला चल रहा है। यह एक पुरातन भारतीय परंपरा है। ये युगों-युगों से कल्प और कल्पान्तर से चली आ रही है। इस दौरान श्रद्धालु पवित्र नदी तटों पर निवास कर भक्ति साधना करते हैं। यह कुंभ पर्व से साम्यता रखते हुए भी कई मायनों में अलग है।

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कुंभ की कथा विचार संस्कार और सागर के मंथन से जुड़ी है। वहीं इसका उद्देश्य अमृत रूपी तत्व को प्राप्त करना है। इसके उलट कल्पवास कायाकल्प और आत्मशुद्धि का एक माध्यम है। पुरानेपन का त्याग और नवीन का ग्रहण ही कल्प है। इस निमित ऊर्जा से परिपूर्ण किसी रमणीक नदी तीर्थ पर खास तिथियों में किया गया वास कल्पवास है।
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नया जीवन- नई ऊर्जा और एक बेहतर दिनचर्या के शुरुआती अभ्यास का नाम भी कल्पवास है। बात आयोजनों से जुड़ी हो तो कुंभ स्थल निश्चित और पूर्व निर्धारित है,  जबकि कल्पवास के साथ ऐसा नहीं है। ऐसे कल्पवास स्थल भारतवर्ष के हर हिस्से में मौजूद हैं, जहां वर्ष के अलग-अलग महीनों में कल्पवास चलता रहता है।
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दक्षिण के कुंभकोणम से नेपाल के त्रिवेणी और सप्तकोसी तक ऐसे अनेकों कल्पवास स्थल है। जहां कुंभ पर्व एक स्थान पर ठीक बारह वर्ष उपरांत आता है इसके उलट साधना पर्व कल्पवास प्रति वर्ष लगता है। बात समानता की हो तो, कुंभ हो या कल्पवास सभी की तिथियां तय हैं। ये तिथि सूर्य के भ्रमण गति और बारह राशियों के चक्र पर निर्भर है।
 

प्रयागराज के त्रिवेणी तट का कल्पवास माघ तो हरिद्वार का बैसाख महीने में आता है। नासिक में भादों और चैत्र में उज्जैन के कुंभ स्थलों पर कल्पवास होता है। ऐसा ही बिहार के हरिहर क्षेत्र और सिमरिया का भी है। सिमरिया में आश्विन संक्रांति तो हरिहर क्षेत्र में कार्तिक पूर्णिमा से कल्पवास मेला प्रारंभ होता है। सिमरिया का कल्पवास सूर्य के तुला लग्न प्रवेश उपरांत प्रारंभ होता है और कार्तिक संक्रांति को समाप्त हो जाता है।


इस दिन सूर्य तुला से वृश्चिक लग्न में प्रवेश करता है। कार्तिक मास के इन कल्पवासों की महत्ता कहीं बढ़ कर है, दरअसल इनके भी अपने आधार है। पुराण कहते हैं कि मासों में कार्तिक और देवों में विष्णु श्रेष्ठ हैं। यह माह देवों के जागरण और नदियों के ऋतुकाल उपरांत स्वच्छ स्थिर शांत व कलकल वाला है।

भूमि इन दिनों बीजों को धारण करती है, जबकि कृतिकाएं सूर्य की मदद से बीजों के अंकुरण को पूर्ण करती हैं। कार्तिक के इस मास में ढेरों पवित्र उत्सव संग धेनु और प्रकृति से जुड़े पर्व भी आते हैं। गोपाष्टमी गोपूजा का तो कार्तिक पूर्णिमा पशुप्रेम आधारित गजेंद्र मोक्ष अवतार से सम्बद्ध है।

वहीं तुलसी विवाह, आंवला पूजन और छठ पर्व प्रकृति पूजा से जुड़े आयोजन पर्व हैं। बात कल्पवास के साधना पर्व की करें तो साधक इस अवधि का अधिकाधिक समय श्रवण कीर्तन स्मरण अर्चन वंदन आत्म निवेदन और दास्य भाव से सेवा में व्यतीत करते हैं। वे दिन में केवल एक समय भोजन करते हैं और भोग कामनाओं से पूरी तरह दूर रहते हैं।

कल्पवास की  महत्ताओं को रामायण में भी दर्शाया गया है। प्रयागराज के भारद्वाज मुनि आश्रम में आए प्रभु श्रीराम और माता सीता संतों के मुख से इसकी महिमा सुनते हैं। रामचरित मानस में इसका बड़ा ही सुंदर चित्रण है।

Kalpwas Mela: Importance and Significance of Kalpwas Mela in Indian Culture
जब माघ महीने में मकर लग्न में सूर्य प्रवेश करते हैं तो हर कोई आत्मकल्याणार्थ तीर्थराज प्रयाग का रुख करता है। - फोटो : Social Media

यहां चर्चा आई है-
 

माघ मकरगत रवि जब होई। तीरथपतिहिं आव सब कोई।।


ये पंक्तियां कल्पवास के महत्व संग ग्रहों के चाल का भी संकेत कर रही हैं। इनके अनुसार जब माघ महीने में मकर लग्न में सूर्य प्रवेश करते हैं तो हर कोई आत्मकल्याणार्थ तीर्थराज प्रयाग का रुख करता है।

ठीक ऐसे ही मान्यताएं गजेंद्र मोक्ष अवतार स्थान हरिहर क्षेत्र और मिथिला मगध मिलन स्थली शाल्मली वनक्षेत्र को लेकर भी है। बिहार के हाजीपुर से नेपाल के त्रिवेणी धाम तक विस्तृत हरिहर क्षेत्र अब सोनपुर तक सिमटा और  जाना जाता है।

वहीं अतीत का शाल्मली वनक्षेत्र अब सिमरिया है। शाल्मली का हिंदी रूपांतरण सेमल है और समय की यात्रा ने इस सेमल वृक्ष को सेमर नाम दिया है। इसी सेमर से सिमरिया बना है। गंगा के पावन तट पर बसे इस तीर्थ ग्राम का अतीत बड़ा ही गौरवशाली है। यहां कभी राजर्षि जनक आते थे ऐसी जनश्रुति और मान्यताएं हैं। महाकवि विद्यापति को गंगा का ये पावन तट अत्यंत प्रिय था।

इसी ग्राम में राष्ट्रकवि दिनकर का जन्म हुआ है और यहां के बिंदेश्वरी सिंह भजन सम्राट के तौर भारत भर में जाने जाते थे। अविभाजित बिहार का पहला गंगा नदी पुल भी यहीं है। इस सेतु द्वारा पहली बार सड़क और रेल माध्यम से मगध मिथिला से जुड़ा।
 

यह लंबे समय तक उत्तर बिहार को राज्य के दक्षिणी हिस्से से जोड़ने का एकलौता जरिया रहा है। सिमरिया कल्पवास मेला समय के साथ अब भी चल और बढ़ रहा है। मेला का यह वर्तमान स्वरूप सैकड़ों वर्ष पुराना है। इसे घुमंतू संत खखर बाबा ने टाट फूस के दो झोपड़ियों के सहारे एक पहचान दी थी। जहां रात को ढ़िबरी की रोशनी में नामधुन संकीर्तन हुआ करता था। इनके बाद इसे व्यवस्थित करने में मिथिला के संत सुखदेव दास और भरत दास जी का अभूतपूर्व योगदान रहा है।


अब तो यहां प्रतिवर्ष सौ से अधिक शिविर लगते हैं, जहां बिहार नेपाल से लेकर अयोध्या और वृंदावन से भी संत अपने शिविर ले कर आते हैं, यहां न कोई जाति पूछता है और ना ही किसी की आर्थिक स्थिति देख सुन व्यवहार किया जाता है। सब समान हैं, श्रद्धालु और साधक हैं। वहीं ये कल्पवास सनातन धर्म अनुरागी प्रचारक बनाने की भी एक पाठशाला है। बात श्रद्धालुओं की हो तो बिहार के मिथिला क्षेत्र से नेपाल तराई तक के लोग यहां कल्पवास को आते हैं।

ये कल्पवासी तंबुओं के बने नगर में अगले एक महीने तक रह चतुर्थ उपासना करते हैं। ये चतुर्थ उपासनाएं नाम रूप लीला धाम का दर्शन श्रवण और सेवन है।यहाँ नाम से अभिप्राय संकीर्तन का है, रूप भगवान की झांकियों का दर्शन है।लीला नयनों से देखी कानों से सुनी कथा और मंचीय भगवत लीला प्रस्तुतियाँ है। यहाँ प्रतिदिन संध्या पंडालों में रामलीला कृष्णलीला और परशुराम चरित्र मंचन चलता है।गंगा का किनारा और संतों का साथ है तो निश्चित ही यह एक जीवंत जाग्रत धाम है।जहाँ श्रद्धालु एक महीना धाम  सेवन कर जीवन में परिवर्तन की अनुभूति और मृत्यु उपरांत एक बेहतर पारलौकिक जीवन की सोचते है। यहां श्रद्धालुओं की दिनचर्या नित्यप्रति गंगा स्नान गंगा जल के पान एवं गंगा पूजन से प्रारंभ होती है।

Kalpwas Mela: Importance and Significance of Kalpwas Mela in Indian Culture
ये कल्पवासी तंबुओं के बने नगर में अगले एक महीने तक रह चतुर्थ उपासना करते हैं। - फोटो : Istock

इसके बाद ये भगवत नाम संकीर्तन करते हुए सम्पूर्ण मेला क्षेत्र की परिक्रमा करते हैं। परिक्रमा के दौरान श्रद्धालु भक्ति भाव से झूमते चलते हैं। सम्पूर्ण वातावरण शंख घंटी और हरि नाम उच्चारणों से गुंजायमान हो उठता है। इसके उपरांत श्रद्धालु शिविरो मे जा कर भगवान की झांकियों का दर्शन करते हैं।

वहीं शिविर शिविर जा पूज्य संतों का आशीर्वाद भी लेते हैं। संतों के हर शिविर में एक अस्थायी मंदिर होता है जहां सुबह सवेरे भगवान की मनोहारी झांकी सजाई जाती है। झांकी दर्शन बाद श्रद्धालु अपने शिविर के तुलसी चौरे पर जाकर तुलसी पूजन संपन्न करते है। इसमें महिलाएं विशेष रूप से आगे होती है।
 

तदोपरांत ये भगवत विग्रह के आगे ढोल झाल ले कर कीर्तन गाते है। जिसके बाद हर शिविर में भगवत कथा आयोजित होती है। कथा के समापनोपरांत सभी शिविरों में भोजन भंडार शुरू होता है। भंडारे मे प्रसाद चख श्रद्धालु जप स्वाध्याय और विश्राम इत्यादि में लगते है। फिर संध्या पहर पंडालों मे आयोजित होने वाले भगवत लीला मंचन को देख कर वे जल इत्यादि ग्रहण कर विश्राम को चले जाते है।


अधिकांश श्रद्धालु पुरानी परंपरा का अनुसरण करते हुए रात्रि को भोजन नही करते है। सिमरिया में आए इन श्रद्धालुओं की संख्या करीब पचास हजार होती है। जबकि इसके उलट हरिहर क्षेत्र का कल्पवास मेला केवल पशु मेला बन कर रहा गया। जबकि इसका अतीत इसे गज के भगवत भक्ति और भगवान के पशु प्रेम पर आधारित की है। अब तो ये विश्व प्रसिद्ध पशु मेला भी दम तोड़ रहा है। सांस्कृतिक पहचान से जुड़े ऐसे परंपराओं के क्षरण का कारण बढ़ती सामाजिक उदासीनता और शासकीय नाकारापन है। 

ये तीर्थस्थल न केवल हमारी पहचान का हिस्सा है अपितु ये बड़ी संख्या में श्रद्धालु और घुमंतू यात्रियों को आकर्षित करते है। यहाँ से प्रति वर्ष करोड़ों का कर संग्रह भी होता है। किंतु कल्पवास के समय का हाल देख आपको रोना आ जाएगा।

इस वर्ष सिमरिया मे गंगा के विस्तार और बारिश ने मिलजुल परेशानी खड़ी करी। ढ़ेरों शिविर बारिश को भेंट चढ़े तो रास्ते कीचड़ पानी से सने पटे है। श्रद्धालु परमपराओं के नाते संकल्प तोड़ समय से पहले लौट नही सकते। शिविरों में लगे धर्म ध्वजा और तुलसी बीरे को छोड़ नहीं सकते है। खानापूर्ति वाला सरकारी अमला ऐसे संभावित आपदाओं के लिए कुछ भी नही करता है यह अत्यंत दुखद है। यहां आपको मेला क्षेत्र मे प्रवेश के साथ बिजली बत्ती साफ सफाई से जगमग सरकारी शिविर दिखेगे।

जहां प्रतिदिन शासकीय सांस्कृतिक आयोजनों पर जम कर पैसा खर्चा जाता है। किंतु इसके ठीक पीछे खड़े श्रद्धालु कल्पवासी शिविर की कोई चिंता नही है। सभी शिविरों को रियायती दर बिजली एवं भोजन सामग्री की सुविधा तो छोड़ दे नदी घाट पर महिलाओं के कपड़े बदलने की कोई समुचित व्यवस्था तक नहीं है। वास्तव में आवश्यकता बदलावों की है। थोड़े से सोच और प्रयास से ऐसे कल्पवास मेले सनातन धर्म संस्कृति के कायाकल्प एवं प्रचार का माध्यम बन सकते है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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