व्यंग्य: जुगाड़ की प्रवृत्ति का कोई जवाब नहीं, बड़े से बड़ा काम जुगाड़ से संभव है..!
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
भारतीयों के जुगाड़ की प्रवृत्ति की प्रसिद्धि दुनियाभर में है। जुगाड़ का ताजा मामला असम से आया है, जिससे दिल बाग-बाग हो गया। दो युवकों ने जुगाड़ लगा कर अपनी मोटरसाइकल का साइलेंसर और ईंधन टैंक पानी से ऊंचा करके फिट कर दिया और मोटरसाइकल पानी में डूबने के बाद भी चल रही है।
देश के कई इलाकों में जुगाड़ के वाहन चल रहे हैं। किसी के इंजन, किसी के ढांचें, किसी का साइलेंसर और अन्य कलपुर्जे जुटा कर शान से जुगाड़ के वाहन सड़क पर दौड़ रहे हैं। कुछ तो ऐसे क्षेत्रों में चल रहे हैं कि उनका कोई कॉम्पिटिशन ही नहीं है।
जुगाड़ शब्द इतना जाना-पहचाना और वजनदार है कि इसे ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी में भी शामिल किया जा चुका है। हमें कई क्षेत्रों में जुगाड़ की महारत हासिल है। जुगाड़ ने ही ट्रांसफर और पोस्टिंग को उद्योग को प्रतिष्ठा दी है। पोस्टिंग करवानी है तो पैसे के साथ जुगाड़ लगवाओ और मनमाफिक जगह पोस्टिंग पाओ।
ट्रांसफर की दरें तो बाकायदा तय है। गांव से तहसील में आना है या गांव-तहसील से जिला मुख्यालय और या जिला स्तर से संभागीय मुख्यालय पर आना है तो पैसा दिखाओ और पोस्टिंग पाओ। यह उद्योग अब इतना सुव्यवस्थित और प्रतिष्ठित हो गया है कि ऑफर आने लगे हैं कि इतने रुपए लाओ और मनचाहा पाओ।
बच्चे छात्र जीवन से ही जुगाड़ जमाने का प्रशिक्षण लेना शुरू कर देते हैं। शिक्षाविद् भले ही वर्षों से शिक्षा नीति पर घमासान बहस करते आए हों और व्यावसायिक शिक्षा के लिए कोई ठोस नीति नहीं बना पाए हों लेकिन छात्रों को पता रहता है कि परीक्षा पास करने के लिए कैसे जुगाड़ जमाना है।
लोकल परीक्षाओं में नंबर पाने के लिए सीधा सा फॉर्मूला है, संबंधित शिक्षक के यहां ट्यूशन पर जाओ, फेल होने की आशंका से बचो और बोनस में अच्छे नंबर लाओ। बोर्ड की परीक्षा में पेपर आउट करने का जुगाड़ लगाओ। कॉलेज की परीक्षा के बाद एक अतिरिक्त जुगाड़ की संभावना रहती है।
जहां कॉपी जंचने के लिए जाने वाली है, वहां का पता लगाओ और तेरा पीछा ना मैं छोड़ूगा सोनिए की तर्ज पर संबंधित के पास पहुंच जाओ। साम-दाम-दंड-भेद का फाॅॅर्मूला अपनाओ और परीक्षा की वैतरणी पार लगाओ।
इसी वजह से मेधावी माने जाने वाले छात्र खड़े रह जाते हैं और जुगाड़ू दौड़ में आगे निकल जाते हैं। जुगाड़ लगाने में नेताओं का कोई सानी नहीं है। जुगाड़ लगा कर पार्टी का खास कार्यकर्ता बनना, फिर जुगाड़ लगा कर टिकट की दावेदारी पेश करना और इसके लिए नोटों की वर्षा कर देना कोई इनसे सीखे।
जुगाड़ से ही जीवन निरंतर और मधुरता से चलता है...
टिकट मिलने के बाद फिर जुगाड़ जमाने की कला काम आती है। सीटों पर मतदाता नहीं इस तथ्य का आकलन किया जाता है कि किस जाति के कितने मतदाता हैं। फिर जातियों के अनुसार जुगाड़ जमाने का सिलसिला शुरू हो जाता है। फिर ठीक मतदान से पहले वाली रात किस-किस वस्तु का जुगाड़ किया जाता है, वह खुला रहस्य है।
एक बार यदि कोई नेता चुन कर आ गया तो वह आर्थिक रूप से कहां से कहां पहुंच जाता है, यह देखने वाली बात है। लोग कहते रह जाते हैं कि अभी कुछ समय पहले तो इसके पास साइकल भी नहीं होती थी, अब कितनी बड़ी कार में घूम रहा है।
इसने कितना बड़ा बंगला बनवा लिया है। क्या जुगाड़ जमाया है। उसके चुनाव में जीतते ही अपना काम करवाने वाले जुगाड़िए उसे घेर लेते हैं। ये जनप्रतिनिधि भी अपनी कीमत जानते हैं और अपनी जो भी बची-खुची प्रतिष्ठा हो, उसे दांव पर लगा देते हैं।
तभी तो उनके संदर्भ में अस्तबल और घोड़े शब्दों का प्रयोग किया जाता है। हाल ही में ये शब्द हवा में घोड़ों की तरह उछले। टैक्स जमा करवाना हो तो इस जुगाड़ की फिराक में रहेंगे कि इसे कम से कम कैसे जमा करवाएं। ऐसा करने की सलाह देने वाले दफ्तर खोल कर बैठे हैं।
जुगाड़ से ही जीवन निरंतर और मधुरता से चलता है। हम लोग विदेश में जाकर भी जुगाड़ की तलाश में रहते हैं। इलेक्ट्रिक और इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं का वहां रिपेयरिंग करवा कर काम में लेने का चलन नहीं है। यूज एंड थ्रो का जमाना है।
लेकिन वहां भी भारतीय इन वस्तुओं को अपनी जुगाड़ की मानसिकता से रिपेयरिंग करवा कर जब तक वह चल सकती है तब तक उसे काम में लेते हैं। कोई भी नई नीति या योजना आए, हम जुगाड़ जमा ही लेते हैं। इस मामले में हमारा कोई जवाब नहीं है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।