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Jeevan Dhara: संतोष रूपी धन कभी खत्म नहीं होता, अपनी अनंत इच्छाओं का दास बना हुआ है इंसान?

Wed, 21 Jan 2026 06:57 AM IST
सुकरात Published by: निर्मल कांत Updated Wed, 21 Jan 2026 06:57 AM IST
सार

जो व्यक्ति प्राप्त चीजों से संतुष्ट नहीं है, उसे अगर समस्त ब्रह्मांड भी मिल जाए, तो वह दरिद्र ही रहेगा। वहीं, जब मनुष्य अल्प में संतोष करना सीख लेता है, तभी वह जीवन की वास्तविक सुंदरता का साक्षात्कार कर पाता है।

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Jeevan Dhara: The wealth of contentment never ends
जीवन धारा - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

इस बात पर तनिक विचार करें कि क्या वह व्यक्ति वास्तव में स्वतंत्र है, जो अपनी अनंत इच्छाओं का दास बना हुआ है? सत्य तो यह है कि सुख का रहस्य और अधिक पाने की अंतहीन खोज में नहीं, बल्कि कम में भी पूर्णता और आनंद अनुभव करने की क्षमता को विकसित करने में छिपा है। मनुष्य की प्रकृति उस ‘छलनी’ के समान हो गई है, जिसे वह संसार की वस्तुओं से भरने का निष्फल प्रयास करता रहता है। एक इच्छा तृप्त होती है, तो दूसरी तुरंत जन्म ले लेती है, और यह भ्रम बना रहता है कि अगली उपलब्धि ही अंततः हमें शांति प्रदान करेगी। याद रखें, यह निरंतर दौड़ आपको भीतर से खोखला कर देती है।
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जिस प्रकार एक अस्वस्थ शरीर को महंगे आभूषण शोभा नहीं देते, उसी प्रकार एक अशांत और लोभी मन को संसार का समस्त वैभव भी सुख नहीं दे सकता। सच्चा वैभव तो आत्मा का सद्गुण है, जो बाहर नहीं, केवल भीतर से प्रस्फुटित होता है। जब मनुष्य अल्प में संतोष करना सीख लेता है, तभी वह जीवन की वास्तविक सुंदरता का साक्षात्कार कर पाता है। जिसे हम अभाव कहते हैं, वह वास्तव में अनावश्यक बोझ से मुक्ति है। एक विवेकशील व्यक्ति यह जानता है कि संतोष ही सबसे बड़ा धन है।
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हम प्रायः उन अनमोल उपहारों की उपेक्षा कर देते हैं, जो हमारे पास पहले से मौजूद हैं-जैसे हमारा समय, स्वास्थ्य, संबंध और वर्तमान के छोटे-छोटे अनुभव व खुशी के पल। हम इन्हें तब तक महत्व नहीं देते, जब तक वक्त इन्हें हमसे छीन नहीं लेता। याद रखें, एक साधारण भोजन भी अमृत समान हो सकता है, यदि मन संतुलित हो, और एक छोटी-सी कुटिया भी स्वर्ग बन सकती है, अगर उसमें प्रेम और समझ का वास हो। सुख कोई ऐसी वस्तु नहीं, जिसे बाजार से खरीदा जाए, बल्कि यह तो एक मानसिक अवस्था है, जिसे वर्तमान के प्रति पूर्ण स्वीकृति के साथ जिया जाता है।
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समाज आपको अधिक हासिल करने का पाठ पढ़ाकर मानसिक थकान, ईर्ष्या और अकेलेपन की ओर धकेलता है, लेकिन सादगी ही वह एकमात्र मार्ग है, जो आपको वास्तविक स्वतंत्रता प्रदान कर सकती है। जब आप कम में प्रसन्न रहना सीख लेते हैं, तब तुलना रूपी विषैला सर्प आपको डस नहीं पाता। जीवन में हर इन्सान की यात्रा भिन्न-भिन्न होती है, अतः अपनी तुलना दूसरों की यात्रा या वैभव से करना अज्ञानता का लक्षण है। इसलिए, स्वयं को पहचानें, क्योंकि जब आप अपनी आत्मा के साथ सामंजस्य बिठा लेते हैं, तब आपको बाहरी अधिकता की आवश्यकता ही नहीं रह जाती। जो व्यक्ति प्राप्त चीजों से संतुष्ट नहीं है, उसे अगर समस्त ब्रह्मांड भी मिल जाए, तो वह दरिद्र का दरिद्र ही रहेगा। इसलिए, अपने देखने के नजरिये को बदलें, क्योंकि संसार आपको वैसा ही दिखेगा, जैसा आपका मन उसे देखना चाहेगा।


सूत्र: सादगी अपनाएं
जीवन की सच्ची स्वतंत्रता इच्छाओं की पूर्ति में नहीं, बल्कि उन पर नियंत्रण में निहित है। जो मन संतोष करना सीख लेता है, वही वास्तव में समृद्ध होता है। बाहरी उपलब्धियां तभी तक आकर्षक लगती हैं, जब तक भीतर शांति का अभाव होता है। सादगी मनुष्य को तुलना से मुक्त करती है और आत्मिक स्पष्टता देती है।

 
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