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जीवन धारा: संघर्ष का सम्मान करना ही सच्ची सफलता है

Tue, 20 Jan 2026 07:01 AM IST
लव गौर बुकर टी वाशिंगटन
बुकर टी वाशिंगटन Published by: लव गौर Updated Tue, 20 Jan 2026 07:01 AM IST
सार

जो व्यक्ति धैर्य रखना सीख लेता है, वह समय के साथ अपने प्रत्येक लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। जल्दबाजी में पाई गई सफलता हमेशा खोखली   होती है, जबकि लंबे संघर्ष से मिली सफलता अर्थपूर्ण होती है।

 

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Jeevan Dhara: Respecting the struggle is the key to true success.
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सफलता का सही मूल्यांकन इस बात से नहीं किया जाना चाहिए कि कोई व्यक्ति जीवन में कितनी ऊंचाई तक पहुंचा, बल्कि इस बात से किया जाना चाहिए कि उस स्थान तक पहुंचने के लिए उसने किन कठिन रास्तों पर कदम रखा और उन बाधाओं का सामना किस धैर्य, साहस और ईमानदारी से किया। जीवन की वास्तविक महानता चमकते पदों और बाहरी प्रशंसा में नहीं, बल्कि उस आंतरिक शक्ति में छिपी होती है, जो मनुष्य को कठिन परिस्थितियों में भी अपने कर्तव्य से विचलित नहीं होने देती।
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अक्सर लोग सफलता को धन, प्रतिष्ठा और पद से जोड़कर देखते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि ये सब अस्थायी हैं। स्थायी वही होता है, जो मनुष्य अपने संघर्षों से अर्जित करता है-जैसे चरित्र, आत्मसम्मान और आत्मविश्वास। जब परिस्थितियां प्रतिकूल हों, संसाधन सीमित हों और राह कठिन दिखाई दे, तब भी जो व्यक्ति सीखने की ललक और परिश्रम के प्रति अडिग संकल्प को जीवित रखता है, वही अपने लिए मार्ग स्वयं बनाता है।
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जीवन का सबसे बड़ा सुख किसी ऊंचे ओहदे पर पहुंचने में नहीं, बल्कि उस कार्य को पूरी निष्ठा और ईमानदारी से करने में है, जिसे करने की जिम्मेदारी हमें सौंपी गई है। कोई भी काम छोटा नहीं होता, यदि उसे सच्चे मन से किया जाए। सच्ची सफलता का आधार अंतिम परिणाम नहीं, बल्कि वह निरंतर प्रयास होता है, जो व्यक्ति बिना थके, बिना शिकायत किए करता है। इसीलिए, मनुष्य के जीवन में शिक्षा का विशेष स्थान है, पर शिक्षा का अर्थ केवल पुस्तकों का ज्ञान या डिग्रियों का संग्रह नहीं होना चाहिए। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य व्यक्ति को जीवन की कठिनाइयों का सामना करने योग्य बनाना है।
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जब मनुष्य संघर्षों के बीच सीखता है, तभी उसका चरित्र मजबूत होता है और आत्मविश्वास विकसित होता है। वह शिक्षा अधूरी है, जो व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनना न सिखाए। कोई भी व्यक्ति तब तक वास्तविक अर्थों में स्वतंत्र नहीं हो सकता, जब तक वह आत्मनिर्भर नहीं बनता। जो व्यक्ति अपने श्रम और प्रयास से आगे बढ़ता है, वही सफलता का स्वाद चखता है। दूसरों पर निर्भर रहकर प्राप्त की गई उपलब्धियां न तो स्थायी होती हैं और न ही संतोषजनक। महान वे नहीं होते, जिन्हें जीवन में कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ा, बल्कि वे होते हैं, जिन्होंने कठिनाइयों के बावजूद आगे बढ़ने का साहस दिखाया।

एक और बात, बाधाएं हमारे मार्ग की शत्रु नहीं, बल्कि हमारे धैर्य, संकल्प और शक्ति की परीक्षा लेने वाली सीढ़ियां होती हैं। प्रत्येक बाधा हमें पहले से अधिक मजबूत, अनुभवी और विनम्र बनाती है। जल्दबाजी में प्राप्त की गई सफलता खोखली होती है, जबकि संघर्ष, परिश्रम और आत्मविश्वास से अर्जित सफलता स्थायी व अर्थपूर्ण होती है। सच्ची सफलता वही है, जो हमें भीतर से मजबूत बनाए, हमारे चरित्र को ऊंचा उठाए और दूसरों के लिए प्रेरणा का स्रोत बने।


सूत्र: स्वाभिमानी बनें
जो मनुष्य विपरीत हालात में भी अपने नैतिक मूल्यों से समझौता नहीं करता, वही आगे बढ़ता है। बाहरी पहचान क्षणिक होती है, पर आत्मबल और स्वाभिमान स्थायी पूंजी हैं। कठिन समय ही वह विद्यालय है, जहां विवेक और धैर्य का निर्माण होता है। प्रत्येक चुनौती छिपा हुआ अवसर होती है, जो आत्मविकास का मार्ग खोलती है।
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